ग्रामीण कार्य विभाग में टेंडर घोटाले की बू अभियंताओं पर लटक रही कार्रवाई की तलवार
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
झारखंड के ग्रामीण कार्य विभाग में इस समय जो हालात बने हुए हैं, वह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि व्यवस्थित अव्यवस्था, अंदरूनी मिलीभगत और संभावित भ्रष्टाचार की कहानी बयां कर रहे हैं।
राज्य में सड़क और पुल निर्माण जैसे बुनियादी कार्य ठप पड़े हैं, हजारों करोड़ की योजनाएं अधर में लटकी हैं और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह सब किसी लिखित आदेश से नहीं, बल्कि “मंत्री के मौखिक निर्देश” के नाम पर किया गया।
अब विभागीय सचिव मनोज कुमार इस पूरे प्रकरण पर सख्त रुख अपनाते हुए अभियन्ता प्रमुख मनोहर कुमार, सरवन कुमार और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ प्रपत्र ‘क’ गठित कर विभागीय कार्रवाई की तैयारी में हैं।

मौखिक आदेश या सुनियोजित खेल?
सबसे बड़ा सवाल यही है—
👉 क्या किसी राज्य का विकास “मौखिक आदेश” पर रोका जा सकता है?
सूत्रों के अनुसार—
* विभागीय मंत्री के मौखिक निर्देश पर निविदा प्रक्रिया रोक दी गई
* कोई लिखित आदेश जारी नहीं हुआ
* इसके बावजूद पूरे राज्य में टेंडर प्रक्रिया ठप कर दी गई
👉 यह स्थिति खुद में कई सवाल खड़े करती है—
* क्या यह नियमों का खुला उल्लंघन नहीं?
* क्या अधिकारियों ने जानबूझकर इस “मौखिक आदेश” को ढाल बनाया?
रुका विकास, थमी सड़कें, अधूरे पुल
निविदा प्रक्रिया रुकने का असर सीधे जमीन पर दिख रहा है—
🔻 ग्रामीण सड़कें अधूरी
गांवों को जोड़ने वाली सड़कें बीच में ही रुक गई हैं
🔻 पुल निर्माण ठप
नदियों पर बनने वाले पुल अधूरे पड़े हैं
🔻 योजनाएं कागजों में कैद
हजारों करोड़ की योजनाएं फाइलों में धूल खा रही हैं
👉 सबसे ज्यादा असर पड़ा है—
गांव के आम लोगों पर, जिनके लिए ये परियोजनाएं जीवनरेखा थीं।
💰 कमिशन का खेल? आरोपों ने मचाई सनसनी
विभागीय सूत्रों का बड़ा खुलासा—
“अभियन्ता वर्ग कमिशन वसूली के लिए जानबूझकर निविदा प्रक्रिया को लंबित रखे हुए हैं।”
👉 मतलब साफ है—
* टेंडर रोका गया
* समय बीता
* लागत बढ़ी
* फिर नए शर्तों पर काम देने की तैयारी
👉 यह पूरा खेल कमीशन आधारित सिस्टम की ओर इशारा करता है।
सचिव का सख्त रुख: अब नहीं चलेगा खेल
विभागीय सचिव मनोज कुमार ने—
* समय पर टेंडर निष्पादन का निर्देश दिया
* देरी पर नाराजगी जताई
* दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की तैयारी शुरू की
👉 सूत्रों के अनुसार—
* प्रपत्र ‘क’ गठित किया जाएगा
* विभागीय जांच शुरू होगी
* निलंबन तक की कार्रवाई संभव
निलंबन की तलवार: कौन-कौन रडार पर?
सूत्रों के मुताबिक—
👉 अभियन्ता प्रमुख मनोहर कुमार
👉 अभियन्ता सरवन कुमार
👉 अभियन्ता अवधेश कुमार
इन सभी पर कार्रवाई की तलवार लटक रही है।
👉 सीएम हाउस इस मामले को लेकर बेहद गंभीर है।
सीएम हेमन्त सोरेन की नाराजगी
सूत्र बताते हैं—
“मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ग्रामीण विकास में बाधा बनने वालों से बेहद नाराज हैं।”
👉 असम चुनाव के बाद—
* बड़े स्तर पर कार्रवाई हो सकती है
* अधिकारियों और अभियंताओं पर गाज गिर सकती है
संवेदकों का भारी नुकसान: कौन देगा जवाब?
