गुवा में कैंडल मार्च, गूंजा एक ही नारा — “दोषी को फांसी दो”
गुवा संवाददाता |
झारखंड के हजारीबाग जिले के विष्णुगढ़ में 12 वर्षीय नाबालिग के साथ हुई दरिंदगी ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया है। इस अमानवीय घटना के विरोध में गुवा की महिलाओं का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा। बाल अधिकार सुरक्षा मंच के बैनर तले सैकड़ों महिलाओं ने कैंडल मार्च निकालकर न्याय की मांग की और दोषियों को फांसी देने की मांग को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया।

रामनगर से उठी आवाज, पूरे शहर में गूंजा आक्रोश
रामनगर स्थित एसबीआई बैंक के समीप से शुरू हुआ यह कैंडल मार्च गुवा बाजार, रेलवे मार्केट, विवेक नगर और कच्छी धौड़ा जैसे प्रमुख इलाकों से होकर गुजरा। हाथों में जलती मोमबत्तियां और आंखों में आक्रोश लिए महिलाएं एकजुट होकर न्याय की गुहार लगाती नजर आईं।
मार्च के दौरान “बेटी बचाओ”, “दोषियों को फांसी दो” और “महिला सुरक्षा सुनिश्चित करो” जैसे नारे लगातार गूंजते रहे। पूरे रास्ते माहौल गंभीर और भावनात्मक बना रहा।
“अब और नहीं सहेंगे” — महिलाओं की दो टूक चेतावनी
प्रदर्शन में शामिल महिलाओं ने साफ शब्दों में कहा कि समाज में लगातार बढ़ रहे महिला उत्पीड़न और अपराध अब असहनीय हो चुके हैं। उन्होंने प्रशासन और सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि इस मामले में जल्द और कठोर कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन को और उग्र किया जाएगा।
महिलाओं ने कहा—
👉 “हर बार घटना के बाद मोमबत्तियां जलती हैं, लेकिन अपराधी बच निकलते हैं। अब यह नहीं चलेगा।”
निर्भया से लेकर हालिया घटनाओं तक — नहीं थम रहा अपराध
प्रदर्शन के दौरान महिलाओं ने देश को झकझोर देने वाली घटनाओं जैसे निर्भया कांड और कोलकाता में महिला डॉक्टर की हत्या का जिक्र करते हुए कहा कि वर्षों बाद भी हालात में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है।
उन्होंने सवाल उठाया कि—
👉 “जब तक अपराधियों को त्वरित और कठोर सजा नहीं मिलेगी, तब तक बेटियां सुरक्षित कैसे होंगी?”
इन महिलाओं की रही सक्रिय भागीदारी
इस विरोध प्रदर्शन में बाल अधिकार सुरक्षा मंच की प्रखंड सचिव पदमा केसरी के नेतृत्व में कई महिलाएं शामिल हुईं। प्रमुख रूप से गीता देवी, अनुराधा राव, ममता देवी, जानों चातर, पिंकी देवी, लक्ष्मी देवी, शांति दास, सुनीता समद, द्रौपदी हेस्सा समेत बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी रही।
समाज के लिए चेतावनी, प्रशासन के लिए चुनौती
यह कैंडल मार्च केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि समाज और प्रशासन के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है कि अब महिलाएं चुप बैठने वाली नहीं हैं।
अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह आक्रोश एक बड़े जन आंदोलन का रूप ले सकता है।














