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“हर चौकी पर हथियार रसद… नारा देंगे तब उलगुलान, हिंसा से दूर रहेंगे हम”

On: February 24, 2026 3:21 PM
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रांजाबुरु खदान आंदोलन उग्र: मानकी लगुड़ा देवगम व मुखिया राजू शांडिल का संयुक्त ऐलान

सारंडा जंगल के इतिहास से उठा विद्रोह — ‘रोजगार नहीं तो खनन नहीं’ का अंतिम संदेश

रिपोर्ट: शैलेश सिंह

सारंडा के घने जंगल एक बार फिर इतिहास के मोड़ पर खड़े हैं। जिस जंगल ने सदियों से आदिवासियों को जीवन दिया, अकाल में भी भूखा नहीं मरने दिया, उसी जंगल से निकले लोहा पर आज बाहरी ताकतों का कब्जा हो रहा है और जंगल के असली वारिस बेरोजगार बनाए जा रहे हैं।
रांजाबुरु खदान पर चल रहा आंदोलन अब केवल रोजगार की मांग नहीं, बल्कि सारंडा जंगल की आत्मा और आदिवासी अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है।


आंदोलन स्थल पर सबसे तेज गूंजता नारा है—
“हर चौकी पर हथियार रसद, पहले से कुछ रख लेंगे हम…
नारा देंगे तब उलगुलान, हिंसा से दूर रहेंगे हम…”
यह नारा केवल चेतावनी नहीं, बल्कि आदिवासी इतिहास से निकला संकल्प है—
अन्याय के खिलाफ संघर्ष होगा, लेकिन अपने अधिकार के लिए।

सारंडा जंगल का इतिहास: अकाल में भी जीवन देने वाला वन

मानकी लगुड़ा देवगम और मुखिया राजू शांडिल ने संयुक्त बयान में कहा—
“सारंडा जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, यह हमारा जीवन है।
जब पूरा देश अकाल और भुखमरी से जूझता था, तब यही जंगल हमें महुआ, कंद-मूल, सालबीज, फल-फूल और औषधियां देकर जिंदा रखता था।”
इतिहास गवाह है कि जब सरकारी राशन व्यवस्था नहीं थी, तब सारंडा के जंगल आदिवासियों के लिए प्राकृतिक अनाजघर थे।
यही जंगल—
* भूख से लड़ने की ताकत देता रहा
* बीमारी में औषधि बना
* बच्चों का भविष्य और बुजुर्गों की लाठी बना
लेकिन आज वही जंगल मशीनों की गर्जना में कट रहा है और उसके बदले आदिवासियों को रोजगार तक नहीं दिया जा रहा।

“हमारी जमीन से लोहा, लेकिन हमारे बच्चों को बेरोजगारी”

मानकी लगुड़ा देवगम ने तीखे शब्दों में कहा—
“जिस धरती ने हमें सदियों तक पाला, उसी धरती से अब लोहा निकाला जा रहा है।
लेकिन हमारे युवाओं को काम नहीं, सिर्फ धूल और विस्थापन दिया जा रहा है।”
उन्होंने कहा कि पहले जंगल कटे, फिर वनोत्पाद घटे, फिर खेती प्रभावित हुई और अब जब खदान से उम्मीद जगी थी, तो वह भी बाहरी मजदूरों को दे दी गई।
यह केवल आर्थिक अन्याय नहीं, बल्कि आदिवासी स्वाभिमान पर सीधा हमला है।

“पानी तक नहीं भेजा गया — यह मानवता पर हमला”

आंदोलन और उग्र तब हो गया जब 23 फरवरी की शाम तक न तो सेल, गुवा प्रबंधन का कोई अधिकारी वार्ता के लिए पहुंचा और न ही खनन कर रही ठेका कंपनी का कोई प्रतिनिधि।
संयुक्त बयान में कहा गया—
“हमने सेल, गुवा खदान के उप महाप्रबंधक (सीएसआर) अनिल कुमार को फोन कर आंदोलन स्थल पर कम से कम पानी टैंकर भेजने का आग्रह किया था।
आंदोलनकारी प्यास से बेहाल थे, लेकिन पानी नहीं भेजा गया।
यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि मानवता के खिलाफ अपराध है।”
आंदोलनकारियों का आरोप है कि उन्हें जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है ताकि वे थककर पीछे हट जाएं।