इस पूरे खेल में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है—
👉 संवेदकों (ठेकेदारों) का
🔻 बिड वैलिडिटी खत्म
एक साल से अधिक समय बीत गया
अब दोबारा बिड वैलिडिटी बढ़ाने का दबाव
🔻 बिड वैलिडिटी के अंदर निविदा निष्पादन होता तो संवेदकों को emd की राशि का ब्याज आज एक साल तक बैंकों को भरने पर मजबूर नहीं होना पड़ता
जब समय पर टेंडर नहीं हुआ, तो जिम्मेदार कौन?
लागत में भारी बढ़ोतरी: 15000 प्रति टन का झटका
सूत्रों के अनुसार—
* सामग्री की कीमतों में भारी उछाल
* अलकतरा की कीमत में 15000 रुपये प्रति टन तक बढ़ोतरी
👉 अब संवेदकों के सामने संकट—
* पुरानी दर पर काम संभव नहीं
* नई दर का भुगतान नहीं
👉 यह सीधा आर्थिक शोषण है।
DPR में गड़बड़ी: बंद खदान से कैसे आएगा स्टोन चिप्स?
एक और बड़ा मुद्दा सामने आया—
* DPR में जिस खदान से स्टोन चिप्स लाने का प्रावधान था
* वह खदान अब बंद हो चुकी है
👉 सवाल—
* क्या DPR अपडेट होगा?
* अतिरिक्त लागत कौन देगा?
अलकतरा (बिटुमेन) की कीमतों में उछाल
अलकतरा की कीमत लगातार बढ़ रही है
लेकिन DPR पुरानी दरों पर आधारित
👉 संवेदकों की मांग—
DPR में संशोधन किया जाए
ED और ACB की एंट्री: बढ़ेगी मुश्किलें
सूत्रों के अनुसार—
🧾 ED का शिकंजा
* कई अभियंताओं को सम्मन
* सेवा वापस लेने पर विचार
🔎 ACB की जांच
* आय से अधिक संपत्ति की जांच
* भ्रष्टाचार के मामलों की पड़ताल
👉 यह मामला अब केवल विभागीय नहीं, बल्कि कानूनी जांच का विषय बन चुका है।
सेवानिवृत्त अभियंता भी रडार पर
* रिटायर्ड इंजीनियरों पर भी कार्रवाई संभव
* ED के आधार पर विभाग जांच करेगा
👉 मतलब—
“कोई भी बख्शा नहीं जाएगा”
❗ बड़ा सवाल: जिम्मेदार कौन?
इस पूरे मामले में कई सवाल खड़े हो रहे हैं—
❓ 1. मौखिक आदेश किसने दिया?
❓ 2. लिखित आदेश क्यों नहीं जारी हुआ?
❓ 3. टेंडर क्यों रोका गया?
❓ 4. लागत बढ़ने का जिम्मेदार कौन?
❓ 5. संवेदकों का नुकसान कौन भरेगा?

संवेदकों में आक्रोश: “हम क्यों भुगतें?”
संवेदकों का साफ कहना है—
“हमने नियमों के तहत बिड किया, अब देरी की सजा हमें क्यों?”
👉 उनका आरोप—
* विभागीय लापरवाही
* जानबूझकर देरी
* आर्थिक नुकसान
संभावित घोटाले की गंध
पूरे मामले को जोड़कर देखें तो—
👉 यह केवल लापरवाही नहीं लगती
👉 बल्कि एक सुनियोजित टेंडर मैनेजमेंट सिस्टम की ओर इशारा करती है
जहां—
* टेंडर रोका जाता है
* समय बढ़ाया जाता है
* लागत बढ़ती है
* फिर “सेटिंग” के तहत काम दिया जाता है
आगे क्या?
संभावित घटनाक्रम—
* प्रपत्र ‘क’ गठन
* विभागीय जांच
* निलंबन
* ED/ACB कार्रवाई
* DPR संशोधन
विकास बनाम भ्रष्टाचार की लड़ाई
झारखंड का यह मामला अब एक बड़ी परीक्षा बन चुका है—
👉 क्या सरकार दोषियों पर कार्रवाई करेगी?
👉 क्या संवेदकों को न्याय मिलेगा?
👉 क्या ग्रामीण विकास पटरी पर लौटेगा?
या फिर—
👉 यह मामला भी फाइलों में दब जाएगा?
🔴 अंतिम चेतावनी
अगर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई—
👉 तो न सिर्फ विकास रुकेगा
👉 बल्कि सरकार की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठेंगे













