भारत आदिवासी पार्टी ने उठाया बड़ा सवाल, कहा — खनन माफिया और राजनीति की साजिश में उलझा सारंडा का भविष्य
रिपोर्ट — शैलेश सिंह।
एशिया के सबसे बड़े साल वृक्षों के घने जंगल, दुर्लभ वन्यजीवों और समृद्ध जैव विविधता से भरे सारंडा वन को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है — क्या झारखंड सरकार सच में सारंडा को वाइल्डलाइफ सेंचुरी बनाना चाहती है या यह सिर्फ दिखावटी पहल है?

आज दिनांक 7 अक्टूबर 2025 को भारत आदिवासी पार्टी के पश्चिम सिंहभूम जिलाध्यक्ष सुशील बारला ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर सरकार की नीयत पर तीखा सवाल उठाया। उन्होंने कहा —
“सरकार एक तरफ विभागीय अधिकारियों के माध्यम से सेंचुरी का प्रस्ताव भेजती है, और दूसरी तरफ उन्हीं ग्रामीणों को भ्रमित कर विरोध करवाती है। आखिर सरकार की मंशा साफ क्यों नहीं है?”
एशिया की सबसे बड़ी साल वन श्रृंखला — लेकिन लहूलुहान है सारंडा
सुशील बारला ने कहा कि सारंडा की 700 पहाड़ियों की यह श्रृंखला एशिया की सबसे बड़ी साल (Shorea robusta) वन संपदा है। यहां हाथी, तेंदुआ, भालू, सांभर, हिरण, मोर और अनगिनत पक्षियों का प्राकृतिक निवास है।
“यही सारंडा, जिसे कभी ‘ग्रीन स्टील’ कहा जाता था, आज लाल पानी, लाल मिट्टी और लाल खून से रंग चुका है।”
सारंडा को पहले रिजर्व फॉरेस्ट घोषित किया गया था ताकि इसकी जैव विविधता की रक्षा हो सके। लेकिन अब जब इसे अभयारण्य (सेंचुरी) के रूप में विकसित करने की बात हो रही है, तो खनन कंपनियों और राजनीतिक दलों में बेचैनी बढ़ गई है।

खनन का लाल पानी — सरंडा की हरी धरती का अभिशाप
भारत आदिवासी पार्टी ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि सारंडा के अंदर और आसपास के गांवों को खनन की कीमत अपने जीवन से चुकानी पड़ रही है।
गुवा, चिरिया, किरीबुरू और मेघाहातुबुरु — इन चार बड़े लौह अयस्क क्षेत्रों ने सारंडा के चेहरे को बदलकर रख दिया।
- गुवा माइन्स का लाल पानी आज जोजोगुटू, सेतारूईया, जमकुडीया, राजबेड़ा जैसे गांवों की बहुफसली जमीन को बंजर बना चुका है।
- चिरिया माइन्स से निकलने वाला प्रदूषित जल दुबिल और हेन्देदिरी गांव तक पहुंच चुका है।
“जहां कभी धान, मकई और सब्जी की फसलें लहलहाती थीं, आज वहां केवल लाल धूल उड़ती है।”
मुआवजा नहीं, केवल आश्वासन — ग्रामीणों का दर्द अनसुना
प्रभावित किसानों ने वर्षों तक खान प्रबंधन से मुआवजा और रोजगार की मांग की, लेकिन नतीजा सिर्फ कागजी भरोसे तक सीमित रहा।

सुशील बारला ने कहा —
“1918 में चिरिया और 1970 में गुवा माइन्स की स्थापना हुई, लेकिन आज भी 3 से 6 किलोमीटर की परिधि में बसे गांवों में पीने का पानी, सड़क और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं।”
इन इलाकों की महिलाएं और बच्चे आज भी एनीमिया और मलेरिया से जूझ रहे हैं। सदी भर पुराने माइन्स के बावजूद यहां के लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन काट रहे हैं।
चार महीने में चार हाथियों की मौत — सेंचुरी की ज़रूरत या साजिश?
बारला ने कहा कि सिर्फ पिछले तीन महीनों में चार से अधिक गजराजों (हाथियों) की मौत हो चुकी है। यह साबित करता है कि सारंडा की जैव विविधता खतरे में है।
“ग्रीन स्टील का प्रतीक साल वृक्ष अब विलुप्ति के कगार पर है। खनन, सड़क कटाई और अवैध लकड़ी कारोबार ने जंगल की आत्मा को नोच डाला है।”
उन्होंने कहा कि अगर सरकार वास्तव में पर्यावरण संरक्षण को लेकर गंभीर है, तो उसे खनन कंपनियों के खिलाफ सख्त कदम उठाना चाहिए, न कि सिर्फ अभयारण्य के नाम पर ग्रामीणों को गुमराह करना।
सरकार से सीधा सवाल — सेंचुरी का प्रस्ताव किसने दिया?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि सारंडा को वन्य अभयारण्य बनाने का प्रस्ताव किसने दिया?
अगर यह प्रस्ताव झारखंड सरकार के विभागीय अधिकारियों द्वारा तैयार किया गया था, तो फिर सरकार सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों पर अमल करने में देरी क्यों कर रही है?
“क्या यह टालमटोल नीति सिर्फ इसलिए है कि खनन कंपनियों के हित प्रभावित न हों?”
बारला ने सरकार से मांगा कि वह साफ करे —
क्या वह सेंचुरी के पक्ष में है या नहीं?
अगर है, तो सेंचुरी की पूरी कार्य-योजना सार्वजनिक करे।
अगर नहीं, तो ग्रामीणों को भ्रम में क्यों रखा जा रहा है?
ग्रामीणों को जानकारी क्यों नहीं दी गई?
सुशील बारला ने प्रशासन पर आरोप लगाया कि छोटानागरा और रोवाम में हुई आम सभाओं में ग्रामीणों को न तो निमंत्रण दिया गया, न ही सेंचुरी से जुड़ी कोई जानकारी साझा की गई।
“क्या ग्रामीण मानकी-मुंडा, मांझी-पहान को बुलाया गया था? क्या गांवों को बताया गया कि सेंचुरी से उनके क्या अधिकार रहेंगे या खत्म हो जाएंगे?”
उन्होंने कहा कि सरकार का रवैया केवल “भड़काने” वाला रहा — जहां जानकारी की जगह डर और भ्रम फैलाया गया।
आदिवासी संस्कृति में प्रकृति ही देवता है
भारत आदिवासी पार्टी ने स्पष्ट किया कि सारंडा के आदिवासी और जंगल के जीवों का रिश्ता साझा जीवन का रिश्ता है।
आदिवासी समाज न तो अंधाधुंध शिकार करता है, न ही पेड़ों को अंधाधुंध काटता है।
वे केवल त्योहारों में परंपरागत शिकार करते हैं — वह भी पहाड़ देवता से प्रार्थना के बाद, यह कहते हुए कि गर्भवती जानवरों पर उनका तीर न लगे।
“आदिवासी जंगल को देवता मानते हैं, और जंगल ही उनका जीवन है।”
ऐसे समुदाय को सेंचुरी के नाम पर विस्थापित करना, उनके अस्तित्व से खिलवाड़ होगा।

