मंत्री के कथित मौखिक आदेश के नाम पर टेंडर प्रक्रिया ठप, संवेदकों में उबाल, हाईकोर्ट जाने की तैयारी
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
झारखंड के ग्रामीण कार्य विभाग में इन दिनों जो कुछ चल रहा है, वह केवल प्रशासनिक अराजकता नहीं बल्कि राज्य के विकास पर सीधा हमला माना जा रहा है। विभागीय मंत्री के कथित मौखिक आदेश का हवाला देकर पिछले दो महीने से टेंडर प्रक्रिया पर रोक लगाई गई है। न लिखित आदेश, न अधिसूचना, न कोई फाइल नोटिंग—बस “हवा में तैरता आदेश” और पूरा विभाग ठप।
अब इस मनमानी के खिलाफ संवेदकों का सब्र टूट चुका है। सामाजिक संगठन आदिवासी विकास संघ ने इस पूरे मामले को लेकर झारखंड उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने की तैयारी शुरू कर दी है। याचिका में जिन तथ्यों को रखा जा रहा है, वे प्रशासनिक भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग की भयावह तस्वीर पेश करते हैं।

टेक्निकल खुला, फाइनेंशियल नहीं—खुला खेल!
आदिवासी विकास संघ ने याचिका में सबसे गंभीर बिंदु के रूप में यह तथ्य रखा है कि—
- 27 टेंडरों में टेक्निकल बिड खोल दी गई,
- लेकिन फाइनेंशियल बिड जानबूझकर नहीं खोली गई,
- वहीं 13 टेंडरों में फाइनेंशियल बिड खुलने के बावजूद LOA (कार्यादेश) जारी नहीं किया गया।
सवाल सीधा है—
👉 अगर प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, तो काम क्यों नहीं दिया गया?
👉 किसके इशारे पर टेंडर फाइलें दबाई गई हैं?
एक साल से टेंडर लटका, बीड वैलिडिटी खत्म—जिम्मेदार कौन?
सूत्रों के अनुसार, याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष यह भी मुद्दा उठाने का फैसला किया है कि—
- पिछले एक साल से कई टेंडर बिना किसी कारण के लंबित हैं,
- इस दौरान बीड वैलिडिटी समाप्त हो चुकी है,
- जिससे पूरी प्रक्रिया ही संदेह के घेरे में आ गई है।
अब सबसे बड़ा सवाल—
👉 बीड वैलिडिटी खत्म होने की जिम्मेदारी किसकी है?
👉 क्या संवेदकों को इसका मुआवजा मिलेगा?
करोड़ों का EMD फंसा, संवेदक बर्बादी के कगार पर
ग्रामीण कार्य विभाग की इस तानाशाही का सबसे बड़ा शिकार बने हैं राज्यभर के संवेदक।
सूत्र बताते हैं कि—
- करोड़ों रुपये की EMD (Earnest Money Deposit)
- पिछले एक साल से बिना किसी कारण फंसी हुई है,
- संवेदक मजबूरी में बैंकों से लिए कर्ज पर ब्याज चुकाते-चुकाते आर्थिक रूप से टूट चुके हैं।
यह केवल आर्थिक शोषण नहीं, बल्कि व्यवसायिक हत्या है।
बिना आदेश के रोक—तो आदेश किसका?
सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि—
- विभागीय सचिव श्रीनिवासन द्वारा
👉 टेंडर प्रक्रिया पर रोक से संबंधित कोई लिखित आदेश जारी ही नहीं किया गया।
फिर सवाल उठता है—
👉 आखिर किसने टेंडर प्रक्रिया रोकी?
👉 किसके अधिकार क्षेत्र में यह फैसला लिया गया?
मुख्य अभियंता सरवन कुमार पर गंभीर आरोप
संवेदक सूत्रों का दावा है कि—
- बिना विभागीय आदेश के टेंडर प्रक्रिया रोकने के मुख्य दोषी मुख्य अभियंता सरवन कुमार हैं।
यानी,
👉 न मंत्री का लिखित आदेश,
👉 न सचिव की अनुमति,
👉 फिर भी टेंडर ठप!
