✊ “हमारी जमीन, हमारा जंगल… फिर नौकरी बाहर वालों को क्यों?”
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
18 गांवों का ऐलान – “रोजगार नहीं तो खनन नहीं”
सारंडा के घने जंगलों में स्थित स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल), गुवा की रांजाबुरु खदान पर चल रहा आंदोलन अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है।
लेकिन इस आंदोलन की असली ताकत और पहचान बनकर उभरे हैं — आदिवासी हो समाज युवा महासभा के महासचिव गब्बर सिंह हेंब्रम, गणेश पाट पिंगुवा (केंद्रीय अध्यक्ष, मानकी–मुंडा संघ), चंदन होनहागा (महासचिव) और अन्य वरिष्ठ आदिवासी नेता।
आज यह आंदोलन केवल ग्रामीणों का नहीं, बल्कि संगठित आदिवासी नेतृत्व की खुली चुनौती बन चुका है।

गब्बर सिंह हेंब्रम बने आंदोलन की आवाज
आंदोलन स्थल पर पहुंचकर गब्बर सिंह हेंब्रम ने ग्रामीणों की बात सुनी और स्पष्ट शब्दों में कहा—
“यह सिर्फ रोजगार की लड़ाई नहीं है, यह आदिवासी अधिकारों की लड़ाई है।
जब हमारी जमीन से खनिज निकाला जाएगा, तो पहला हक हमारे युवाओं का होगा।”
उन्होंने आरोप लगाया कि रांजाबुरु खदान का संचालन कर रही ठेका कंपनी मां सरला पावर वर्क ने लगभग 150 मजदूर, ड्राइवर और मशीन ऑपरेटर बाहर से लाकर काम पर लगाया है, जबकि प्रभावित 18 गांवों के एक भी युवक को रोजगार नहीं दिया गया।
गब्बर सिंह हेंब्रम ने इसे सीधा अन्याय बताते हुए कहा—
“यह हमारे संविधान, ग्राम सभा और वन कानूनों का खुला उल्लंघन है।
बिना ग्राम सभा, बिना लोक जन सुनवाई और बिना मानकी–मुंडाओं की सहमति खदान शुरू करना आदिवासी समाज के सम्मान पर हमला है।”

आदिवासी नेताओं की हुंकार – आंदोलन को मिला संगठनात्मक बल
गब्बर सिंह हेंब्रम के साथ आंदोलन स्थल पर पहुंचे—
ओयबन हेंब्रम (जिला सचिव, आदिवासी हो समाज युवा महासभा)
गणेश पाट पिंगुवा (केंद्रीय अध्यक्ष, मानकी–मुंडा संघ)
चंदन होनहागा (महासचिव)
सिकंदर तिरिया
इन नेताओं ने एक स्वर में कहा—
“यह लड़ाई अब सिर्फ गांवों की नहीं, पूरे आदिवासी समाज की लड़ाई है।
अगर आज रांजाबुरु में अन्याय हुआ, तो कल पूरे सारंडा में यही होगा।”
नेताओं ने आंदोलनकारियों को कानूनी लड़ाई के लिए भी तैयार रहने का आह्वान किया।

पानी रोके जाने पर गब्बर सिंह का कड़ा प्रहार
गब्बर सिंह हेंब्रम ने बताया कि आंदोलन स्थल तक पानी ले जाने से रोका जा रहा है, जिसे उन्होंने अमानवीय कृत्य बताया।
उन्होंने कहा—
“हमने पुलिस अधीक्षक और एसडीओ से बात कर आग्रह किया है कि आंदोलन स्थल तक पानी पहुंचाने से किसी भी प्रकार की रोक नहीं लगाई जाए।
आंदोलन शांतिपूर्ण है, इसे दबाने की कोशिश गलत है।”
“अब लड़ाई सड़क पर भी और कानून में भी” – गब्बर सिंह का ऐलान
गब्बर सिंह हेंब्रम ने आंदोलनकारियों को संबोधित करते हुए कहा—
“अब यह संघर्ष सिर्फ धरना-प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहेगा।
हम झारखंड माइंस एंड मिनरल्स, फॉरेस्ट एक्ट, ग्राम सभा अधिकार और पर्यावरण कानूनों के तहत इस लड़ाई को कानूनी रूप से भी लड़ेंगे।”
उन्होंने ग्रामीणों से कहा कि अपने अधिकारों को समझें और संगठित रहें।

मानकी–मुंडा नेतृत्व में आंदोलन को मिली पारंपरिक वैधता
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं—
सारंडा पीढ़ के मानकी लागुड़ा देवगम
मुखिया राजू शांडिल
कई गांवों के मुंडा और पारंपरिक नेता
मानकी–मुंडा परंपरा के नेतृत्व से आंदोलन को सामाजिक और सांस्कृतिक वैधता मिली है, जिससे प्रशासन पर दबाव और बढ़ गया है।
बड़ा सवाल – विकास किसके लिए?
यह आंदोलन आज एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है—
क्या विकास का मतलब आदिवासियों को उनकी ही जमीन पर मजदूर बनने से भी वंचित करना है?
क्या खनिज संपदा पर पहला अधिकार स्थानीय लोगों का नहीं?







