जल–जंगल–जमीन की लड़ाई : आदिवासियों का असली सवाल
विशेष रिपोर्ट, शैलेश सिंह
झारखंड का सारंडा एशिया का सबसे बड़ा साल वन है। लेकिन यह जंगल आज दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ खनन कंपनियों का लालच, दूसरी तरफ सेंचुरी बनाकर जंगल बचाने की उम्मीद। सवाल बड़ा है—क्या आदिवासी खदान की धूल और बीमारी में जिएंगे या पर्यटन और प्रकृति संरक्षण से समृद्ध जीवन पाएंगे?

धोबिल गांव के वीर सिंह हंसदा कहते हैं,
“हम खदान से क्या पाए? हमारे खेत बंजर, पानी जहरीला, बच्चे बेरोजगार। अगर सेंचुरी बनेगी तो कम से कम हमारी अगली पीढ़ी कुछ पाएगी।”
खनन का सौ साल का हिसाब : फायदा किसको?
सारंडा में खनन कोई नई बात नहीं।
* चिड़िया में सबसे पहली खदान खुली।
* उसके बाद किरीबुरु, मेघाहातुबुरु, गुआ और दर्जनों प्राइवेट खदानें।
सवाल है: इतने सालों में कितना विकास हुआ?
* न सड़कें बनीं, न अस्पताल।
* न अच्छे स्कूल–कॉलेज।
* न रोजगार की गारंटी।
नवागांव की महिला यशोदा मुंडा कहती हैं,
“हमारे लोग खदान में मजदूरी करते थे। मजदूरी से घर नहीं चलता था। बीमारी होती है तो इलाज तक नहीं मिलता।”

खनन का जहर : लाल पानी और बंजर खेत
खनन से निकला लाल पानी नदियों और कुओं में बहा।
* इससे पीने का पानी दूषित हुआ।
* बच्चों और महिलाओं में पेट–त्वचा की बीमारियां फैलीं।
* खेतों में जमी लाल मिट्टी ने धान और मक्का की खेती चौपट कर दी।
राजाबेडा मुंडा जामदेव चांपिया बताते हैं,
“खनन क्षेत्र के गांवों में सबसे ज्यादा मलेरिया, टीबी और पाचन रोग हैं। साफ पानी और स्वच्छ हवा दोनों खत्म हो चुके हैं।”
सेंचुरी बनेगी तो पर्यटन का नया मॉडल
अगर सारंडा सेंचुरी बनता है तो यहां खनन बंद होगा और इको–टूरिज्म का रास्ता खुलेगा।
* आदिवासी परिवार होम स्टे चला सकेंगे।
* युवा गाइड, ट्रैवल सर्विस और होटल में काम पाएंगे।
* महिलाएं महुआ, लाह, हस्तकला और पारंपरिक व्यंजन बेच सकेंगी।
सोमवारी हेंब्रम, महिला समिति की सदस्या कहती हैं,
“हमको बाहर मजदूरी करने नहीं जाना पड़ेगा। पर्यटक आएंगे तो हम अपने गांव में ही दुकान, होटल और सेवा देंगे।”

दूसरे राज्यों से सीख
मध्यप्रदेश के बांधवगढ़, कान्हा, पन्ना सेंचुरी के आदिवासी आज भी उसी जंगल में रहते हैं। लेकिन वहां उनका जीवनस्तर बेहतर हुआ।
- वहां उद्योग नहीं, पर्यटन है।
- पर्यटक सालभर आते हैं और आदिवासी उनसे कमा–खा रहे हैं।
- जल–जंगल–जमीन भी बचा हुआ है।
क्या सारंडा के लोग नहीं चाहेंगे कि उनका इलाका भी खुशहाली और पर्यावरण–सुरक्षा का मॉडल बने?
जम्मू–कश्मीर से सीख : कैसे पर्यटन ने जिंदगी बदली
जम्मू–कश्मीर खनन से नहीं, बल्कि पर्यटन से प्रसिद्ध हुआ।
* गुलमर्ग, पहलगाम, श्रीनगर की डल झील हर साल लाखों पर्यटक खींचती है।
* वहां के लोग होटल, हाउसबोट, गाइड, हस्तशिल्प और खाने–पीने से कमाते हैं।
* युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलता है और संस्कृति भी बची रहती है।
क्या सारंडा के लोग नहीं चाहेंगे कि उनका इलाका भी कश्मीर की तरह पर्यटक आकर्षण बने?