“हर चौकी पर हथियार रसद” बना आंदोलन की पहचान

आज रांजाबुरु खदान के मुख्य द्वार पर संघर्ष का जो स्वरूप दिखा, वह केवल धरना नहीं बल्कि चेतावनी था। आंदोलनकारियों ने एक स्वर में कहा—
“हर चौकी पर हथियार रसद…
उलगुलान हमारा अधिकार है।”
यह नारा इतिहास की याद दिलाता है—
जब आदिवासियों ने अन्याय के खिलाफ उलगुलान किया था।
नेतृत्व ने साफ कहा कि आंदोलन शांतिपूर्ण है, लेकिन अपमान और शोषण को अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

“हम जंगल में जीना जानते हैं, अपमान में नहीं”

मुखिया राजू शांडिल ने आंदोलनकारियों को संबोधित करते हुए कहा—
“हम आदिवासी विकट परिस्थितियों में जीना जानते हैं।
बिना भोजन और बिना पानी भी जंगल के वनोत्पाद के सहारे जी सकते हैं।
लेकिन अपने हक और आत्मसम्मान से समझौता नहीं करेंगे।”
यह बयान केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि पूरे आंदोलन का राजनीतिक और सामाजिक संदेश है।

कंपनी और प्रशासन पर सीधा सवाल

ग्रामीणों ने सवाल उठाए—
* क्या आंदोलनकारियों को पानी देना भी प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं?
* क्या कॉरपोरेट मुनाफा जंगलवासियों के जीवन से बड़ा हो गया है?
* क्या ग्राम सभा और मानकी-मुंडा परंपरा की कोई कीमत नहीं?
उनका कहना है—
“हम हिंसा नहीं चाहते, लेकिन अपमान सहकर चुप भी नहीं बैठेंगे।”

 

“रोजगार नहीं तो खनन नहीं” अंतिम चेतावनी

मानकी लगुड़ा देवगम और मुखिया राजू शांडिल ने दो टूक शब्दों में कहा—
“हम भीख नहीं मांग रहे।
हमारी जमीन से जो लोहा निकलेगा, पहला अधिकार हमारे युवाओं का होगा।
कम से कम 75 प्रतिशत रोजगार स्थानीय बेरोजगारों को देना ही होगा।”
उन्होंने चेतावनी दी कि अगर मांगें नहीं मानी गईं, तो आंदोलन पूरे सारंडा में फैलाया जाएगा।

Steel Authority of India Limited की भूमिका पर सवाल

अब निगाहें सीधे Steel Authority of India Limited और जिला प्रशासन पर टिकी हैं।
सवाल साफ है—
* क्या वे संवाद का रास्ता अपनाएंगे?
* या सारंडा को टकराव की ओर धकेलेंगे?
यदि पानी जैसी बुनियादी जरूरत भी नहीं दी जाती, तो यह साबित करता है कि आदिवासी संघर्ष को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा।

जंगल का इतिहास बनाम मशीनों की सत्ता

सारंडा का जंगल गवाही देता है कि उसने अकाल में भी अपने लोगों को भूखा नहीं मरने दिया।
आज वही लोग अपनी जमीन पर हक के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
सारंडा से उठी यह गर्जना अब पूरे सिस्टम के लिए चुनौती है—
“हर चौकी पर हथियार रसद…
उलगुलान हमारा अधिकार है…
रोजगार नहीं तो खनन नहीं।”
अब फैसला प्रशासन और कंपनी को करना है—
संवाद या टकराव?

यह आंदोलन सारंडा विकाश समिति के अध्यक्ष सह गंगदा पंचायत के मुखिया सुखराम शांडिल उर्फ राजू शांडिल, समिति के सचिव सह सारंडा पीढ़ के मानकी लागूड़ा देवगम के नेतृत्व में प्रारंभ किया गया है। इसमें राजाबेड़ा के मुंडा जामदेव चांपिया, रोवाम के मुंडा बुधराम सिद्धू, दीऊ मेघराज सिद्धू, नुइआ के मुंडा दूरसू चांपिया, दुईआ मुंडा जानुम सिंह चेरवा, लेंबरे मुंडा लेबेया देवगम, पंचायत समिति सदस्य रामेश्वर चांपिया, जामकुंडिया- छोटा जामकुंडिया मुंडा कुशू देवगम, गंगदा के समाजसेवी  कैलाश सुरीन, सुरेश तैसुम, चरण सिंह चांपिया, काशिया पेंचा के दीऊरी रोथो सुरीन, बुद्धा देवगम, चरण सुरीन, मोहन सुरीन, सेर्गेया चांपिया आदि सैकड़ों मौजूद हैं।

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