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“रोज़गार नहीं तो खनन नहीं” की हुंकार के बीच कटी डरावनी रात

On: February 24, 2026 9:11 AM
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खुले आसमान, बारिश, ठंड और जंगली जानवरों के साये में डटे आंदोलनकारी — दूसरे दिन भी रांजाबुरु खदान बंद

रिपोर्ट: शैलेश सिंह

सारंडा के घने जंगल एक बार फिर इतिहास के सबसे बेचैन और विद्रोही पलों के गवाह बने।
23 फरवरी की सुबह रांजाबुरु खदान को बंद कर शुरू हुआ आदिवासी आंदोलन 24 फरवरी को दूसरे दिन और भी उग्र रूप में सामने आया। यह अब केवल धरना नहीं रहा, बल्कि जंगल के सीने पर लिखा गया एक स्पष्ट संदेश बन चुका है — “हम भूखे रह लेंगे, लेकिन हक छोड़ेंगे नहीं।”


बीती रात आंदोलनकारियों के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं थी।
खुले आसमान के नीचे, चारों ओर जंगल, विषैले जीवों का डर, कड़ाके की ठंड और अचानक हुई बारिश — इन सबके बीच सैकड़ों ग्रामीण अपनी मांगों के साथ अडिग खड़े रहे।
यह खबर अब किसी बयान या चेतावनी पर नहीं, बल्कि संघर्ष की उस रात पर केंद्रित है जिसने आंदोलन को और अधिक आक्रामक बना दिया।

जंगल में बीती संघर्षों की रात: ठंड, बारिश और जंगली जानवरों का डर

रात होते ही हालात और विकट हो गए।
आसमान में बादल छा गए और अचानक बारिश शुरू हो गई।
आंदोलनकारी जिनमें मानकी, मुंडा, मुखिया, पंचायत प्रतिनिधि, बुजुर्ग और युवा शामिल थे, जंगल के बीच जमीन पर ही बैठे रहे।
चारों ओर से आवाजें आती रहीं —
* कभी जंगली सूअरों की,
* कभी सियारों की,
* तो कभी किसी अज्ञात जानवर की हलचल।
अंधेरा इतना घना था कि हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था।
कुछ लोगों ने आग जलाकर खुद को गर्म रखने की कोशिश की।
कुछ आंदोलनकारी आग के पास कंबल ओढ़े सिकुड़कर सो गए।
बाकी लोग पूरी रात जागते रहे, ताकि किसी जंगली जानवर या अनहोनी से साथियों को बचाया जा सके।
यह कोई सामान्य धरना नहीं था —
यह जंगल के बीच एक रात भर का प्रतिरोध शिविर था।

बारिश ने तोड़ा शरीर, लेकिन नहीं तोड़ सकी इरादा

रात में हुई वर्षा ने हालात को और कठिन बना दिया।
धरती गीली हो गई, कपड़े भीग गए, आग बुझ गई।
कई युवा, बुजुर्ग ठंड से कांपते रहे, लेकिन कोई पीछे नहीं हटा।
सुबह होते ही, जैसे ही सूरज की पहली किरण जंगल में उतरी,
उसी जोश के साथ नारे गूंजे —
“हमारी जमीन – हमारा हक!”
“रोज़गार नहीं तो खनन नहीं!”
रात की पीड़ा ने आंदोलन को कमजोर नहीं, बल्कि और आक्रामक बना दिया।

पानी तक नहीं भेजा गया: मानवता पर सीधा सवाल

आंदोलन स्थल पर महिलाएं और बुजुर्ग पूरे दिन प्यास से व्याकुल रहे।
बताया गया कि गुवा खदान प्रबंधन से कम से कम पानी टैंकर भेजने का अनुरोध किया गया, लेकिन शाम तक कोई व्यवस्था नहीं की गई।
* न पानी,
* न कोई चिकित्सा सुविधा।
आंदोलनकारियों का कहना है कि यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि मानवता के खिलाफ अपराध है।
जिस क्षेत्र से देश को लोहा मिलता है,
उसी क्षेत्र के लोग आज प्यासे बैठे हैं —
यह तस्वीर विकास के हर दावे पर तमाचा है।

