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✊ “एकता नहीं तो अधिकार नहीं”

On: February 27, 2026 12:08 PM
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सारंडा के 18 गांवों की लड़ाई: गरीबी, बिखराव और संगठन की चुनौती

रिपोर्ट: शैलेश सिंह

सारंडा के घने जंगलों के बीच बसे गांवों की जिंदगी आज भी संघर्ष, अभाव और उम्मीद के बीच झूल रही है। सेल, गुवा खदान के अंतर्गत आने वाले कुल 18 गांव आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़े हैं। नई रांजाबुरू खदान के संचालन के साथ इन गांवों के लोगों ने एक साझा मांग उठाई है—
👉 खदान में रोजगार, ट्रांसपोर्टिंग, ड्राइविंग और अन्य कार्यों में 75 प्रतिशत हिस्सेदारी।
यह मांग न केवल जायज है, बल्कि संविधान, सामाजिक न्याय और नैतिकता के आधार पर पूरी तरह उचित भी है। क्योंकि खदान से अगर कोई सबसे अधिक प्रभावित होता है, तो वह यही आदिवासी गांव हैं—
* जिनकी जमीन गई
* जिनके जंगल कटे
* जिनके पानी और पर्यावरण पर असर पड़ा
* और जिनके युवा आज भी बेरोजगार हैं
लेकिन इस संघर्ष की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि 18 गांव आज एक नहीं, दो हिस्सों में बंट चुके हैं।

⚠️ आंदोलन में सबसे बड़ा खतरा: आपसी बिखराव

आज स्थिति यह है कि:
* दो अलग-अलग गुट आंदोलन चला रहे हैं
* कोई किसी के नेतृत्व को मानने को तैयार नहीं
* मुंडा, मानकी और ग्रामीणों के बीच भी समन्वय की कमी है
* बैठकें अलग-अलग हो रही हैं
* मांगें एक हैं, लेकिन आवाज बंटी हुई है
यही बिखराव इस पूरे आंदोलन की सबसे बड़ी कमजोरी बन गया है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि
जब पीड़ित वर्ग एकजुट नहीं होता, तो शोषण करने वाली ताकतें मजबूत हो जाती हैं।
इस स्थिति का सबसे अधिक फायदा किसे होगा?
👉 सेल प्रबंधन और ठेका कंपनियों को।
वे यही कहेंगे:
“ग्रामीण खुद एकमत नहीं हैं, हम किससे बात करें?”

🌱 गरीबी की जड़ में दबा आंदोलन

इन 18 गांवों की तस्वीर अगर देखी जाए तो सच्चाई बेहद दर्दनाक है:
* अधिकांश घर कच्चे
पीने का साफ पानी आज भी सपना
शिक्षा अधूरी
इलाज के लिए मीलों दूर जाना पड़ता है
युवाओं के पास न नौकरी, न स्थायी आय
खदान की भारी मशीनें गांव के पास से गुजरती हैं, लेकिन
इन मशीनों को चलाने वाला यहां के आदिवासी नहीं, बाहर से आए लोग हैं।
ग्रामीण कहते हैं:
“हमारी जमीन पर खदान, हमारी हवा में धूल, हमारे पानी में जहर…
लेकिन नौकरी बाहर वालों को क्यों?”
यही सवाल आज आंदोलन की आत्मा है।

🧭 नेतृत्व का संकट: कौन बने गांवों की आवाज?

आज आंदोलन की सबसे बड़ी समस्या नेतृत्व की लड़ाई बन चुकी है।
हर गुट चाहता है कि वही अगुवा बने।
लेकिन कोई यह नहीं सोच रहा कि:
* संघर्ष व्यक्ति का नहीं, समुदाय का है
* जीत किसी एक की नहीं, 18 गांवों की होनी चाहिए
मुंडा और ग्रामीणों के बीच संवाद टूटना सबसे खतरनाक संकेत है।
क्योंकि परंपरागत नेतृत्व (मुंडा-मानकी) ही आदिवासी समाज की रीढ़ रहा है।
अगर यही रीढ़ टूटेगी, तो आंदोलन खोखला हो जाएगा।

🏭 कंपनी प्रबंधन की रणनीति: “फूट डालो और राज करो”

यह कोई नई बात नहीं है कि बड़ी कंपनियां और ठेका एजेंसियां अक्सर
आंदोलनों में फूट का फायदा उठाती हैं।
रणनीति साफ होती है:
* एक गुट से बात करो
* दूसरे को नजरअंदाज करो
* समय निकालो
* आंदोलन को कमजोर करो
जब तक ग्रामीण एक मंच पर नहीं आएंगे, तब तक उनकी मांगें सिर्फ नारे बनकर रह जाएंगी।

