‘रोजगार नहीं तो खनन नहीं’ का ऐलान, तीसरे दिन भी धधक रहा सारंडा का जंगल
एक रात आंदोलनकारियों के साथ
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
सारंडा के घने जंगल पिछले तीन दिनों से आंदोलन की आग में जल रहे हैं। जिस धरती से देश का लोहा निकलता है, उसी धरती के बेटे आज रोजगार के लिए भटक रहे हैं। 23 फरवरी की सुबह 7:30 बजे से स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) की रांजाबुरु खदान को 18 गांवों के सैकड़ों ग्रामीणों ने अनिश्चितकालीन बंद कर दिया है। यह आंदोलन केवल खदान बंद करने की कार्रवाई नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता, अधिकार और अस्तित्व की खुली लड़ाई बन चुका है।
यह संघर्ष अब सिर्फ रोजगार की मांग नहीं रहा, बल्कि यह सवाल बन गया है—
“क्या आदिवासियों को उनकी ही जमीन पर मजदूर बनने का भी हक नहीं?”
“हमारी जमीन से खनिज निकलेगा और हमारे बच्चे बेरोजगार रहेंगे, यह अब नहीं चलेगा!”

बिना ग्रामसभा अनुमति खदान संचालन का आरोप
ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि रांजाबुरु खदान को
* बिना ग्रामसभा की अनुमति
* बिना मानकी–मुंडाओं की सहमति
* बिना स्थानीय बेरोजगार युवाओं को रोजगार दिए
शुरू कर दिया गया। यह आंदोलन सारंडा विकास समिति, जामकुंडिया–दुईया के बैनर तले चल रहा है, जिसमें पुरुषों के साथ महिलाएं और बुजुर्ग भी डटे हुए हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि आदिवासी अधिकारों पर सीधा हमला है।

ठेका कंपनी पर गंभीर आरोप
आंदोलनकारियों के अनुसार रांजाबुरु खदान का संचालन मां सरला पावर वर्क नामक ठेका कंपनी कर रही है। आरोप बेहद गंभीर हैं—
* खदान में काम करने के लिए पूरी मैनपावर बाहर से लाई गई है
* स्थानीय युवाओं को एक भी स्थायी और सम्मानजनक रोजगार नहीं मिला
* ड्राइवर, ऑपरेटर, हेल्पर, मजदूर – सब बाहरी लोग
ग्रामीणों का गुस्सा साफ शब्दों में फूट पड़ा—
“यह सिर्फ बेरोजगारी नहीं, बल्कि हमारे अधिकारों पर डाका है।”
जब गांवों में सैकड़ों प्रशिक्षित ड्राइवर, हेल्पर और ऑपरेटर मौजूद हैं, तब बाहर से लोगों को बुलाकर काम देना किस नीति का हिस्सा है? यही सवाल आज पूरे सारंडा में गूंज रहा है।

नेतृत्व: मानकी–मुंडाओं की अगुवाई में संघर्ष
इस आंदोलन का नेतृत्व
सारंडा पीढ़ के मानकी लागुड़ा देवगम
मुखिया राजू शांडिल
और सभी 18 गांवों के मुंडा
कर रहे हैं। यह कोई अचानक भड़का आंदोलन नहीं, बल्कि वर्षों की उपेक्षा और धोखे का परिणाम है।
नेताओं का साफ ऐलान है—
“स्थानीय युवाओं को रोजगार नहीं मिला, तो खदान एक पत्थर भी नहीं उखाड़ पाएगी।”

एक रात आंदोलनकारियों के साथ: संघर्ष की असली तस्वीर
24 फरवरी की दोपहर से लेकर रात और फिर अगली सुबह तक लगभग 24 घंटे आंदोलनकारियों के साथ रहकर उनकी दिनचर्या को देखा गया। यह आंदोलन किसी युद्ध से कम नहीं था।
सामूहिक रसोई, जंगल का भोजन
सुबह से ही आंदोलनकारी जंगल से लकड़ी लाते हैं, सामूहिक रूप से चूल्हा जलाते हैं और सभी साथ बैठकर खाना बनाते हैं।