जंगल की जिंदगी बनाम कंपनी की मशीनें

आंदोलनकारियों का कहना है—
हम आदिवासी विकट परिस्थिति में जीना जानते हैं।
बिना भोजन और पानी के भी जंगल के वनोत्पाद के सहारे जीवन चलाना जानते हैं।
लेकिन अन्याय स्वीकार करना नहीं जानते।
एक तरफ भारी मशीनें और ठेका कंपनियां हैं,
दूसरी ओर जंगल के बीच बैठे बेरोजगार युवा।
यह संघर्ष अब आर्थिक नहीं, बल्कि अस्तित्व का हो गया है।

“हम डरने वाले नहीं” – सुबह की हुंकार

रात भर की पीड़ा के बाद सुबह जो दृश्य सामने आया, वह किसी आंदोलन से कम नहीं था।
महिलाएं फिर से पंक्तियों में बैठीं।
युवाओं ने नारे लगाए।
बुजुर्गों ने जंगल की ओर देखते हुए कहा —
“हम इससे भी कठिन जीवन जी चुके हैं।
यह संघर्ष हमें तोड़ नहीं सकता।”
बारिश और ठंड ने शरीर को थकाया,
लेकिन मन को और कठोर बना दिया।

प्रशासन और कंपनी की चुप्पी: आग में घी

अब तक न कोई ठेका कंपनी का अधिकारी आंदोलन स्थल पर पहुंचा,
न कोई वार्ता की पहल हुई।
यह चुप्पी आंदोलनकारियों के गुस्से को और तेज कर रही है।
लोग सवाल कर रहे हैं—
* क्या आदिवासियों को इंसान नहीं समझा जाता?
* क्या उनके जीवन की कोई कीमत नहीं?
* क्या सिर्फ मशीनों की चिंता है, लोगों की नहीं?
यह खामोशी अब खुद एक जवाब बन चुकी है।
यह आंदोलन सिर्फ खदान का नहीं, सम्मान का है
यह लड़ाई सिर्फ नौकरी की नहीं है।
यह लड़ाई है —
* सम्मान की
* अधिकार की
* और अस्तित्व की
जब जंगल उजड़ चुका है,
वनोत्पाद खत्म हो चुके हैं,
खेती संकट में है,
तो खदान ही आखिरी उम्मीद थी।
लेकिन उसी खदान में बाहर के लोग काम करें और स्थानीय युवा बेरोजगार रहें —
यह स्वीकार्य नहीं।

पूरे सिस्टम पर सवाल

अब यह मामला सिर्फ रांजाबुरु या गुवा तक सीमित नहीं रहा।
यह सवाल बन गया है पूरे सिस्टम पर।
* क्या आदिवासी क्षेत्र में उद्योग सिर्फ मुनाफे के लिए हैं?
* क्या स्थानीय लोगों का कोई हक नहीं?
* क्या ग्राम सभा और पारंपरिक व्यवस्था का कोई मूल्य नहीं?
इन सवालों का जवाब अब देना ही होगा।

Steel Authority of India Limited और प्रशासन के लिए चेतावनी

यह आंदोलन अब एक प्रतीक बन चुका है —
आदिवासी अधिकार बनाम कॉरपोरेट व्यवस्था का।
यदि संवाद नहीं हुआ,
यदि पानी, भोजन और सम्मान नहीं मिला,
तो यह आंदोलन और व्यापक होगा।
सारंडा के जंगलों से उठी यह आग अब आगे तक फैलने लगी है।

रात की पीड़ा, सुबह की हुंकार

बीती रात आंदोलनकारियों के लिए केवल समय नहीं था,
वह संघर्ष का इम्तिहान थी।
ठंड, बारिश, अंधेरा और जंगली जानवर —
इन सबके बीच डटे रहना
अपने आप में एक ऐतिहासिक प्रतिरोध है।
आज यह आंदोलन कह रहा है—
“हम जंगल में जी लेंगे,
लेकिन अन्याय के आगे नहीं झुकेंगे।”
सारंडा की धरती ने फिर एक सवाल खड़ा कर दिया है—
अगर विकास में आदिवासियों की जगह नहीं,
तो यह विकास आखिर किसका है?
और यही सवाल आने वाले दिनों में प्रशासन और व्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है।

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सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

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