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मंत्री दीपक बिरुवा की जन-विकास सोच और सारंडा विकास समिति की हुंकार से झुका खनन तंत्र

On: March 3, 2026 6:08 PM
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“हमारी जमीन–हमारा जंगल, फिर नौकरी बाहर वालों को क्यों?” — रांजाबुरु आंदोलन की ऐतिहासिक जीत

रिपोर्ट: शैलेश सिंह / संदीप गुप्ता

“रोजगार नहीं तो खनन नहीं”, “हमारी जमीन–हमारा जंगल… फिर नौकरी बाहर वालों को क्यों?” जैसे गगनभेदी नारों के साथ बीते 23 फरवरी से जारी रांजाबुरु खदान आंदोलन आखिरकार 3 मार्च की शाम निर्णायक मुकाम पर पहुंच गया।
यह आंदोलन सिर्फ मजदूरी या ठेका का सवाल नहीं था, बल्कि आदिवासी अस्मिता, अधिकार और सम्मान की लड़ाई थी।
इस ऐतिहासिक संघर्ष को दिशा और समाधान तक पहुंचाने में झारखंड सरकार के परिवहन, राजस्व, निबंधन व भूमि सुधार मंत्री दीपक बिरुवा और सारंडा विकास समिति की निर्णायक भूमिका रही।
नौ दिनों तक चले इस अनिश्चितकालीन आंदोलन ने साबित कर दिया कि अगर आदिवासी समाज संगठित हो जाए, तो सरकारी तंत्र और खनन प्रबंधन को भी झुकना पड़ता है।

 

नौ दिनों का संघर्ष: खदान पर जनता का पहरा

मानकी लगुड़ा देवगम और मुखिया राजू शांडिल के नेतृत्व में सारंडा के 18 गांवों के ग्रामीणों ने एकजुट होकर खदान के सभी कामों को पूरी तरह ठप कर दिया।
सारंडा विकास समिति, जामकुंडिया–दुईया के बैनर तले चला यह आंदोलन दिन-ब-दिन उग्र होता गया।
ग्रामीणों का स्पष्ट ऐलान था—
“जब तक 75 प्रतिशत स्थानीय रोजगार नहीं मिलेगा, तब तक खनन नहीं चलेगा।”
खदान में काम कर रही ठेका कंपनियों द्वारा बाहरी मजदूरों की भरती, स्थानीय युवाओं की अनदेखी और पर्यावरणीय संकट ने इस आंदोलन को ज्वालामुखी बना दिया।

मंत्री दीपक बिरुवा का हस्तक्षेप: सत्ता का रुख बदला

आंदोलन के नौवें दिन स्वयं मंत्री दीपक बिरुवा आंदोलन स्थल पर पहुंचे।
उनके साथ मौजूद थे—
* सेल के मुख्य महाप्रबंधक चंद्रभूषण कुमार
* ठेका कंपनी मां सरला प्राइवेट वर्क्स के प्रतिनिधि
* एसडीओ महेंद्र छोटन उरांव
* बीडीओ पप्पू रजक
यहीं से आंदोलन ने निर्णायक मोड़ लिया।
घंटों चली त्रिपक्षीय वार्ता (ग्रामीण–प्रबंधन–प्रशासन) के बाद चारों प्रमुख मांगों पर सहमति बनी।

चार मांगें, चार बड़े फैसले: आंदोलन की असली जीत

आंदोलनकारियों ने चार ठोस मांगें रखी थीं, जिन्हें अब आधिकारिक सहमति मिली—
मांग संख्या 1: 75 प्रतिशत स्थानीय रोजगार की गारंटी
सबसे बड़ी और केंद्रीय मांग थी—
“रांजाबुरु खदान में 75 प्रतिशत रोजगार स्थानीय आदिवासी युवाओं को दिया जाए।”
इस पर निर्णय लिया गया कि—
खदान से प्रभावित गांवों के युवाओं को उनकी योग्यता के अनुसार
प्राथमिकता के आधार पर
सभी श्रेणी के कार्यों में नियुक्त किया जाएगा
यह फैसला सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि प्रशासनिक सहमति के रूप में दर्ज किया गया।
यह निर्णय झारखंड सरकार की 75% स्थानीय नियोजन नीति को जमीन पर उतारने की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।
मांग संख्या 2: जल छिड़काव का कार्य समिति को
दूसरी बड़ी मांग थी कि—
सड़क पर पानी छिड़काव जैसे कार्य स्थानीय समिति को सौंपे जाएं।
इस पर सहमति बनी कि—
सड़क पर पानी छिड़काव का कार्य
सारंडा विकास समिति, जामकुंडिया–दुईया को अभी से सौंपा जाएगा
जिससे स्थानीय युवाओं को सीधा रोजगार मिलेगा
यह फैसला ठेका कंपनियों के एकाधिकार पर करारा प्रहार माना जा रहा है।
मांग संख्या 3: रैक लोडिंग और ट्रांसपोर्टिंग में स्थानीय हिस्सेदारी
तीसरी मांग थी—
रैक लोडिंग, ट्रांसपोर्टिंग और अन्य तकनीकी कार्यों में भी स्थानीय लोगों को हिस्सेदारी दी जाए।
इस पर कहा गया कि—
संबंधित सीओटी (क्लियरेंस) प्राप्त होते ही
चरणबद्ध बैठक कर
स्थानीय भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी
यह मांग आगे के संघर्ष की आधारशिला मानी जा रही है।
मांग संख्या 4: पर्यावरण और प्रदूषण पर ठोस कार्ययोजना
चौथी मांग थी—
कारो नदी में फैल रहे प्रदूषण का स्थायी समाधान किया जाए।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि—
* खदान का अपशिष्ट नदी में मिल रहा है
* पानी जहरीला हो रहा है
* बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है
इस पर मंत्री दीपक बिरुवा ने कहा कि—
“पर्यावरण से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
दोषी पाए गए तो कंपनी के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी।”

