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✊ कटोरा लेकर फूटा गुस्सा: गुवा सेल प्रबंधन के खिलाफ सड़क पर उतरे सारंडा के गांव

On: February 27, 2026 2:26 PM
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“हमारी जमीन से लोहा निकले, और हमारे बच्चों के हाथ खाली रहें— अब ऐसा नहीं चलेगा!”

रिपोर्ट: शैलेश सिंह

भूख, बेरोजगारी और अपमान से तंग आ चुके सारंडा के ग्रामीणों ने आखिरकार गुवा सेल प्रबंधन को आईना दिखा दिया।
27 फरवरी को सैकड़ों बेरोजगार युवक-युवतियां, महिलाएं और बुजुर्ग हाथों में कटोरा और तख्तियां लेकर गुवा सेल जनरल ऑफिस के सामने धरने पर बैठ गए।
यह कोई साधारण प्रदर्शन नहीं था, यह उस पीड़ा की चीख थी जिसे वर्षों से दबाया जा रहा था।
यह आंदोलन सीधे तौर पर स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) की गुवा खदान प्रबंधन व्यवस्था के खिलाफ था, जिसने सौ साल से अधिक समय से इस धरती से लोहा निकाला, लेकिन बदले में गांवों को सिर्फ धूल, बीमारी और बेरोजगारी दी।

🥣 कटोरा आंदोलन: “रोजगार नहीं तो भीख ही सही!”

ग्रामीणों ने प्रतीकात्मक रूप से कटोरा उठाकर यह संदेश दिया कि—
“अगर हमारी जमीन से निकले लोहा पर हमारा हक नहीं,
तो हमें भीख मांगने पर मजबूर मत करो।”
कासिया पेचा, राज़ाबेड़ा, जोजोगुटू, तितलीघाट, गंगदा, घाटकुड़ी, गुवासाई, नुइया, ठुकरा, लिपुंगा समेत दर्जनों गांवों से भारी संख्या में लोग इस आंदोलन में पहुंचे।
महिलाएं आगे थीं, युवा आक्रोश में थे और बुजुर्गों की आंखों में सवाल था—
“हमारी पीढ़ी खदान में खप गई, हमारी नई पीढ़ी को नौकरी क्यों नहीं?”

🧭 नेतृत्व में आदिवासी समाज के परंपरागत प्रतिनिधि

आंदोलन का नेतृत्व किया—
मानकी सुरेश चांपिया
मंगता सुरीन
मुंडा कानूराम देवगम
मुंडा बिरसा सुरीन
मुंडा सिंगा सुरीन
मुंडा मंगल पूर्ति
मुंडा चरण चांपिया
मुगा चांपिया
इन नेताओं ने साफ शब्दों में कहा—
“अब सिर्फ ज्ञापन नहीं, निर्णायक लड़ाई होगी।”

📄 15 दिन पहले दिया ज्ञापन, आज तक जवाब नहीं

ग्रामीणों ने बताया कि
13 फरवरी 2026 को लोकल बेरोजगार युवक-युवतियों को रोजगार देने को लेकर धरना देकर मांग पत्र सौंपा गया था।
लेकिन—
* न कोई जवाब
* न कोई बैठक
* न कोई आश्वासन
* 15 दिन बीत गए, प्रबंधन मौन है।
ग्रामीणों ने इसे घोर अपमान बताया।

🏭 106 साल पुरानी खदान, गांव आज भी अंधेरे में

गुवा सेल खदान 1919-20 से संचालित है।
यानि 106-107 साल हो चुके हैं।
लेकिन आज भी—
रोजगार नहीं
✔ अच्छी सड़क नहीं
✔ शुद्ध पेयजल नहीं
✔ उच्च शिक्षा नहीं
✔ आधुनिक अस्पताल नहीं
ग्रामीणों का सवाल सीधा है—
“लोहा निकला, करोड़ों का मुनाफा हुआ, पर गांव को क्या मिला?”

😡 बहाली प्रक्रिया खत्म, मनमानी चालू!

