रिपोर्ट: शैलेश सिंह
नक्सल प्रभावित क्षेत्र सारंडा जंगल के छोटानागरा थाना अंतर्गत बहदा गांव में आदिवासियों ने अपनी पौराणिक आस्था और प्रकृति प्रेम की परंपरा को जीवंत करते हुए मागे/माघे पर्व को हर्षोल्लास के साथ मनाया। यह पर्व आदिवासी समाज के लिए केवल उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति, वन देवी-देवताओं और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पवित्र अनुष्ठान माना जाता है।

प्रकृति और पूर्वजों की आराधना से हुई शुरुआत
सुबह से ही गांव का माहौल भक्तिमय हो गया। गांव के दियुरी (पूजारी) जोहन सिद्धू, पुराना दियुरी उबुगा सिद्धू, जोम समी सोमा सिद्धू, मुंडा रोया सिद्धू, अध्यक्ष मुंगडू सिद्धू, तथा सदस्य कामेश्वर मांझी, सीताराम मांझी, गणेश मांझी, बिरसा हंसदा और जगमोहन चाम्पिया ने पारंपरिक विधि-विधान से पूजा-अर्चना की।
इस दौरान प्रकृति की रक्षा और गांव की समृद्धि की कामना करते हुए वन देवी-देवताओं को मुर्गा की बलि दी गई। आदिवासी मान्यता के अनुसार यह बलि बुराई और आपदाओं से गांव की रक्षा का प्रतीक है।

पौराणिक परंपरा से जुड़ा मागे/माघे पर्व
ग्रामीणों के अनुसार मागे/माघे पर्व की जड़ें आदिवासी समाज की पौराणिक परंपराओं में हैं। यह पर्व नई फसल, नए वर्ष और जीवन के नए चक्र के स्वागत का प्रतीक माना जाता है। पूर्वजों से चली आ रही यह मान्यता है कि इस दिन प्रकृति देवता गांव में वास करते हैं और यदि विधिवत पूजा की जाए तो वर्ष भर सुख-शांति और अच्छी पैदावार होती है।
सामूहिक नृत्य में दिखी एकता की झलक
पूजा के बाद गांव में सामूहिक आदिवासी नृत्य का आयोजन किया गया। इस नृत्य में केवल बहदा गांव ही नहीं, बल्कि आसपास के दूर-दराज गांवों से आए ग्रामीण और रिश्तेदार भी शामिल हुए।
महिलाएं, पुरुष और बच्चे पारंपरिक वेशभूषा में ढोल-नगाड़ों की थाप पर देर रात तक झूमते रहे। यह नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामूहिकता और सामाजिक एकता का प्रतीक बना।

संस्कृति के संरक्षण का संदेश
ग्रामीणों ने बताया कि आधुनिकता के इस दौर में भी मागे/माघे पर्व जैसे पारंपरिक उत्सवों को जीवित रखना उनकी पहचान और संस्कृति को बचाने का माध्यम है।
यह पर्व नई पीढ़ी को अपने इतिहास, पौराणिक मान्यताओं और प्रकृति से जुड़े जीवन मूल्यों से जोड़ने का कार्य करता है।

नक्सल प्रभावित क्षेत्र में शांति और सौहार्द का प्रतीक
जहां एक ओर यह क्षेत्र नक्सल प्रभाव के कारण अक्सर चर्चा में रहता है, वहीं दूसरी ओर बहदा गांव में मनाया गया यह पर्व शांति, भाईचारे और सांस्कृतिक समृद्धि का संदेश देता है।
मागे/माघे पर्व ने यह साबित कर दिया कि आदिवासी समाज अपनी पौराणिक परंपराओं के सहारे जीवन में उत्सव, आस्था और एकता का रंग भरना जानता है।
बहदा गांव में मनाया गया मागे/माघे पर्व केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आदिवासियों की हजारों साल पुरानी पौराणिक परंपरा, प्रकृति से जुड़ाव और सामूहिक जीवन दर्शन का जीवंत उदाहरण बनकर सामने आया।