हिमाचल की मिसाल : प्रकृति से रोजगार
हिमाचल प्रदेश में शिमला, मनाली, कुल्लू, धर्मशाला, स्पीति जैसे क्षेत्र पर्यटन से फल–फूल रहे हैं।
* वहां के स्थानीय लोग होम स्टे, टैक्सी, होटल से सालभर कमाते हैं।
* सेब और अन्य फसलों के साथ पर्यटन ने वहां की अर्थव्यवस्था को मजबूत किया है।
पर्यावरणविद् डॉ. राकेश सिंह कहते हैं,
मध्यप्रदेश ने दिखा दिया कि अगर सेंचुरी वाले जंगल और पहाड़ सुरक्षित रखे जाएं तो वही रोजगार का सबसे बड़ा साधन बन जाते हैं।”
मसूरी–देहरादून : शिक्षा और पर्यटन का संगम
उत्तराखंड के देहरादून और मसूरी आज देश–विदेश के लोगों की पसंद हैं।
* यहां टूरिज्म और एजुकेशन दोनों उद्योग फले–फूले।
* स्थानीय लोग पर्यटकों से होटल–रेस्टोरेंट चलाकर रोज़गार पा रहे हैं।
* जंगल और पहाड़ सुरक्षित रखे गए हैं, जिससे प्राकृतिक आकर्षण बढ़ा है।
सारंडा में भी यही संभावनाएं हैं। यहां साल वनों की हरियाली और प्राकृतिक झरनों को अगर बचाया जाए तो यह इलाका भी देश–विदेश के पर्यटकों के लिए आकर्षण बन सकता है।

सेंचुरी का विरोध क्यों और कौन कर रहा है?
सेंचुरी बनने का विरोध कौन कर रहा है?
* वे नेता, जो खदानों का लीज देकर कमीशन खाते हैं।
* वे पूंजीपति घराने, जो खनन से अरबों का मुनाफा चाहते हैं।
* वे ठेकेदार, जो आदिवासियों को मजदूर बनाए रखना चाहते हैं।
चंद्राराम मुंडा, कहते हैं,
“अगर सेंचुरी बनेगी तो नेताओं और कंपनियों का धंधा बंद हो जाएगा। इसलिए वे हमें गुमराह कर रहे हैं।”
खनन बनाम सेंचुरी : सीधी तुलना
पहलू–खनन कंपनियों का राज–सेंचुरी का विकल्प
रोजगार–ठेका मजदूरी, बीमारी, पलायन–स्थाई पर्यटन आधारित काम
पर्यावरण– जंगल उजड़े, मिट्टी–पानी बर्बाद–जल, जंगल, जमीन सुरक्षित
स्वास्थ्य– लाल पानी, टीबी, मलेरिया– स्वच्छ वातावरण और रोजगार से इलाज
शिक्षा– कोई बड़ा स्कूल–कॉलेज नहीं– पर्यटन आय से शिक्षा में निवेश
सामाजिक स्थिति– गरीबी, बेकारी कायम– आत्मनिर्भरता और संस्कृति का संरक्षण

सरकार की असली परीक्षा
आज सारंडा के आदिवासी पूछ रहे हैं—
* क्या सरकार खनन कंपनियों के साथ है या जनता के?
* क्या सरकार लूट की परंपरा जारी रखेगी या जंगल बचाकर पर्यटन आधारित विकास का रास्ता चुनेगी?
गांव के युवा अरविंद पूर्ति कहते हैं,
“अगर सरकार हमारी है तो सेंचुरी बनाए। अगर खदान देती है तो समझो सरकार हमारी दुश्मन है।”
पर्यावरण और अर्थव्यवस्था का संतुलन
खनन से अल्पकालिक लाभ है, लेकिन पर्यावरणीय नुकसान स्थायी है।
* जंगल खत्म होंगे तो बारिश का पैटर्न बदलेगा।
* नदियां सूखेंगी।
* खेती चौपट होगी।
सेंचुरी बनेगी तो—
* जंगल सुरक्षित रहेंगे।
* इको–टूरिज्म और रोजगार मिलेगा।
* आने वाली पीढ़ी को स्वच्छ हवा और पानी मिलेगा।
आदिवासी जनता की अंतिम पुकार
सारंडा की जनता का नारा अब साफ है—
“सारंडा बचेगा तो सेंचुरी से, लूटेगा तो खदान से।”
“जल–जंगल–जमीन हमारी है, इसे पूंजीपतियों को नहीं देंगे।”

नतीजा : सारंडा के लिए सेंचुरी ही भविष्य
सौ साल का खनन बता चुका है कि इससे आदिवासियों को कुछ नहीं मिला।
* न शिक्षा, न स्वास्थ्य, न स्थाई नौकरी।
* सिर्फ बर्बादी और बीमारी।
* जम्मू–कश्मीर, हिमाचल, देहरादून–मसूरी जैसे उदाहरण बताते हैं कि प्रकृति को बचाकर ही विकास और रोजगार संभव है।










