गुवा में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई से मचा हड़कंप, सैकड़ों लोग उतरे सड़क पर
गुवा संवाददाता।
गुवा बाजार स्थित डिपासाई और जाटा हाटिंग क्षेत्र में शनिवार को उस वक्त हड़कंप मच गया, जब सेल (SAIL) प्रबंधन ने अचानक अतिक्रमण हटाने की बड़ी कार्रवाई शुरू कर दी। सुबह करीब 11 बजे बुलडोजर के गरजते पहिए जैसे ही विस्थापितों के घरों की ओर बढ़े, पूरे इलाके में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। लोग अपने घरों से बाहर निकल आए और देखते ही देखते सैकड़ों की भीड़ मौके पर जमा हो गई।

भारी पुलिस बल की तैनाती, प्रशासन पूरी तरह अलर्ट
इस अभियान को लेकर जिला प्रशासन पूरी तरह सतर्क नजर आया। मौके पर मजिस्ट्रेट के रूप में अंचलाधिकारी मनोज कुमार तैनात थे। उनके साथ प्रखंड विकास पदाधिकारी पप्पू रजक, इंस्पेक्टर वासुदेव मुंडा समेत गुवा, बड़ाजामदा, नोवामुंडी और किरीबुरू थाना प्रभारी मौजूद रहे।
किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए लगभग 500 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी। पूरे इलाके को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया था।
बुलडोजर चला तो फूटा गुस्सा, नारेबाजी से गूंजा इलाका
जैसे ही बुलडोजर की कार्रवाई शुरू हुई, विस्थापितों का आक्रोश खुलकर सामने आ गया। सैकड़ों की संख्या में लोग इकट्ठा हो गए और प्रशासन के खिलाफ जोरदार नारेबाजी शुरू कर दी।
महिलाएं, बुजुर्ग और युवा—all एकजुट होकर अपने घर बचाने के लिए सड़क पर उतर आए। माहौल कुछ देर के लिए पूरी तरह तनावपूर्ण हो गया।

जनप्रतिनिधि भी पहुंचे, पुनर्वास से पहले हटाने का विरोध
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय जनप्रतिनिधि भी मौके पर पहुंचे। नोवामुंडी भाग-एक की जिला परिषद सदस्य देवकी कुमारी, पूर्वी पंचायत की मुखिया चांदमनी लागुरी और झामुमो नेता मोहम्मद तबारक ने विस्थापितों का खुलकर समर्थन किया।
सभी ने एक स्वर में कहा—
“जब तक हर विस्थापित को नया घर और उसकी चाबी नहीं दी जाती, तब तक कोई भी अपना घर खाली नहीं करेगा।”
तीन घंटे तक टकराव, आंसू गैस तक की बनी नौबत
करीब तीन घंटे तक विरोध प्रदर्शन चलता रहा। हालात इतने तनावपूर्ण हो गए कि प्रशासन ने सख्ती बरतने की तैयारी शुरू कर दी।
भीड़ को हटाने के लिए आंसू गैस के गोले दागने तक की नौबत आ गई थी। हालांकि, प्रखंड विकास पदाधिकारी पप्पू रजक ने मोर्चा संभालते हुए लगातार बातचीत के जरिए स्थिति को काबू में रखने की कोशिश की।

आखिरकार झुका प्रशासन, मौके पर ही निकला समाधान
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अंततः प्रशासन और सेल प्रबंधन को नरमी बरतनी पड़ी। मौके पर ही अधिकारियों और विस्थापितों के बीच वार्ता हुई और एक बीच का रास्ता निकाला गया।
प्रशासन ने घोषणा की—
* जिन लोगों को नए घर की चाबी मिल चुकी है, वे तुरंत पुराने घर खाली करें
* जिनको चाबी नहीं मिली है, उन्हें दो दिनों का समय दिया गया है
यह भी स्पष्ट किया गया कि तय समय के बाद हर हाल में स्थल खाली कराया जाएगा, ताकि सेल का प्रस्तावित प्रोजेक्ट शुरू हो सके।
समझौते के बाद शांत हुआ माहौल
प्रशासन के इस आश्वासन के बाद धीरे-धीरे स्थिति सामान्य होने लगी। जिन लोगों को पहले ही नए घर की चाबी मिल चुकी थी, उन्होंने अपने घर खाली करना शुरू कर दिया।
करीब तीन घंटे तक चला तनाव आखिरकार बातचीत से खत्म हुआ और इलाके में शांति बहाल हुई।

फिर उठे विस्थापन और पुनर्वास के सवाल
इस पूरी घटना ने एक बार फिर विस्थापन और पुनर्वास के मुद्दे को केंद्र में ला दिया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि विकास परियोजनाएं जरूरी हैं, लेकिन प्रभावित परिवारों के पुनर्वास को प्राथमिकता दिए बिना इस तरह की कार्रवाई से विवाद और टकराव की स्थिति पैदा होती है।
लोगों ने मांग की है कि भविष्य में ऐसी किसी भी कार्रवाई से पहले सभी विस्थापितों को पूरी तरह बसाया जाए, ताकि उन्हें सड़क पर उतरकर अपने हक के लिए संघर्ष न करना पड़े।

विकास बनाम विस्थापन: पुराना संघर्ष फिर सामने
गुवा की यह घटना एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है—
क्या विकास की कीमत हमेशा गरीब और विस्थापित ही चुकाएंगे?
जब तक पुनर्वास की व्यवस्था मजबूत और पारदर्शी नहीं होगी, तब तक इस तरह के टकराव होते