यह सीधा-सीधा अधिकारों का दुरुपयोग और सत्ता का खुला खेल है।
मंत्री के “नजदीकी” और कमीशन कनेक्शन की गूंज
इस पूरे मामले को जमशेदपुर कार्य प्रमंडल के पूर्व कार्यपालक अभियंता राजेश रजक से जोड़कर देखा जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार—
- राजेश रजक, जो विभागीय मंत्री के काफी नजदीकी माने जाते रहे हैं,
- उनके साथ अवैध कमीशन वसूली और हिस्सेदारी के आरोप पहले भी चर्चा में रहे हैं।
यही नहीं,
👉 मंत्री के रहमो-करम और आशीर्वाद से
👉 एक कार्यपालक अभियंता
👉 सीधे मुख्य अभियंता की कुर्सी तक पहुंच गया—
अब वही विकास कार्यों की रफ्तार रोकने में सबसे आगे!
अभियंता वर्ग भी हैरान, सिस्टम शर्मसार
विभाग के अंदर ही अभियंता वर्ग में भारी असंतोष है।
उनका कहना है—
“बिना किसी लिखित आदेश के टेंडर प्रक्रिया रोकना न सिर्फ अवैध है, बल्कि यह पूरे प्रशासनिक ढांचे पर सवाल खड़ा करता है। आखिर कैसे कोई व्यक्ति अकेले विकास कार्यों पर ब्रेक लगा सकता है?”
सीएम हाउस में गंभीरता, विकास पर वार बर्दाश्त नहीं!
इस पूरे प्रकरण को लेकर अब सीएम हाउस भी गंभीर बताया जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार—
- मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन इसे
👉 राज्य के विकास पर सीधा हमला मान रहे हैं, - क्योंकि
👉 टेंडर प्रक्रिया रुकने का मतलब है—- सड़कें अधूरी,
- पुल अधूरे,
- ग्रामीण इलाकों में विकास ठप।
यानी, जनता भुगते और अफसर मलाई काटें!
पथ निर्माण विभाग में सब सामान्य, फिर ग्रामीण कार्य विभाग क्यों ठप?
एक और चौंकाने वाला तथ्य—
- पथ निर्माण विभाग और अन्य विभागों में टेंडर प्रक्रिया सामान्य रूप से चल रही है,
- कहीं कोई रोक नहीं, कोई संकट नहीं।
तो फिर सवाल उठता है—
👉 सिर्फ ग्रामीण कार्य विभाग ही क्यों “प्रयोगशाला” बना?
👉 क्या यहां अवैध उगाही का खेल चल रहा है?
राज्य का पहला विभाग, जहां हवा में आदेश चलता है!
सूत्रों का दावा है कि—
“यह राज्य का पहला और एकमात्र विभाग है, जहां बिना किसी लिखित आदेश के, केवल हवा में तैरते निर्देश पर टेंडर प्रक्रिया रोक दी गई है।”
यह न केवल नियमों की हत्या है, बल्कि लोकतंत्र का अपमान भी है।
हाईकोर्ट में होगी सीधी टक्कर
अब आदिवासी विकास संघ ने साफ कर दिया है—
- यह मामला केवल संवेदकों का नहीं,
- बल्कि राज्य के विकास और कानून के शासन का है।
उच्च न्यायालय में दाखिल होने वाली याचिका में—
- टेंडर रोकने वालों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करने,
- EMD फंसे संवेदकों को राहत देने,
- और दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की जाएगी।
बड़ा सवाल—क्या टूटेगा अफसरशाही का घमंड?
अब सबकी नजरें टिकी हैं—
- हाईकोर्ट के रुख पर,
- सीएम हाउस के अगले कदम पर,
- और इस सवाल पर कि—
👉 क्या ग्रामीण कार्य विभाग में चल रहा यह ‘हवा-हवाई शासन’ खत्म होगा?
👉 या फिर विकास कार्यों की बलि यूं ही चढ़ती रहेगी?
राज्य की जनता जवाब चाहती है।
संवेदक न्याय चाहते हैं।
और अब, कानून की चौखट पर अफसरशाही की असली परीक्षा होने वाली है।