पेसा कानून और पांचवीं अनुसूची: प्रशासन कटघरे में

11 गांव मुंडा-मानकी रैयत संघ ने मंत्री को अलग से मांग पत्र सौंपा।
ग्रामीणों ने कहा—
“यह क्षेत्र संविधान की पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून के अंतर्गत आता है, फिर भी ग्रामसभा से अनुमति नहीं ली गई।”
संघ ने मांग की—
* ग्रामसभा की सहमति अनिवार्य हो
* CSR और DMFT फंड का उपयोग
* शिक्षा
* शुद्ध पेयजल
* स्वास्थ्य
* महिलाओं-बच्चों के विकास पर हो
* इसकी निगरानी ग्रामसभा करे
यह सीधे-सीधे प्रशासनिक लापरवाही पर आरोप था।

“वादे नहीं निभे तो होगा इससे बड़ा आंदोलन” — दीपक बिरुवा

मंत्री दीपक बिरुवा ने मंच से स्पष्ट चेतावनी दी—
“अगर स्थानीय युवाओं के अधिकारों की अनदेखी हुई,
तो सेल प्रबंधन के खिलाफ इससे भी बड़ा आंदोलन होगा।”
उनके इस बयान ने आंदोलनकारियों में नया आत्मविश्वास भर दिया।

सारंडा में जश्न, संघर्ष की जीत

वार्ता के बाद आंदोलन समाप्ति की घोषणा हुई।
माहौल बदला—
ढोल-नगाड़े बजे
नारे गूंजे
मिठाइयां बांटी गईं
ग्रामीणों ने कहा—
“यह जीत सिर्फ रोजगार की नहीं,
यह हमारी पहचान और सम्मान की जीत है।”

राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की एकजुटता

इस आंदोलन में झामुमो और सामाजिक संगठनों की मजबूत भूमिका रही।
प्रमुख रूप से उपस्थित रहे—
जिलाध्यक्ष सोनाराम देवगम
जिला सचिव राहुल आदित्य
केंद्रीय सदस्य अभिषेक सिंकु
प्रेम गुप्ता
बृंदावन गोप
दुर्गा देवगम
आलोक टोपनो
मोहम्मद तबारक सहित सैकड़ों कार्यकर्ता
साथ ही मानकी-मुंडा संघ, हो समाज युवमहासभा और महिलाओं की भागीदारी ने आंदोलन को सामाजिक ताकत दी।

कोल्हान टाइगर और समिति का आभार

आंदोलनकारियों ने सबसे पहले मंत्री दीपक बिरुवा को धन्यवाद देते हुए कहा—
“उनकी मध्यस्थता से ही यह आंदोलन सम्मानजनक अंत तक पहुंचा।”
इसके साथ ही पुलिस-प्रशासन, मीडिया, गांवों के मुंडा-मानकी, मातृशक्ति और पत्रकारों के प्रति भी आभार जताया गया।

यह सिर्फ आंदोलन नहीं, चेतावनी है

रांजाबुरु आंदोलन ने स्पष्ट संदेश दिया—
अब आदिवासी समाज अपनी जमीन पर भीख नहीं मांगेगा,
बल्कि अधिकार लेकर रहेगा।
यह आंदोलन आने वाले समय में झारखंड के सभी खनन क्षेत्रों के लिए मिसाल बनेगा।

निष्कर्ष: दीपक बिरुवा की जन-विकास सोच और जनता की एकता की जीत

रांजाबुरु खदान आंदोलन यह साबित करता है कि—
जब नेतृत्व जनपक्षीय हो
जब जनता संगठित हो
और जब मुद्दा अधिकार का हो
तो खनन कंपनियां और प्रशासन दोनों को झुकना पड़ता है।
दीपक बिरुवा की विकास सोच और सारंडा विकास समिति की संघर्षशील भूमिका ने यह दिखा दिया कि—
विकास वही है जिसमें आदिवासी का हक सुरक्षित हो।
खनन वही चलेगा जिसमें स्थानीय का सम्मान होगा।
सारंडा आज सिर्फ राहत की सांस नहीं ले रहा, बल्कि अपने अधिकारों की जीत का इतिहास रच रहा है।

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