भारत की सबसे बड़ी नक्सल-सफाई में हिडमा का खात्मा… अब बस्तर में कौन उठाएगा लाल आतंक का झंडा?
लाल आतंक का सबसे बड़ा कसाई गिरा
रिपोर्ट शैलेश सिंह।
छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में वर्षों से पनप रहे लाल आतंक को भारतीय सुरक्षा बलों ने आखिरकार सबसे बड़ा झटका दे दिया। एक करोड़ के इनामी, झीरम नरसंहार का खूनी, दंतेवाड़ा हमले का सरगना, और सुकमा-बीजापुर की मौत का सौदागर—माओवादी कमांडर मादवी हिडमा अब ढेर है।
हिडमा के मारे जाने की खबर सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि तीनों सशस्त्र बलों के मनोबल, स्थानीय आदिवासी समाज की सुरक्षा, और माओवादी तंत्र की रीढ़ पर सीधा प्रहार है।

यह सिर्फ एक नक्सली की मौत नहीं—यह दशकों से बस्तर में फैले खून-खराबे के एक युग का अंत है।
हिडमा कौन था? — एक साधारण लड़का कैसे मौत का व्यापारी बना
आदिवासी बच्चा से जंगल का जल्लाद
1981 में छत्तीसगढ़ के सुकमा के पुवर्ती गांव में जन्मा हिडमा (मादवी हिडमा) बस्तर की ही मिट्टी का था। एक साधारण जनजातीय परिवार से निकलकर वह भारत के सबसे खतरनाक गुरिल्ला कमांडरों में से एक कैसे बना—यह कहानी बस्तर की उस त्रासदी का नमूना है जिसे नक्सलवाद ने दशकों तक बोया।
सबसे कम उम्र का माओवादी केंद्रीय सदस्य
हिडमा सिर्फ एक स्थानीय दस्ता कमांडर नहीं था।
वह सीपीआई (माओवादी) की 21 सदस्यीय केंद्रीय समिति का सबसे कम उम्र का सदस्य था।
यह वह स्तर है जहाँ पहुंचना किसी को 15–20 साल के खूनी अनुभव की जरूरत होती है।
हिडमा न सिर्फ पहुंचा—बल्कि प्लानिंग, लॉजिस्टिक्स और अटैक स्ट्रेटेजी में सबसे खतरनाक दिमाग माना जाता था।
1 करोड़ रुपये का इनामी—भारत का सबसे खतरनाक मोस्ट वांटेड
सरकार ने उस पर 1 करोड़ रुपये का इनाम रखा था।
वह सिर्फ वांटेड नहीं था—
भारत के शीर्ष 5 मोस्ट वांटेड आतंकियों में शामिल था।
कम से कम 26 बड़े हमलों का मास्टरमाइंड
सुरक्षा एजेंसियों की सूची में दर्ज है:
- 2010 दंतेवाड़ा हमला — 76 जवान शहीद
- 2013 झीरम घाटी नरसंहार — शीर्ष कांग्रेस नेता मारे गए
- 2017 सुकमा हमला — 25 जवान शहीद
- 2021 सुकमा-बीजापुर हमला — 22 जवान शहीद
इनके अलावा दर्जनों IED ब्लास्ट, अपहरण, पुलिस चौकी ध्वस्त करने और लूट के मामले उसके नाम दर्ज हैं।
PLGA बटालियन नंबर 1 — माओवादियों की सबसे घातक सेना का मुखिया
हिडमा की सबसे बड़ी ताकत थी उसका नियंत्रण PLGA बटालियन नंबर 1 पर।
यह वही यूनिट है जो:
- अचानक जंगल बंद करने की रणनीति अपनाती,
- सैकड़ों कैडर लेकर घात लगाती,
- सुरक्षाबलों की टुकड़ी को घेरकर खत्म कर देती।
यह यूनिट माओवादी युद्ध मशीन का दिल थी, और हिडमा उसका सुप्रीम कमांडर।
जंगल की रणनीति का शातिर खिलाड़ी
हिडमा को जंगलों के रास्ते ऐसे याद थे जैसे किसी शहर के लड़के को सड़कें याद हों।
वह पेड़ों के सुराग, जमीन की नमी, माटी के रंग और नदी के बहाव से सुरक्षा बलों की मौजूदगी का अनुमान लगा लेता था।
चालबाज़ी के कुछ उदाहरण:
- IED को 7 फीट नीचे दबाना
- IED को दोतरफा कनेक्शन देना
- सुरक्षा बलों को एक दिशा में खींचकर पीछे से घेरना
- ग्रामीणों के बीच छिपकर अचानक हमला करना
- दो घंटे की लड़ाई में ही लोकेशन बदल देना
इसीलिए उसे ghost guerrilla भी कहा जाता था।
झीरम घाटी नरसंहार—हिडमा की सबसे खूनी पहचान
2013 का झीरम कांड भारत के राजनीतिक इतिहास की सबसे बर्बर घटनाओं में से एक था।
माओवादी दस्ते ने एक-एक कर कांग्रेस नेताओं को मौत के घाट उतारा।
इस हमले का मुख्य आर्किटेक्ट हिडमा था।
इस घटना ने पूरे देश को हिला दिया था।
