ग्रामीणों के हित सुरक्षित, रोजगार और पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
सारंडा में प्रस्तावित सेंचुरी का सच
झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में फैला घना सारंडा जंगल देश–दुनिया में अपने प्राकृतिक वैभव और लौह अयस्क की संपदा के लिए जाना जाता है। अब यहां लगभग 575 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को वन्यजीव सेंचुरी (Wildlife Sanctuary) के रूप में विकसित करने की योजना पर चर्चा तेज है।

इस योजना को लेकर गांव–गांव में दिग्भ्रमित करने वाली कई बातें फैल रही हैं। ग्रामीणों को यह डर दिखाया जा रहा है कि सेंचुरी बनने से उनकी जमीन, आजीविका और परंपरागत अधिकार छिन जाएंगे। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।
जानकारों का कहना है कि प्रस्तावित सेंचुरी से सारंडा के अंदर बसे किसी भी राजस्व गांव और वन ग्राम को कोई खतरा नहीं है। यहां तक कि जंगल में सक्रिय लौह अयस्क की खदानों पर भी इसका कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा।
कितने गांव प्रभावित होंगे?
सारंडा क्षेत्र में वर्तमान में 10 वन ग्राम और 60 से अधिक राजस्व गांव हैं। इनमें से केवल 6 वन ग्राम और दर्जनों राजस्व गांव ही प्रस्तावित सेंचुरी क्षेत्र के अधीन आएंगे।
➡️ यहां यह समझना जरूरी है कि “प्रभावित” होने का अर्थ किसी गांव को उजाड़ना या विस्थापित करना नहीं है।
➡️ सेंचुरी का मतलब केवल वन्यजीव संरक्षण और पर्यटन विकास है।
➡️ गांव के स्कूल, सड़क, बिजली, सरना–मसना स्थल, जाहेर थान या किसी भी धार्मिक व सांस्कृतिक स्थल पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

खनन गतिविधियां सुरक्षित
सारंडा लौह अयस्क की विशाल संपदा के लिए प्रसिद्ध है। यहां बड़े पैमाने पर खनन कंपनियां सक्रिय हैं। ग्रामीणों को भ्रमित करने के लिए कहा जा रहा है कि सेंचुरी बनने से ये खदानें बंद हो जाएंगी और रोजगार खत्म हो जाएगा।
लेकिन तथ्य यह है कि –
- पहले से चालू खदानों पर कोई असर नहीं होगा।
- सेंचुरी क्षेत्र को इस तरह सीमांकित किया गया है कि मौजूदा खदानें उसके दायरे से बाहर रहें।
- केवल नई खदान खोलने की प्रक्रिया जटिल हो सकती है।
इसका सीधा अर्थ है कि झारखंड और देश की अर्थव्यवस्था तथा रोजगार पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा।
ग्रामीणों को क्यों डर दिखाया जा रहा है?
स्थानीय स्तर पर कुछ स्वार्थी तत्व ग्रामीणों में यह अफवाह फैला रहे हैं कि सेंचुरी बनने से –
- पत्ता तोड़ने पर रोक लगेगी
- माहुआ, लाख, जंगली फल–फूल और लकड़ी के संग्रह पर पाबंदी होगी
- पारंपरिक गतिविधियां बंद कर दी जाएंगी
लेकिन अब तक राज्य के 11 सेंचुरी और 1 नेशनल पार्क से जुड़े अनुभव बताते हैं कि यह डर निराधार है।
👉 झारखंड के किसी भी सेंचुरी क्षेत्र में ग्रामीणों की पारंपरिक गतिविधियों पर कभी रोक नहीं लगी।
👉 ग्रामीण वहां खेती करते हैं, जंगल से वन उपज लाते हैं, आजीविका चलाते हैं।
👉 सेंचुरी बनने से उल्टा वहां के ग्रामीणों को पर्यटन और विकास योजनाओं से फायदा मिला है।

