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सारंडा जंगल की गोद में जीवित परंपरा…

On: March 15, 2026 6:25 PM
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किरीबुरू के प्रोस्पेक्टिंग क्षेत्र में आदिवासी समाज ने मनाया “वन भौजी” पर्व, प्रकृति और सामुदायिक एकता का दिया संदेश

रिपोर्ट: शैलेश सिंह

सारंडा की हरी-भरी वादियों और घने जंगलों के बीच बसे किरीबुरू के प्रोस्पेक्टिंग क्षेत्र में आदिवासी समुदाय ने अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत करते हुए “वन भौजी” (वन भोजनी) पर्व उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया। इस पर्व में ग्रामीणों ने जंगल और मैदान में सामूहिक रूप से भोजन बनाकर और एक साथ बैठकर उसे ग्रहण कर प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त किया।
यह पर्व आदिवासी समाज के उस गहरे संबंध का प्रतीक है, जो पीढ़ियों से जंगल, प्रकृति और सामुदायिक जीवन के साथ जुड़ा हुआ है।

आधी रात को बजी थाली और टीना, बुरी आत्माओं को भगाने की परंपरा

वन भौजी पर्व की शुरुआत एक विशेष परंपरा के साथ होती है। पर्व से एक रात पहले आदिवासी समाज के लोग मध्य रात्रि में अपने घरों और टोले-मोहल्लों में इकट्ठा होकर टीना, थाली और अन्य धातु के बर्तनों को जोर-जोर से बजाते हैं।
मान्यता है कि इस परंपरा के माध्यम से गांव और आसपास के क्षेत्र में मौजूद बुरी आत्माओं और नकारात्मक शक्तियों को गांव की सीमा से बाहर भगाया जाता है।
ग्रामीणों का विश्वास है कि ऐसा करने से गांव के लोगों पर आने वाली संभावित विपत्तियां, बीमारियां और अन्य अशुभ प्रभाव दूर हो जाते हैं तथा पूरे वर्ष समुदाय सुरक्षित और स्वस्थ रहता है।

जंगल और मैदान में बना सामूहिक रसोईघर

अगली सुबह आदिवासी समाज के लोग परिवार और समुदाय के साथ प्रोस्पेक्टिंग क्षेत्र के जंगल और खुले मैदानों में एकत्र हुए।
यहां लोगों ने लकड़ी और पत्थरों से अस्थायी चूल्हा बनाकर सामूहिक रूप से भोजन तैयार किया। महिलाओं और पुरुषों ने मिलकर पारंपरिक व्यंजन बनाए।
इस दौरान चावल, दाल, साग-सब्जी, मांस और अन्य स्थानीय खाद्य पदार्थों से बना भोजन तैयार किया गया, जिसे सभी ने पत्तलों में बैठकर एक साथ ग्रहण किया।

गीत, हंसी और परंपरा का संगम

वन भौजी केवल भोजन का पर्व नहीं है, बल्कि यह सामाजिक मेल-मिलाप और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का अवसर भी होता है।
जंगल के बीच खुले वातावरण में ग्रामीणों ने पारंपरिक गीत गाए, आपसी बातचीत की और दिन भर सामुदायिक उत्सव का आनंद लिया। बच्चों और युवाओं ने खेलकूद कर इस दिन को और भी यादगार बना दिया।

प्रकृति के प्रति आभार का उत्सव

आदिवासी समाज का जीवन जंगल से गहराई से जुड़ा हुआ है। जंगल उन्हें भोजन, औषधि, लकड़ी और जीवनयापन के अनेक साधन प्रदान करता है।
इसी कारण वन भौजी पर्व को प्रकृति और जंगल के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का उत्सव माना जाता है। इस दिन लोग जंगल की गोद में बैठकर यह संदेश देते हैं कि प्रकृति का संरक्षण ही मानव जीवन के संतुलन की सबसे बड़ी शर्त है।

संस्कृति को जीवित रखे हुए हैं गांव के लोग

आज के आधुनिक दौर में जहां कई पारंपरिक परंपराएं धीरे-धीरे लुप्त हो रही हैं, वहीं किरीबुरू के प्रोस्पेक्टिंग क्षेत्र के आदिवासी समुदाय के लोग अपनी सांस्कृतिक धरोहर को आज भी पूरी निष्ठा के साथ निभा रहे हैं।
ग्रामीणों का मानना है कि इस तरह के पर्व न केवल उनकी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करते हैं, बल्कि नई पीढ़ी को भी अपनी जड़ों और परंपराओं से जोड़कर रखते हैं।

सामुदायिक एकता की मिसाल

वन भौजी पर्व इस बात का भी उदाहरण है कि आदिवासी समाज में सामूहिक जीवन और एकता की भावना कितनी मजबूत है। इस दिन अमीर-गरीब, छोटे-बड़े का कोई भेद नहीं होता।
पूरा गांव एक परिवार की तरह जंगल में बैठकर भोजन करता है और यह संदेश देता है कि सामूहिकता ही समाज की असली ताकत है।
कुल मिलाकर, किरीबुरू के प्रोस्पेक्टिंग क्षेत्र में मनाया गया वन भौजी पर्व आदिवासी संस्कृति, प्रकृति के प्रति सम्मान और सामाजिक एकता का जीवंत उदाहरण बनकर सामने आया। जंगल की गोद में मनाया गया यह पारंपरिक उत्सव यह बताता है कि आधुनिकता के बीच भी आदिवासी समाज अपनी सांस्कृतिक जड़ों से मजबूती से जुड़ा हुआ है।

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सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

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