भ्रष्टाचार नक्सल खदान
अपराध राजनीति खेल समस्या स्वास्थ्य कार्यक्रम शिक्षा दुर्घटना सांस्कृतिक मनोरंजन मौसम कृषि ज्योतिष काम

कागज़ी आदेश, ठप सड़कें और टूटती ज़िंदगियाँ

On: February 17, 2026 2:41 PM
Follow Us:
---Advertisement---

ग्रामीण कार्य विभाग की अफसरशाही ने संवेदकों को कर्ज़ और आत्महत्या के कगार पर पहुंचाया

कागज़ पर प्रभारी, ज़मीन पर शून्य अधिकार

रिपोर्ट: शैलेश सिंह

ग्रामीण कार्य विभाग, कार्य प्रमंडल चाईबासा के रिक्त पद पर विकास हित में कार्यकारी व्यवस्था के तहत चक्रधरपुर प्रमंडल में पदस्थापित अधिसूचित कार्यपालक अभियंता विशाल खलको को प्रभारी बनाए जाने का आदेश ज़िला प्रशासन ने तो जारी कर दिया, लेकिन यह आदेश आज तक सिर्फ़ फाइलों में कैद होकर रह गया है।
उपायुक्त चंदन कुमार द्वारा जारी यह आदेश विभागीय पुष्टि के अभाव में “कोरा कागज़” साबित हो रहा है। न तो एजी (AG) कार्यालय से और न ही विभागीय सचिवालय से इस आदेश की औपचारिक सम्पुष्टि कराई गई। परिणामस्वरूप प्रभारी कार्यपालक अभियंता किसी भी प्रकार का वित्तीय भुगतान, बिल पासिंग या संवेदकों से जुड़ा निर्णय लेने में असमर्थ हैं।

ढाई माह से भुगतान ठप, विकास ठहर गया

बीते ढाई माह से जिले में सड़क निर्माण कार्य पूरी तरह ठप है। संवेदकों के लाखों-करोड़ों रुपये के बिल लंबित हैं। ग्रामीण इलाकों में जहां सड़क ही जीवन रेखा है, वहां आज गड्ढे और धूल ही विकास की पहचान बन चुके हैं।
नया कार्य तो दूर, पुराने अधूरे कार्य भी बंद पड़े हैं। मजदूर बेरोज़गार हैं, मशीनें जंग खा रही हैं और गांवों में यह सवाल गूंज रहा है—क्या यही “विकास” है?

विधायक की गुहार, सचिवालय तक आवाज़

संवेदकों की बिगड़ती हालत को देखते हुए जगन्नाथपुर के विधायक सोनाराम सिंकु ने विभागीय सचिव मनोज कुमार से व्यक्तिगत मुलाकात कर उपायुक्त के आदेश की सम्पुष्टि और प्रभारी अभियंता को सम्पूर्ण विभागीय अधिकार देने की लिखित मांग की।
विडंबना यह है कि सत्ताधारी दल के विधायक को भी अपनी ही सरकार और अपने ही विभाग के खिलाफ संघर्ष करना पड़ रहा है। यह स्थिति बताती है कि प्रशासनिक तंत्र किस हद तक संवेदनहीन और जड़ हो चुका है।

मागे पर्व फीका, बाजार सूना

आदिवासी समाज का सबसे बड़ा पर्व मागे पर्व इस बार खुशियों की जगह चिंता और मायूसी लेकर आया।
ग्रामीण क्षेत्रों में संवेदकों और मजदूरों के पास खर्च करने के लिए पैसे नहीं हैं। नये कपड़े, पर्व की खरीदारी और हाट-बाज़ार की रौनक सब गायब है।
हाट-बाज़ारों में दुकानदार खाली बैठे हैं। आर्थिक मंदी की यह तस्वीर केवल संवेदकों की नहीं, पूरे ग्रामीण समाज की त्रासदी बन चुकी है।

बाबूशाही का खेल: फाइल किसकी मेज़ पर दबी?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह संचिका किस बाबू की अलमारी में धूल खा रही है?
कौन सा अधिकारी जिम्मेदारी से बच रहा है?
और किस स्तर पर यह आदेश जानबूझकर लटकाया जा रहा है?
अफसरशाही का यह खेल विकास के नाम पर जनता के साथ खुला मज़ाक बन गया है। हर दिन फाइलें घूमती हैं—एक टेबल से दूसरी टेबल, लेकिन समाधान शून्य।