1918 से अब तक — विकास नहीं, विनाश की कहानी
सारंडा में खनन की शुरुआत 1918 में चिरिया से हुई थी। आज 100 साल बाद भी यहां के ग्रामीणों की हालत नहीं बदली।
सड़कें टूटी हैं, बिजली अधूरी है, अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं।
“खनन ने केवल कंपनियों को समृद्ध किया है, जंगल और इंसान दोनों को गरीब।”
बारला ने कहा कि यह विडंबना है कि जिस क्षेत्र से देश को इस्पात की ताकत मिलती है, वहीं के लोग आज भी मिट्टी के चूल्हे पर जिंदगी जला रहे हैं।
सेंचुरी के नाम पर राजनीति — कौन कर रहा है फायदा?
भारत आदिवासी पार्टी ने आरोप लगाया कि खनन कंपनियां, लकड़ी माफिया और कुछ राजनीतिक चेहरे मिलकर सारंडा को अभयारण्य के मुद्दे पर तोड़ने की साजिश कर रहे हैं।
“छोटानागरा और रोवाम की सभाओं में ग्रामीणों को चारपहिया वाहनों से लाया गया। सवाल है — इसका खर्च किसने दिया?”
उन्होंने कहा कि यह पूरा खेल उन ताकतों का है जो सारंडा के जंगल और जमीन को अपने कब्जे में रखना चाहती हैं।
ग्रामीणों में भ्रम — सरकार की अदूरदर्शिता का परिणाम
अभयारण्य के फायदे-नुकसान, विस्थापन और अधिकारों को लेकर ग्रामीणों के बीच कोई स्पष्टता नहीं है।
नतीजतन, लोग भ्रमित हैं —
कुछ इसे विकास समझते हैं, कुछ इसे विस्थापन की शुरुआत।
“अगर सरकार ईमानदार है, तो सेंचुरी की पूरी जानकारी सार्वजनिक करे। लोगों को बताए कि किसे लाभ होगा और किसे हानि।”
सारंडा को बचाना है तो अपनाना होगा ‘सतत विकास’
बारला ने कहा कि सारंडा को बचाने का एकमात्र रास्ता है — “सतत विकास की पद्धति”।
अर्थात ऐसा विकास जो पर्यावरण, रोजगार और जनजीवन — तीनों का संतुलन बनाए रखे।
“अगर सरकार ने खनन कंपनियों के हित में निर्णय लिया, तो सारंडा सिर्फ इतिहास बनकर रह जाएगा।”
उन्होंने कहा कि अब समय है कि सरकार खनन नीति की समीक्षा करे, जैव विविधता की सुरक्षा सुनिश्चित करे और आदिवासी समाज को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करे।

आखिरी सवाल — सारंडा किसका? सरकार का या जनता का?
भारत आदिवासी पार्टी का सवाल सीधा है —
“सारंडा वाइल्डलाइफ सेंचुरी के पक्ष में सरकार है या नहीं? अगर हां, तो कार्रवाई करे; अगर नहीं, तो भ्रम फैलाना बंद करे।”
आरंडा सिर्फ एक जंगल नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता, पर्यावरण की धरोहर और झारखंड की पहचान है।
और जब पहचान खतरे में हो, तो सवाल उठाना जरूरी हो जाता है।
(समापन टिप्पणी)
सारंडा की गूंज आज एक बार फिर सरकार के गलियारों तक पहुंची है।
क्योंकि सवाल सिर्फ पेड़-पौधों का नहीं — यह इंसानों, हाथियों और आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व का सवाल है।
अगर सरकार ने अब भी स्पष्ट रुख नहीं अपनाया, तो आने वाले वर्षों में सारंडा केवल खनन की राख और मरे हुए हाथियों की खबरों में सिमट जाएगा।