आज भी बस्तर का कोई घर ऐसा नहीं जहाँ इस हमले की चर्चा न हो।
2010 दंतेवाड़ा हमला—भारत के सुरक्षा इतिहास का काला दिन
जिस दिन 76 जवानों की लाशें जंगल से निकली थीं—उसी दिन से हिडमा का नाम देश की सुरक्षा एजेंसियों के ब्लैकलिस्ट में सबसे ऊपर दर्ज हो गया था।
- जवानों को खुली पहाड़ी पर फंसाया गया
- महिलाओं और बच्चों को ढाल बनाकर हमला किया गया
- बड़े बैरल बम फोड़े गए
- मृत जवानों के हथियार लूट लिए गए
यह हिडमा की सबसे डरावनी और निर्मम रणनीति मानी जाती है।
2021 सुकमा-बीजापुर हमला—हिडमा का जंगल वाला खेल
22 जवान एक ऐसे जाल में फंस गए जिसे हिडमा ने महीनों पहले प्लान किया था।
- सुरक्षा बलों को 5 किलोमीटर अंदर बुलाया गया
- चार तरफ से पहाड़ और घने जंगल
- 400 माओवादी जमीन में छिपे थे
- 8–10 घंटे तक लड़ाई चली
- जवानों की लाशों से हथियार लूटे गए
यह हमला हिडमा की गुरिल्ला युद्ध शैली की सबसे बड़ी मिसाल था।
उसके गिरने से माओवादी ढांचा चरमरा गया
यह सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं—
यह माओवादी युद्ध प्रणाली का टूटना है।
हिडमा:
- प्लानर
- फील्ड कमांडर
- रिक्रूटर
- ऑपरेशनल हेड
- IED विशेषज्ञ
- जनजातीय समाज पर पकड़ रखने वाला चेहरा
सबकुछ एक साथ था।
उसके मरने से:
- PLGA बटालियन 1 का नेतृत्व खाली हो गया
- बस्तर में गुरिल्ला ऑपरेशन ठप पड़ गए
- माओवादी गांवों को दबाव में नहीं रख पा रहे
- हथियारों की सप्लाई चेन बिगड़ गई
- नया उत्तराधिकारी खोजने में माओवादी उलझ गए
दूसरी पत्नी राजे उर्फ़ राजक्का का भी अंत
इस मुठभेड़ में हिडमा के साथ उसकी दूसरी पत्नी राजे/राजक्का भी मारी गई।
वह सिर्फ पत्नी नहीं थी—
वह महिला गुरिल्ला दस्ते की प्रमुख सदस्य थी।
राजक्का कई बार घात योजनाओं में शामिल रही थी और गांवों के बीच माओवादी संदेश फैलाने की महत्वपूर्ण कड़ी थी।
उसका मारा जाना भी माओवादियों के लिए तगड़ा झटका है।
अब बस्तर में क्या बदलेगा? — मौत से बड़ी है यह प्रतीकात्मक जीत
हिडमा की मौत के असर कई स्तरों पर दिखेंगे:
सुरक्षा बलों का मनोबल आसमान पर
दशकों से जिस “लाल भूत” को पकड़ने की कोशिश हो रही थी—वह खत्म हो चुका है।
माओवादी नेटवर्क को नेतृत्व संकट
अब उग्रवादी कैडर बिखरेंगे, आदेश सुनने से झिझकेंगे।
आदिवासी समाज में डर कम होगा
हिडमा का नाम ही गांवों में आतंक था।
अब ग्रामीण खुलकर सरकार से जुड़ सकते हैं।
सड़क, शिक्षा, अस्पताल जैसे विकास कार्य अब तेजी पकड़ेंगे
जिन इलाकों में हिडमा प्रवेश नहीं होने देता था—वह अब खुल जाएंगे।
माओवादी चेन के टूटने से नए भर्ती बंद
नए युवाओं को जंगल में खींचने वाला सबसे बड़ा प्रचारक मर चुका है।
क्या यह अंत है या नए नक्सलवाद की शुरुआत?
हिडमा का अंत निश्चय ही भारत की सबसे बड़ी माओवादी-रोधी सफलता है।
लेकिन जंगलों में लड़ी जाने वाली जंग सिर्फ बंदूक से नहीं जीती जाती—
यह जंग है विकास, विश्वास और राज्य की मौजूदगी की।
अगर सरकार अब बस्तर में:
- सड़क
- स्कूल
- हॉस्पिटल
- रोजगार
- इंटरनेट
- और सुरक्षा
पहुंचाने में तेजी लाती है,
तो हिडमा की मौत नक्सलवाद का अंत साबित होगी।
वरना…
माओवादी किसी नए लड़के को दोबारा हिडमा बना देंगे।
निष्कर्ष: दशकों की लड़ाई में सबसे बड़ा मोड़
हिडमा जैसे खूंखार, निर्मम और पेशेवर गुरिल्ला कमांडर का ढेर होना कोई साधारण उपलब्धि नहीं है।
यह उन सैकड़ों जवानों की शहादत की वापसी,
उन आदिवासी परिवारों की मुक्ति,
और बस्तर की नई शुरुआत है।
हिडमा का खात्मा सिर्फ एक ऑपरेशन नहीं—
यह भारत की सुरक्षा नीति की सबसे बड़ी जीत और माओवाद के खिलाफ निर्णायक वार है।