संवेदकों की हालत: कर्ज़, डिफॉल्ट और प्रताड़ना

संवेदकों की स्थिति दयनीय से भी बदतर हो चुकी है।
* कई संवेदक बैंक डिफॉल्टर बन चुके हैं।
* कुछ को रोज़ बैंक से नोटिस और फोन आ रहे हैं।
* कुछ पर कुर्की की तलवार लटक रही है।
घर चलाना मुश्किल हो गया है। बच्चों की पढ़ाई, बीमार माता-पिता का इलाज और रोज़मर्रा का खर्च—सब कुछ कर्ज़ के भरोसे चल रहा है।

परिवारों पर टूटा संकट का पहाड़

संवेदकों की आर्थिक बदहाली का असर उनके पूरे परिवार पर पड़ रहा है।
शादी-ब्याह टल रहे हैं।
घर में कलह बढ़ रही है।
कई परिवार मानसिक तनाव के शिकार हैं।
स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कुछ संवेदक आत्महत्या के कगार पर पहुंच चुके हैं। यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि संभावित सामाजिक त्रासदी का संकेत है।

क्या सरकार किसी अप्रिय घटना का इंतज़ार कर रही है?

सबसे डरावनी बात यह है कि प्रशासन और विभाग पर इन हालातों का कोई असर पड़ता नहीं दिख रहा।
हर दिन चेतावनी है, हर दिन संकट गहरा रहा है।
लेकिन न तो विभागीय सचिवालय सक्रिय है और न ही जिला प्रशासन में कोई आपात भावना दिखाई दे रही है।
क्या सरकार किसी बड़ी अप्रिय घटना का इंतज़ार कर रही है?
क्या किसी संवेदक की जान जाने के बाद ही यह तंत्र जागेगा?

ग्रामीण विकास पर सीधा हमला

सड़क निर्माण ठप होना सिर्फ़ संवेदकों की समस्या नहीं है, यह ग्रामीण विकास पर सीधा हमला है।
* किसान अपने उत्पाद बाजार तक नहीं पहुंचा पा रहे।
* एम्बुलेंस और स्कूल बसों की आवाजाही बाधित है।
* रोजगार सृजन रुक गया है।
यह सब उस विभाग की विफलता का परिणाम है, जिसे ग्रामीण विकास की रीढ़ माना जाता है—ग्रामीण कार्य विभाग।

राजनीतिक इच्छाशक्ति बनाम अफसरशाही की दीवार

विधायक सोनाराम सिंकु की सक्रियता यह साबित करती है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति मौजूद है, लेकिन अफसरशाही की दीवार उससे कहीं मोटी हो चुकी है।
जहां एक ओर जनप्रतिनिधि समाधान चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर सिस्टम टालमटोल और चुप्पी की नीति पर चल रहा है।

अब सवालों के कटघरे में जिला प्रशासन

* उपायुक्त का आदेश अभी तक प्रमाणित क्यों नहीं हुआ?
* एजी और विभाग से सम्पुष्टि क्यों नहीं कराई गई?
* किस अधिकारी ने इस फाइल को रोके रखा?
* क्या संवेदकों की हालत की कोई समीक्षा हुई?
ये सवाल अब केवल पत्रकारिता के नहीं, बल्कि जनहित के सवाल बन चुके हैं।

अंतिम चेतावनी: अभी नहीं तो कभी नहीं

यदि शीघ्र ही प्रभारी कार्यपालक अभियंता को सम्पूर्ण वित्तीय अधिकार नहीं दिए गए और संवेदकों का भुगतान शुरू नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में स्थिति विस्फोटक हो सकती है।
आत्महत्या, आंदोलन और सड़क जाम जैसे हालात से इनकार नहीं किया जा सकता।
सरकार, जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को अब दिखावटी पत्राचार से बाहर निकलकर त्वरित निर्णय लेना होगा।
वरना यह मामला केवल विभागीय विफलता नहीं रहेगा, बल्कि एक मानवीय अपराध के रूप में इतिहास में दर्ज होगा।

निष्कर्ष

चाईबासा में प्रभारी अभियंता की नियुक्ति का आदेश आज विकास का दस्तावेज नहीं, बल्कि प्रशासनिक नाकामी का प्रतीक बन गया है।
ढाई माह से ठप सड़कें, कर्ज़ में डूबे संवेदक, फीका पड़ा मागे पर्व और सूने बाजार—यह सब उस सिस्टम की तस्वीर है, जो जनता की मेहनत पर खड़ा होकर भी जनता की पीड़ा से बेखबर है।
अब देखना यह है कि उपायुक्त का आदेश और विधायक का प्रयास फाइलों से निकलकर जमीन पर कब उतरता है—या फिर कोई बड़ी त्रासदी इस तंत्र को जगाने आएगी।

SINGHBHUMHALCHAL NEWS

सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

Join WhatsApp

Join Now

Leave a Comment