कभी जंगल से कंदमूल खोदकर लाया जाता है, उसे उबालकर या आग में सेंककर खाया जाता है।
कभी जंगल से कुरकुटी (लाल चींटी) लाकर उसकी चटनी बनाई जाती है।
यह भोजन नहीं, बल्कि संघर्ष की रोटी है।

रात का अंधेरा और मौत का डर
रात होते ही आंदोलन स्थल के चारों तरफ आग जलाई जाती है। जंगल के पत्तों और डालियों से झोपड़ीनुमा घर बनाया जाता है।
कुछ लोग वाहनों के नीचे, कुछ अलग-अलग स्थानों पर प्लास्टिक बिछाकर ठंड में सोते हैं।

अंधेरे में सबसे बड़ा खतरा—
विषैला चित्ती (करैत) और अन्य जहरीले सांप।
हर आहट पर लोग चौकन्ने हो जाते हैं। यह सिर्फ आंदोलन नहीं, यह जिंदगी और मौत के बीच डटा पहरा है।

महिलाएं और बुजुर्ग भी मोर्चे पर
इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत हैं महिलाएं और बुजुर्ग।
महिलाएं खाना बनाती हैं, पहरा देती हैं और नारे लगाती हैं—
“रोजगार दो, खदान चलाओ!”
“हमारी जमीन, हमारा हक!”
बुजुर्ग कहते हैं—
“हमने जंगल बचाया, अब अपने बच्चों का भविष्य बचाने निकले हैं।”
वार्ता हुई, पर नतीजा शून्य
आंदोलनकारियों से बात करने सेल गुवा के कुछ अधिकारी पहुंचे, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला।
मुख्य वजह यह रही कि ठेका कंपनी का कोई जिम्मेदार अधिकारी मौके पर मौजूद नहीं था।
बिना निर्णय लेने वाले अधिकारियों के वार्ता करना आंदोलनकारियों को छलावा लगा।
ग्रामीणों ने साफ कहा—
“जब तक ठेका कंपनी सामने नहीं आएगी और रोजगार पर लिखित सहमति नहीं देगी, तब तक खदान बंद रहेगी।”

आंदोलन को मिलने लगा सामाजिक समर्थन
जैसे-जैसे आंदोलन आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे सामाजिक और राजनीतिक संगठनों का समर्थन भी मिलने लगा है।
सारंडा के अलग-अलग इलाकों से लोग आंदोलन स्थल पर पहुंच रहे हैं।
यह अब एक खदान का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे सारंडा का आंदोलन बनता जा रहा है।

सवाल जो सिस्टम से पूछे जा रहे हैं
यह आंदोलन कई तीखे सवाल खड़े करता है—
* क्या खनन केवल कंपनियों के मुनाफे के लिए है?
* क्या आदिवासियों की जमीन पर उनका कोई अधिकार नहीं?
* क्या विकास का मतलब स्थानीय लोगों को बेरोजगार करना है?
* क्या ग्रामसभा केवल कागज की संस्था बनकर रह गई है?
इन सवालों का जवाब सरकार, प्रशासन और कंपनियों को देना ही होगा।

“रोजगार नहीं तो खनन नहीं” – निर्णायक चेतावनी
आंदोलनकारियों का अंतिम और स्पष्ट संदेश है—
“स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा, तभी खदान चलेगी।
वरना रांजाबुरु खदान हमेशा के लिए बंद रहेगी।”
यह चेतावनी सिर्फ एक कंपनी को नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम को है।

सारंडा की लड़ाई: अस्मिता बनाम मुनाफा
सारंडा की यह लड़ाई अस्मिता बनाम मुनाफे की लड़ाई है।
एक तरफ कॉरपोरेट और ठेका कंपनियां हैं, दूसरी तरफ जंगल में रहने वाले वे लोग हैं जिनकी जिंदगी इसी जंगल से जुड़ी है।
यह आंदोलन इतिहास बनेगा—
या तो यह आदिवासियों को उनका हक दिलाएगा,
या यह साबित करेगा कि विकास के नाम पर सबसे पहले कुचले जाने वाले वही लोग हैं, जिनकी जमीन से देश का विकास होता है।
आज रांजाबुरु खदान पर लगा ताला सिर्फ लोहे को नहीं रोक रहा—
यह ताला सवालों को जिंदा रखे हुए है।
और जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलेगा,
सारंडा की आग ठंडी नहीं पड़ेगी।







