15–20 दिनों से ठप पड़ी वाई-फाई सेवा, पढ़ाई से लेकर सुरक्षा व्यवस्था तक प्रभावित
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
सारंडा के घने जंगलों के बीच बसी सेल नगरी किरीबुरू और मेघाहातुबुरु जैसी छोटी लेकिन महत्वपूर्ण औद्योगिक नगरियों में संचार व्यवस्था की बदहाल स्थिति ने आम जनता का जीवन मुश्किल बना दिया है। डिजिटल युग में जहां देश के बड़े शहर 5जी नेटवर्क की तेज रफ्तार से दौड़ रहे हैं, वहीं लौह अयस्क क्षेत्र की इन नगरियों में आज भी लोग ठीक से इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क के लिए तरस रहे हैं।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इन नगरियों से सटे उड़ीसा राज्य के किरीबुरू हिलटॉप टाउनशिप में, जहां आबादी बहुत कम है, वहां 5जी नेटवर्क की सुविधा उपलब्ध है। लेकिन ठीक उसके बगल में बसे झारखंड के किरीबुरू और मेघाहातुबुरु शहर अब भी इस सुविधा से पूरी तरह वंचित हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि संचार कंपनियां बड़े-बड़े वादे और आकर्षक विज्ञापन दिखाकर ग्राहकों को जोड़ तो लेती हैं, लेकिन सेवा देने की बारी आती है तो उनकी जिम्मेदारी लगभग खत्म हो जाती है।

जियो और एयरटेल वाई-फाई सेवा बनी मजाक
इन दोनों शहरों में सैकड़ों घरों में जियो और एयरटेल के वाई-फाई कनेक्शन लगाए गए हैं। लोगों ने हजारों रुपये खर्च कर यह कनेक्शन इसलिए लगवाया था ताकि घरों में बेहतर इंटरनेट सुविधा मिल सके।
माता-पिता की सबसे बड़ी उम्मीद यह थी कि उनके बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई कर सकेंगे, डिजिटल क्लास में भाग ले सकेंगे और आधुनिक शिक्षा से जुड़ सकेंगे। वहीं गृहणियों और परिवार के अन्य सदस्यों को भी स्मार्ट टीवी और इंटरनेट के माध्यम से मनोरंजन और जानकारी का लाभ मिल सकेगा।
लेकिन पिछले 15 से 20 दिनों से स्थिति इतनी खराब हो गई है कि वाई-फाई का होना या न होना बराबर हो गया है।
उपभोक्ताओं का कहना है कि इंटरनेट की स्पीड लगभग शून्य हो चुकी है। कई बार तो पूरा दिन इंटरनेट चलता ही नहीं। किसी तरह कनेक्शन आता भी है तो इतना कमजोर कि न वीडियो चल पाता है और न ही कोई जरूरी काम हो पाता है।
ऑनलाइन पढ़ाई पर पड़ा गहरा असर
संचार व्यवस्था की सबसे बड़ी मार छात्रों और छात्राओं पर पड़ रही है। आज के समय में स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई का बड़ा हिस्सा इंटरनेट से जुड़ा हुआ है।
ऑनलाइन क्लास, डिजिटल नोट्स, असाइनमेंट और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी—सब कुछ इंटरनेट पर निर्भर हो चुका है। लेकिन खराब नेटवर्क के कारण बच्चों की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है।
कई अभिभावकों ने नाराजगी जताते हुए कहा कि उन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए वाई-फाई कनेक्शन लिया था, लेकिन अब बच्चे ऑनलाइन क्लास में शामिल ही नहीं हो पा रहे हैं। कई बार परीक्षा फॉर्म भरने या महत्वपूर्ण दस्तावेज अपलोड करने में भी दिक्कत हो रही है।
डिजिटल इंडिया के दावे पर सवाल
केंद्र सरकार लगातार डिजिटल इंडिया का सपना साकार करने की बात करती है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
सारंडा जैसे महत्वपूर्ण खनन क्षेत्र में स्थित इन औद्योगिक नगरियों में अगर इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क की यह हालत है, तो दूरदराज के ग्रामीण इलाकों की स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
लोगों का कहना है कि जब देश डिजिटल क्रांति की बात कर रहा है, तब इन क्षेत्रों में संचार व्यवस्था का यह हाल विकास के दावों पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
कस्टमर केयर बना औपचारिकता, सुनवाई नहीं
सबसे बड़ी परेशानी यह है कि उपभोक्ताओं की शिकायतों का कोई समाधान नहीं हो रहा है।