झारखंड का अनुभव : गांव और सेंचुरी साथ–साथ
झारखंड में पहले से 11 वन्यजीव अभयारण्य (Sanctuaries) और 1 राष्ट्रीय उद्यान (Betla National Park) मौजूद हैं।
इनमें लावलौंग, दलमा, हजारीबाग, महुआडांड़, पलामू, पलकोट, उधवा झील, टोपचांची, कोडरमा, गौतम बुद्ध और पारसनाथ सेंचुरी शामिल हैं।
इन क्षेत्रों में –
- गांव आज भी मौजूद हैं।
- ग्रामीण अपने पारंपरिक तरीके से जीवन जी रहे हैं।
- कहीं भी विस्थापन या अधिकार हनन का मामला सामने नहीं आया।
बल्कि सेंचुरी के कारण –
- पर्यटन बढ़ा
- स्थानीय लोगों को रोजगार मिला
- इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास हुआ
सारंडा को सेंचुरी बनने से फायदे
1. पर्यावरण और जल–जंगल–जमीन की सुरक्षा
सेंचुरी घोषित होने से जंगल की अवैध कटाई और शिकार पर नियंत्रण लगेगा। इससे पारंपरिक जलस्रोत और जैव–विविधता सुरक्षित होगी।
2. ग्रामीणों का आय स्रोत बढ़ेगा
पर्यटन से जुड़ी गतिविधियां – गाइड, होमस्टे, परिवहन, हस्तशिल्प – स्थानीय लोगों को रोजगार देंगी।
3. पलायन रुकेगा
आज सारंडा के युवा रोजगार की तलाश में बड़े शहरों की ओर पलायन करते हैं। सेंचुरी बनने से गांव में ही रोजगार के अवसर बनेंगे और यह पलायन रुकेगा।
4. ग्रामीणों के अधिकार सुरक्षित रहेंगे
जिन्हें वन पट्टा मिला है या भविष्य में मिलने वाला है, उनके अधिकारों पर सेंचुरी का कोई असर नहीं होगा।
5. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान
सारंडा को “एशिया का सबसे बड़ा साल वन” कहा जाता है। सेंचुरी बनने के बाद यह क्षेत्र वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर और मजबूती से उभरेगा।

गोवा से सबक
विशेषज्ञ बताते हैं कि सारंडा सेंचुरी बनने के बाद इसका फायदा ठीक वैसे ही होगा जैसे गोवा में हुआ।
- गोवा में खदानें भी हैं, लेकिन स्थानीय लोगों की आमदनी का सबसे बड़ा स्रोत पर्यटन है।
- खनन से लाभ कंपनियों और सरकार को होता है, जबकि पर्यटन से सीधा फायदा ग्रामीणों और स्थानीय उद्यमियों को मिलता है।
ग्रामीणों की चिंताएं और समाधान
ग्रामीणों का कहना है कि –
- “हमारे सरना–मसना और जाहेर स्थल छीन लिए जाएंगे।”
- “हम जंगल से लकड़ी और पत्ता नहीं ला पाएंगे।”
लेकिन वन विभाग के अधिकारियों और जानकारों का दावा है कि –
- धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों को कोई नहीं छेड़ेगा।
- पारंपरिक गतिविधियां पूरी तरह से सुरक्षित रहेंगी।
- ग्रामीणों को भ्रमित करने के बजाय उन्हें सही जानकारी दी जानी चाहिए।
भविष्य की राह
1990 के दशक से सारंडा को सेंचुरी घोषित करने की चर्चा होती रही है। अब यदि यह योजना साकार होती है तो –
- झारखंड के पास कुल 12 सेंचुरी और 1 नेशनल पार्क हो जाएंगे।
- यह राज्य की पर्यावरणीय धरोहर और पर्यटन क्षमता दोनों को मजबूत करेगा।
निष्कर्ष
सारंडा सेंचुरी को लेकर जो डर और भ्रांतियां फैलाई जा रही हैं, वे तथ्यों पर आधारित नहीं हैं।
सच्चाई यह है कि –
- गांव, संस्कृति, अधिकार और परंपराएं पूरी तरह सुरक्षित रहेंगी।
- खनन गतिविधियां पहले की तरह चलती रहेंगी।
- नई खदानें जरूर मुश्किल होंगी, लेकिन इससे प्राकृतिक संतुलन सुरक्षित रहेगा।
- ग्रामीणों को पर्यटन आधारित रोजगार मिलेगा और पलायन रुकेगा।
👉 इसलिए सारंडा सेंचुरी सिर्फ जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा का कदम नहीं, बल्कि यह ग्रामीणों की आर्थिक उन्नति और क्षेत्रीय विकास का नया रास्ता है।