ग्रामीणों का आरोप है कि—
* लोकल बहाली प्रक्रिया को जानबूझकर खत्म कर दिया गया
* बाहरी लोगों को नौकरी दी जा रही है
* बड़े अधिकारियों के रिश्तेदारों को समिति में बैठाकर CSR और पेरिफेरियल डेवलपमेंट की लूट चल रही है
यह सीधा-सीधा आदिवासी अधिकारों का गला घोंटना है।

⚖️ पेसा कानून की चेतावनी: “अब ग्राम सभा तय करेगी”

आंदोलनकारियों ने स्पष्ट कहा—
“अब हमारे हाथ में पेसा कानून की ताकत है।
हमारे गांव में हमारा राज चलेगा।”
ग्राम सभा की अनुमति के बिना अब कोई खदान संचालन नहीं होगा।

📜 मुख्य मांगें: आठ बिंदुओं में अल्टीमेटम

1️⃣ 500 लोकल बेरोजगारों को रोजगार की गारंटी
खदान से प्रभावित गांवों के कम से कम 500 युवक-युवतियों को तुरंत नौकरी।
2️⃣ रिक्त पदों पर अविलंब बहाली
खाली पदों को तुरंत भरा जाए।
3️⃣ पुरानी बहाली प्रक्रिया बहाल हो
जिस प्रक्रिया से स्थानीय लोगों को नौकरी मिलती थी, उसे फिर लागू किया जाए।
4️⃣ 75% बहाली स्थायी निवासियों से
Local Resident Certificate के आधार पर।
5️⃣ 40% महिलाओं को रोजगार
महिलाओं को भी बराबरी का हक।

🌊 ज़हरीली नदियां: जीवन नहीं, बीमारी दे रही हैं

ग्रामीणों ने गंभीर आरोप लगाया कि—
खदान से निकलने वाला प्रदूषित पानी और मल-मूत्र से नदियां जहरीली हो चुकी हैं।
प्रभावित नदियां—
* कासिया पेचा नदी
* जोजोगुटू मार्ग की नदी
* बाईसोकोवा नदी
* रानी चुंआ काबरा सेरेंग नदी
* कुमसुकू झरना
* लोसोडदाः झरना
इन्हीं नदियों में—
* लोग नहाते हैं
* कपड़े धोते हैं
* चूंआ बनाकर पीते हैं
* अंतिम संस्कार करते हैं
परिणाम: त्वचा रोग, पेट की बीमारी, बच्चों में कुपोषण।

⛏️ मशीन नहीं, हैंड माइनिंग की मांग

ग्रामीणों का तर्क साफ है—
“मशीनें रोजगार छीनती हैं,
हैंड माइनिंग रोजगार देती है।”
इसलिए खदान को हैंड माइनिंग से संचालित किया जाए ताकि अनपढ़ गरीबों को काम मिल सके।

🏫 CSR और DMFT पर लूट का आरोप

आठवीं मांग—
CSR और DMFT फंड का पारदर्शी उपयोग हो।
निर्णय ग्राम सभा की निगरानी में हो—
* शिक्षा
* सड़क
* बिजली
* शुद्ध पानी
* स्वास्थ्य
अब अधिकारियों की पत्नियों और रिश्तेदारों की समितियां नहीं चलेंगी।

पांच दिन का अल्टीमेटम

ग्रामीणों ने प्रबंधन को साफ चेतावनी दी—
“पांच दिन के भीतर जवाब दो,
वरना आंदोलन और तेज होगा।”
आने वाले दिनों में—
* खदान बंदी
* सड़क जाम
* उग्र आंदोलन
की चेतावनी दी गई।

🔥 आंदोलन सिर्फ रोजगार नहीं, आत्मसम्मान की लड़ाई

यह आंदोलन सिर्फ नौकरी की मांग नहीं है।
यह—
* जल
* जंगल
* जमीन
* जीवन
* संविधान
की लड़ाई है।
ग्रामीणों ने अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा—
“जीने का अधिकार सिर्फ सांस लेने का नहीं,
सम्मान के साथ जीने का अधिकार है।”

🧨 सवाल जो प्रबंधन से टकराते हैं

* 106 साल में गांव क्यों नहीं बदले?
* CSR का पैसा गया कहां?
* बाहरी लोगों को नौकरी क्यों?
* लोकल युवाओं को क्यों नहीं?
* नदियां क्यों जहरीली हुईं?
इन सवालों का जवाब अब देना ही होगा।

🚩 निष्कर्ष: अब चुप नहीं बैठेगा सारंडा

कटोरा आंदोलन ने साफ कर दिया है कि—
* अब सारंडा झुकेगा नहीं।
* अब मांग पत्र नहीं, फैसला होगा।
* अब भीख नहीं, अधिकार मिलेगा।
अगर गुवा सेल प्रबंधन ने समय रहते समाधान नहीं किया,
तो यह आंदोलन आने वाले दिनों में पूरे कोल्हान को हिला देगा।
“हमारी जमीन से लोहा निकले,
और हमारे बच्चों के हाथ खाली रहें—
अब ऐसा नहीं चलेगा!”
सारंडा की धरती से उठी यह आवाज अब दिल्ली तक गूंजने वाली है।

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सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

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