लोग लगातार जियो और एयरटेल के कस्टमर केयर में शिकायत दर्ज करा रहे हैं। कई उपभोक्ताओं ने मोबाइल ऐप के माध्यम से भी शिकायत की है। लेकिन हर बार उन्हें वही घिसा-पिटा जवाब मिलता है—“आपकी समस्या जल्द ठीक कर दी जाएगी।”
दिन गुजरते जा रहे हैं, लेकिन स्थिति में कोई सुधार नहीं हो रहा।
अब लोगों का गुस्सा खुलकर सामने आने लगा है। कई उपभोक्ताओं ने साफ कहा है कि अगर सेवा में सुधार नहीं हुआ तो वे कनेक्शन कटवा देंगे और अन्य लोगों को भी यह कनेक्शन लेने से मना करेंगे।
गृहणियों और व्यापारियों की भी बढ़ी परेशानी
खराब इंटरनेट का असर सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं है। गृहणियों और छोटे व्यापारियों को भी इससे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
आजकल अधिकांश लोग ऑनलाइन पेमेंट, बैंकिंग, बिल भुगतान और सरकारी सेवाओं के लिए इंटरनेट पर निर्भर हैं। लेकिन नेटवर्क नहीं रहने से छोटे-छोटे काम भी घंटों में पूरे हो पा रहे हैं।
कई दुकानदारों का कहना है कि ग्राहक यूपीआई से भुगतान करना चाहते हैं, लेकिन नेटवर्क नहीं होने के कारण भुगतान प्रक्रिया अटक जाती है। इससे व्यापार पर भी असर पड़ रहा है।
सारंडा के गांवों में स्थिति और भी भयावह
अगर किरीबुरू और मेघाहातुबुरु शहरों की स्थिति इतनी खराब है, तो सारंडा के सुदूरवर्ती गांवों की हालत और भी ज्यादा चिंताजनक है।
घने जंगलों में बसे कई गांवों में मोबाइल नेटवर्क नाम मात्र का है। कई जगह तो लोगों को फोन करने के लिए पहाड़ी या खुले स्थान तक जाना पड़ता है।
इंटरनेट सेवा लगभग न के बराबर है। इससे ग्रामीणों को सरकारी योजनाओं, बैंकिंग सेवाओं और डिजिटल सुविधाओं का लाभ लेने में भारी दिक्कत होती है।

सुरक्षाबलों को भी हो रही भारी परेशानी
सारंडा क्षेत्र लंबे समय तक नक्सल गतिविधियों के लिए कुख्यात रहा है। आज भी यहां सुरक्षा बलों की तैनाती बड़ी संख्या में है।
जंगलों में तैनात पुलिस अधिकारियों और जवानों को भी संचार व्यवस्था की खराब स्थिति के कारण परेशानी झेलनी पड़ रही है।
आधुनिक सुरक्षा अभियानों में संचार व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण होती है। कमजोर नेटवर्क के कारण कई बार जरूरी सूचना समय पर नहीं पहुंच पाती।
स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर संचार व्यवस्था मजबूत हो, तो न सिर्फ आम जनता बल्कि सुरक्षाबलों को भी बड़ी राहत मिल सकती है।
सवालों के घेरे में संचार कंपनियां
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल संचार कंपनियों की जिम्मेदारी पर उठ रहा है।
लोगों का कहना है कि जब कंपनियां हर महीने उपभोक्ताओं से पूरा शुल्क वसूल रही हैं, तो उन्हें बेहतर सेवा देना भी उनकी जिम्मेदारी है।
अगर नेटवर्क व्यवस्था इतनी ही कमजोर है, तो फिर नए कनेक्शन क्यों दिए जा रहे हैं?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि प्रशासन को भी इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए और कंपनियों को जवाबदेह बनाना चाहिए।
लोगों की मांग—तुरंत सुधारी जाए व्यवस्था
किरीबुरू और मेघाहातुबुरु के लोगों ने संचार कंपनियों से मांग की है कि वे तुरंत तकनीकी टीम भेजकर नेटवर्क की समस्या का स्थायी समाधान करें।
साथ ही प्रशासन से भी मांग की जा रही है कि क्षेत्र में 4जी और 5जी नेटवर्क का विस्तार सुनिश्चित किया जाए ताकि यहां के लोगों को भी देश के अन्य हिस्सों की तरह आधुनिक संचार सुविधाएं मिल सकें।
लोगों का साफ कहना है कि अगर जल्द ही स्थिति नहीं सुधरी, तो वे सामूहिक रूप से आंदोलन करने को भी मजबूर होंगे।
क्योंकि डिजिटल युग में संचार सुविधा कोई विलासिता नहीं बल्कि बुनियादी जरूरत बन चुकी है, और सारंडा की इन औद्योगिक नगरियों को इससे वंचित रखना क्षेत्र के विकास के साथ खुला अन्याय है।












