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⚔️ “13 फरवरी को गुवा में होगा निर्णायक आंदोलन” रांजाबुरु लौह अयस्क खदान को लेकर आदिवासी विस्फोट

On: February 11, 2026 12:12 PM
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CNT–SPT एक्ट और पर्यावरण कानूनों की अनदेखी पर उठे गंभीर सवाल। “नौकरी दो, नहीं तो खदान बंद करो” – प्रभावित गांवों का ऐलान

रिपोर्ट: शैलेश सिंह
सेल (SAIL) प्रबंधन द्वारा गुवा क्षेत्र में नई रांजाबुरु लौह अयस्क खदान खोलने की प्रक्रिया शुरू होते ही सारंडा के खदान प्रभावित गांवों में आक्रोश की आग भड़क उठी है। जिन गांवों की जमीन, जंगल, नदी, नाले और जीवन इस खदान से सीधे प्रभावित होंगे, उन्हीं गांवों के बेरोजगार युवकों के लिए आज तक कोई ठोस रोजगार नीति तैयार नहीं की गई है। न ग्रामसभा से विधिवत संवाद हुआ और न ही कोई लिखित आश्वासन दिया गया।
इसी उपेक्षा और अन्याय के खिलाफ 10 फरवरी को जोजोगुटू गांव में प्रभावित गांवों की एक विशाल बैठक आयोजित की गई। बैठक में कासिया-पेंचा, गंगदा, घाटकुड़ी, जोजोगुट्टू, राजबेड़ा, बाईहातु और तितलीघाट गांवों के मुंडा, ग्रामीण पुरुष और महिलाएं सैकड़ों की संख्या में जुटे। बैठक का सबसे अहम निर्णय यह रहा कि—
“13 फरवरी को सभी प्रभावित गांवों के ग्रामीण गुवा स्थित जनरल ऑफिस पहुंचकर जोरदार प्रदर्शन करेंगे और सीजीएम को मांग पत्र सौंपेंगे।”
ग्रामीणों ने साफ कहा कि यह आंदोलन केवल प्रतीकात्मक नहीं होगा, बल्कि यह उनके अधिकारों की निर्णायक लड़ाई की शुरुआत होगी।

🔥 “हमारी धरती पर मुनाफा, हमें सिर्फ जहर?”

बैठक में ग्रामीणों ने सेल प्रबंधन पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि वह आदिवासियों को केवल जमीन देने वाली मशीन समझ रहा है। खदान से करोड़ों रुपये का मुनाफा कमाया जाएगा, लेकिन बदले में गांवों को सिर्फ—
धूल और प्रदूषण
बीमारी
बेरोजगारी
और विस्थापन
मिलेगा।
ग्रामीणों ने कहा—
“हमारे घरों के पास खदान खुलेगी, हमारी हवा जहरीली होगी, हमारा पानी लाल होगा, हमारे खेत बंजर होंगे और नौकरी बाहर वालों को मिलेगी? यह अन्याय अब नहीं चलेगा।”
ग्रामीणों का आरोप है कि खदान शुरू करने से पहले न तो स्थानीय युवकों की सूची बनाई गई और न यह स्पष्ट किया गया कि कितने प्रभावित परिवारों को रोजगार दिया जाएगा।

⚖️ CNT–SPT एक्ट पर सवाल: क्या कानून सिर्फ कागजों में हैं?

बैठक में सबसे बड़ा सवाल छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (SPT Act) को लेकर उठा। ग्रामीणों ने कहा कि ये कानून आदिवासियों की जमीन और अधिकारों की रक्षा के लिए बने हैं, लेकिन रांजाबुरु खदान के मामले में इनकी अनदेखी हो रही है।
ग्रामीणों ने सवाल उठाए—
क्या खदान के लिए ग्रामसभा की विधिवत अनुमति ली गई है?
क्या जमीन उपयोग में CNT और SPT एक्ट की शर्तों का पालन किया गया?
क्या पारंपरिक मुंडा-मांझी व्यवस्था से सहमति ली गई?
ग्रामीणों का कहना है कि बिना सामाजिक सहमति के खदान खोलना आदिवासी कानूनों की आत्मा के खिलाफ है।