🤝 समाधान का रास्ता: एक संयुक्त मंच

विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि अब समय आ गया है कि:
✅ 1. संयुक्त बैठक बुलाई जाए
18 गांवों के:
* मुंडा
* बुजुर्ग
* युवा
* महिला प्रतिनिधि
एक ही मंच पर बैठें।
✅ 2. संयुक्त नेतृत्व समिति बने
एक ऐसी समिति जिसमें सभी गांवों का प्रतिनिधित्व हो।
कोई एक नेता नहीं, बल्कि सामूहिक नेतृत्व।
✅ 3. एक मांग पत्र तैयार हो
जिसमें स्पष्ट लिखा हो:
* 75% स्थानीय रोजगार
* ट्रांसपोर्टिंग में गांवों की हिस्सेदारी
* प्रशिक्षण (ड्राइविंग, मशीन ऑपरेशन)
* ठेका कार्यों में प्राथमिकता
* CSR फंड का पारदर्शी उपयोग
✅ 4. आंदोलन का शांतिपूर्ण स्वरूप
* सड़क जाम नहीं, संवाद
* हिंसा नहीं, संवैधानिक संघर्ष
* मीडिया और प्रशासन को साथ लेकर चलना
📚 जागरूकता ही असली ताकत
ग्रामीणों को यह समझना होगा कि:
* कानून उनके साथ है
* CSR का अर्थ सिर्फ कागज नहीं, वास्तविक विकास है
* कंपनी पर सामाजिक जिम्मेदारी है
इसके लिए जरूरी है:
* कानूनी जानकारी
* सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद
* पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का साथ

👩‍👩‍👦 महिलाओं और युवाओं की भूमिका

आज तक आंदोलनों में नेतृत्व पुरुषों तक सीमित रहा है।
लेकिन अगर:
* महिलाएं आगे आएं
* युवा संगठित हों
तो यह आंदोलन और मजबूत होगा।
युवा ही सबसे ज्यादा बेरोजगार हैं और
महिलाएं ही सबसे ज्यादा गरीबी का बोझ उठाती हैं।

🔥 अगर एकता नहीं बनी तो क्या होगा?

अगर यही बिखराव जारी रहा तो परिणाम साफ है:
* आंदोलन कमजोर पड़ेगा
* कंपनी अपना काम निर्बाध चलाएगी
* ठेका कंपनियां बाहर के लोगों को रोजगार देंगी
* गांव फिर वहीं रह जाएंगे—गरीबी, बेरोजगारी और असंतोष में
और आने वाली पीढ़ी पूछेगी:
“जब मौका था, तब आपने एकता क्यों नहीं दिखाई?”

🌍 यह सिर्फ रोजगार की लड़ाई नहीं, अस्तित्व की लड़ाई है

यह संघर्ष केवल नौकरी का नहीं है,
यह लड़ाई है:
* आदिवासी अस्मिता की
* जंगल-जमीन-पानी की
* आत्मसम्मान की
* भविष्य की
अगर आज गांव नहीं जागे, तो कल खदान खत्म होगी और गांव खाली रह जाएंगे।

🪔 निष्कर्ष: एकता ही सबसे बड़ा हथियार

सारंडा के 18 गांवों के लिए सबसे जरूरी संदेश यही है:
लड़ाई कंपनी से नहीं, पहले अपनों के बीच एकता से शुरू करनी होगी।
जब 18 गांव एक स्वर में बोलेंगे,
तब कोई प्रबंधन, कोई ठेका कंपनी उनकी अनदेखी नहीं कर पाएगी।
आज जरूरत है:
* आपसी विवाद खत्म करने की
* व्यक्तिगत अहंकार छोड़ने की
* सामूहिक नेतृत्व अपनाने की
तभी यह आंदोलन सफल होगा।
अन्यथा इतिहास गवाह बनेगा कि
गरीबी से जूझते गांव आपसी फूट के कारण अपना हक खो बैठे।

अंतिम संदेश

“एकता में बल है” — यह केवल नारा नहीं, बल्कि सारंडा के आदिवासियों के भविष्य की कुंजी है।
यदि वे आज संगठित हो गए, तो
रांजाबुरू खदान सिर्फ लौह अयस्क नहीं, उनके बच्चों का भविष्य भी निकालेगी।
लेकिन अगर वे बंटे रहे, तो
फायदा केवल स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड और ठेका कंपनियों को होगा—
और नुकसान 18 गांवों की आने वाली पीढ़ियों को।

SINGHBHUMHALCHAL NEWS

सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

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