ग्रामीणों ने परंपरा, संस्कृति और आजीविका बचाने की उठाई आवाज, सरकार बोली – जनता की राय सर्वोपरि
गुवा संवाददाता।
सारंडा वन क्षेत्र को वाइल्ड लाइफ सेंचुरी घोषित करने की तैयारी पर रोवांम फुटबॉल मैदान में आयोजित आम सभा सरकार और ग्रामीणों के बीच सीधी टकराहट का मंच बन गई। लगभग ढाई हजार ग्रामीण जुटे और तीन घंटे तक जोरदार बहस चली। तीर-धनुष और नारों के बीच ग्रामीणों ने स्पष्ट कहा – “हमारी संस्कृति, परंपरा और आजीविका पर किसी भी कीमत पर आंच नहीं आने देंगे।”

डीएफओ के भाषण से शुरू हुई सभा
सभा की शुरुआत सारंडा डीएफओ अभिरूप सिन्हा के संबोधन से हुई। उन्होंने सेंचुरी बनाने के सरकार के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह क्षेत्र जैव विविधता और वन्य जीव संरक्षण के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन जैसे ही ग्रामीणों को बोलने का मौका मिला, विरोध की आवाजें गूंजने लगीं।
तीर-धनुष के साथ विरोध प्रदर्शन
दर्जनों ग्रामीणों ने मंच पर आकर तीर-धनुष लहराते हुए नारेबाजी की। वक्ताओं का कहना था कि सेंचुरी बनने से उनके मवेशी चराने, लघु वनोपज संग्रह, जल-जंगल-जमीन पर पारंपरिक अधिकार और त्योहार-परंपराएं संकट में पड़ जाएंगी।
ग्रामीणों की स्पष्ट चेतावनी
ग्रामसभा की अनुमति के बिना किसी भी तरह का निर्णय स्वीकार नहीं होगा। रामेश्वर चांपिया, अमर सिंह सिद्धू, बुद्धराम सिद्धू और कृष्णा टोपनो समेत कई वक्ताओं ने आरोप लगाया कि खनन कंपनियां और उद्योग जंगल व नदियों को तबाह कर रहे हैं, लेकिन स्थानीय लोगों को रोजगार नहीं मिल रहा। ऐसे में सेंचुरी बनाना आदिवासी समाज पर सीधा हमला होगा।

मंत्री दीपक बिरुवा ने दिया आश्वासन
सभा की अध्यक्षता कर रहे झारखंड सरकार के मंत्री दीपक बिरुवा ने ग्रामीणों की बात ध्यान से सुनी। उन्होंने कहा –
“ग्रामीणों की विरासत, सांस्कृतिक धरोहर, जीवकोपार्जन की विधि और उनकी भावनाओं को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष रखा जाएगा। सरकार लोकतांत्रिक व्यवस्था का सम्मान करती है और जनता की राय को सर्वोपरि मानकर ही आगे की प्रक्रिया तय होगी।”
नेताओं और अधिकारियों की मौजूदगी
सभा में सांसद जोबा माझी, विधायक सोनाराम सिंकू और जगत माझी, जिला परिषद सदस्य लक्ष्मी सोरेन, उपायुक्त चंदन कुमार और पुलिस अधीक्षक अमित रेणु समेत बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि और अधिकारी मौजूद रहे।
विकास बनाम अधिकार की जंग
सभा के अंत में यह साफ हो गया कि सारंडा में अब “विकास बनाम अधिकार” की जंग छिड़ गई है। एक ओर पर्यावरण और वन्य जीव संरक्षण की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर आदिवासी समाज की परंपरा, संस्कृति और आजीविका दांव पर है। अब फैसला सर्वोच्च न्यायालय और सरकार की पहल पर निर्भर करेगा।