🌱 पर्यावरण कानूनों की अनदेखी: EIA पर उठे सवाल

ग्रामीणों ने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 और EIA (Environmental Impact Assessment) प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े किए।
ग्रामीणों ने पूछा—
क्या खदान खोलने से पहले पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन कराया गया?
क्या जनसुनवाई हुई?
क्या प्रदूषण से बचाव की कोई ठोस योजना ग्रामीणों को बताई गई?
ग्रामीणों का आरोप है कि—
खदान से निकलने वाला लौह चूर्ण खेतों में गिरकर जमीन को बंजर बना रहा है।
नदियां और नाले लाल और जहरीले हो चुके हैं।
मवेशी बीमार पड़ रहे हैं।
बच्चों और बुजुर्गों में त्वचा रोग और सांस की बीमारियां बढ़ रही हैं।
ग्रामीणों ने दो टूक कहा—
“यह विकास नहीं, बल्कि पर्यावरण हत्या है।”

📝 13 फरवरी का आंदोलन: मांग पत्र सौंपने का ऐलान

बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि 13 फरवरी को गुवा जनरल ऑफिस में प्रदर्शन कर सीजीएम को मांग पत्र सौंपा जाएगा। मांग पत्र में प्रमुख रूप से—
रांजाबुरु खदान में 100% प्रभावित गांवों के बेरोजगार युवकों को स्थायी और अस्थायी रोजगार दिया जाए।
गांवों में सड़क, पानी, बिजली, स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ी योजनाएं तुरंत शुरू की जाएं।
CNT–SPT एक्ट और पर्यावरण नियमों के पालन की स्थिति सार्वजनिक की जाए।
इन सभी मांगों पर लिखित समझौता (MoU) किया जाए।
ग्रामीणों ने कहा—
“अब मौखिक वादे नहीं चलेंगे, 13 फरवरी को जवाब चाहिए।”

⚠️ चेतावनी: “नौकरी नहीं तो खदान नहीं”

बैठक में चेतावनी भरे स्वर में कहा गया—
“अगर हमारी मांगें नहीं मानी गईं, तो यह आंदोलन और तेज किया जाएगा। यह केवल रोजगार की नहीं, बल्कि कानूनी अधिकार और अस्तित्व की लड़ाई है।”
ग्रामीणों ने स्पष्ट किया कि आंदोलन शांतिपूर्ण रहेगा, लेकिन अपनी मांगों से वे पीछे नहीं हटेंगे।

📌 बैठक में शामिल प्रमुख ग्रामीण

इस बैठक में प्रमुख रूप से—
मुखिया मुन्नी देवगम, बिरसा चांपिया, नंदलाल सुरीन, मंगता सुरीन, राजेश साड़ील, बामिया माझी, सिंगा सुरीन, अमन चांपिया, मान सिंह चांपिया, अर्जुन चांपिया, जेना बाडिंग, बेसरा चांपिया, मंगल सिद्धू, कांडे चांपिया, हुर्दुब चाकिया, रोया मुमुई सहित सैकड़ों ग्रामीण पुरुष और महिलाएं उपस्थित थे।

गांवों का सवाल सरकार और प्रबंधन से

क्या CNT और SPT एक्ट केवल कागजों तक सीमित हैं?
क्या बिना ग्रामसभा की अनुमति खदान चलाई जा सकती है?
क्या पर्यावरण नियम सिर्फ आम लोगों के लिए हैं?
क्या आदिवासियों को विकास की कीमत पर कुर्बान किया जाएगा?
ग्रामीणों का साफ कहना है—
“हमारी जमीन पर खदान खुलेगी, तो नौकरी भी हमारे बच्चों को ही मिलेगी।”

⚔️ “नौकरी दो – खदान चलाओ,
नौकरी नहीं – खदान नहीं।

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