रिपोर्ट: शैलेश सिंह
पश्चिम सिंहभूम जिला इन दिनों जंगली हाथियों के खुले आतंक की चपेट में है। जंगल और गांव की सीमाएं टूट चुकी हैं। हाथी अब खेतों तक नहीं, सीधे घरों में घुसकर इंसानों को मौत के घाट उतार रहे हैं। बीते 10 दिनों में लगभग एक दर्जन लोगों की मौत ने यह साबित कर दिया है कि हालात आपातकालीन हो चुके हैं, लेकिन प्रशासन और वन विभाग अब भी मुआवजे और कागजी कार्रवाई से आगे नहीं बढ़ पा रहे।

सोयां गांव में तबाही: एक परिवार उजड़ गया
गोइलकेरा थाना अंतर्गत सोयां गांव में 5 जनवरी की शाम करीब 6 बजे जो हुआ, उसने पूरे इलाके को झकझोर दिया।
एक आक्रामक जंगली हाथी ने एक ही परिवार पर हमला कर तीन जिंदगियां छीन लीं, जबकि दो को गंभीर रूप से घायल कर दिया।

मृतकों की पहचान
कुंद्रो बहान्दा (50 वर्ष) – परिवार के मुखिया
सामु बहान्दा (4 वर्ष) – मासूम बेटा
कोदमा बहान्दा (10 वर्ष) – नन्ही बेटी
गंभीर रूप से घायल
सुनाए बहान्दा (पत्नी)
जिन्गि बहान्दा (बेटी)
घायलों का इलाज फिलहाल बाहर के अस्पताल में चल रहा है।
घर में घुसकर मौत: टोंटो के कुलसुता गांव की दहशत
उसी रात, यानी 5 जनवरी को ही, टोंटो थाना क्षेत्र के कुलसुता गांव में भी हाथी ने मौत का तांडव मचाया।
रात करीब 10 बजे, जब जगजीवन सवैया (25 वर्ष) अपने घर में सो रहा था, तभी एक हाथी ने घर तोड़कर उस पर हमला कर दिया।

मृतक: जगजीवन सवैया, पिता: प्रधान सवैया
एक पल में जवान बेटे की जान चली गई, और पूरा परिवार हमेशा के लिए उजड़ गया।
मौत के बाद भी नहीं थमा कहर: घर भी रौंदे गए
इन दोनों घटनाओं में सिर्फ इंसानी जान नहीं गई, बल्कि मृतकों के घर भी पूरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिए गए।
गरीब आदिवासी परिवारों के लिए यह सिर्फ जान का नुकसान नहीं, बल्कि रोजी-रोटी, छत और भविष्य तीनों का अंत है।
10 दिन में दर्जन भर मौतें: यह संयोग नहीं, सिस्टम की नाकामी है
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार,
पिछले 10 दिनों में अलग-अलग इलाकों में हाथियों के हमले से दर्जन भर लोगों की मौत हो चुकी है।
यह कोई एक-दो घटनाएं नहीं हैं, बल्कि यह साफ चेतावनी है कि—
पश्चिम सिंहभूम का जंगल अब इंसानों के लिए सुरक्षित नहीं रहा।

पूरे जिले में खौफ: रातें जागकर कट रही हैं
सोयां, कुलसुता, गोइलकेरा, टोंटो, मनोहरपुर, बंदगांव, सारंडा जैसे इलाकों में
लोग रात में सोने से डर रहे हैं
महिलाएं और बच्चे जंगल की आहट से कांप रहे हैं
किसान खेतों में जाने से कतरा रहे हैं
यह स्थिति मानव–वन्यजीव संघर्ष नहीं, बल्कि मानव असुरक्षा बन चुकी है।
आखिर हाथी इतने आक्रामक क्यों हो रहे हैं?
1️⃣ जंगलों का अंधाधुंध विनाश
खनन, सड़क, रेल लाइन और औद्योगिक गतिविधियों ने
हाथियों के प्राकृतिक गलियारों (कॉरिडोर) को तोड़ दिया है।
2️⃣ भोजन और पानी की कमी
जंगल सिकुड़ने से हाथियों को
पर्याप्त भोजन
सुरक्षित जल स्रोत
नहीं मिल पा रहे, जिससे वे गांवों की ओर बढ़ रहे हैं।
3️⃣ पारंपरिक रास्तों पर कब्जा
हाथियों के सदियों पुराने रास्तों पर
बस्तियां
खेत
खदानें
बना दी गईं, जिससे हाथी चिड़चिड़े और हिंसक हो गए हैं।
4️⃣ वन विभाग की निष्क्रियता
समय रहते
हाथी की मूवमेंट की सूचना
माइकिंग
अलर्ट सिस्टम
नहीं होने से ग्रामीण पूरी तरह असहाय रह जाते हैं।

सवालों के घेरे में वन विभाग और जिला प्रशासन
क्या हाथी की मूवमेंट की जानकारी पहले नहीं थी?
गांवों में पहले से चेतावनी क्यों नहीं दी गई?
हाथी भगाने के लिए प्रशिक्षित टीम क्यों नहीं पहुंची?
अब तक स्थायी समाधान क्यों नहीं?
इन सवालों का जवाब किसी अधिकारी के पास नहीं।
मुआवजा नहीं, सुरक्षा चाहिए
ग्रामीणों का साफ कहना है—
“मुआवजा बाद में चाहिए, पहले जान बचाने की व्यवस्था हो।”
लेकिन हर घटना के बाद वही रस्म:
कागज बनाओ
आश्वासन दो
मामला ठंडे बस्ते में डाल दो
हाथी से बचाव के जरूरी उपाय (ग्रामीणों के लिए)
🔹 रात में अकेले बाहर न निकलें
🔹 जंगल या खेत में जाते समय समूह में जाएं
🔹 हाथी दिखने पर शोर, पत्थर या टॉर्च की रोशनी का उपयोग न करें
🔹 शराब पीकर जंगल के पास न जाएं
🔹 घरों के आसपास मिर्ची धुआं या मशाल का उपयोग करें
🔹 वन विभाग को तुरंत सूचना दें
प्रशासन को क्या करना होगा?
✔️ हाथी कॉरिडोर को अतिक्रमण मुक्त करना
✔️ गांवों में रात्रि निगरानी दल
✔️ सायरन और अलर्ट सिस्टम
✔️ प्रशिक्षित हाथी रेस्क्यू टीम
✔️ स्थायी पुनर्वास और मुआवजा नीति
यह संघर्ष नहीं, चेतावनी है
सोयां और कुलसुता की घटनाएं आखिरी नहीं हैं, अगर अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए।
यह सिर्फ हाथियों का आक्रोश नहीं, बल्कि प्रकृति का प्रतिशोध है।
अगर आज भी सरकार और प्रशासन नहीं जागे,
तो अगली खबर किसी और गांव,
किसी और मासूम,
किसी और उजड़े परिवार की होगी।
अब सवाल यह नहीं कि हाथी क्यों मार रहे हैं,
सवाल यह है कि सिस्टम कब जागेगा?












