सारंडा की घनी अंधेरी रात और एक जवान की अंतिम सांस
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
सारंडा के घने जंगलों में नक्सलियों के खिलाफ चल रहे सघन अभियान के बीच एक दर्दनाक खबर ने पूरे इलाके को शोक में डूबो दिया। कोबरा 209 बटालियन के 27 वर्षीय बहादुर जवान संदीप कुमार की जान ड्यूटी के दौरान एक विषैले सांप या अज्ञात जीव-जंतु के डंस से चली गई। यह घटना 30 सितम्बर की रात लगभग 9 बजे थोलकोबाद की ऊंची पहाड़ियों पर हुई।

जवान संदीप कुमार, खूंटी से अपने साथियों के साथ 29 सितम्बर को किरीबुरू पहुंचे थे। अगली सुबह ही उन्हें नक्सल विरोधी अभियान पर जंगलों में निकलना पड़ा। देश की सेवा में तत्पर संदीप ने शायद ही सोचा होगा कि यही उनका आखिरी अभियान साबित होगा।
विषैले डंस के बाद संघर्ष और अंतिम प्रयास
30 सितम्बर की रात, जब संदीप कुमार अपने साथियों संग थोलकोबाद के घने जंगलों में लूप ड्यूटी पर तैनात थे, तभी अचानक विषैले सांप या अज्ञात जीव-जंतु ने उन्हें काट लिया। साथी जवान तुरंत सक्रिय हुए। पहले उन्हें थोलकोबाद कैंप लाया गया, जहां एंटी वेनम देकर प्राथमिक उपचार किया गया।
हालत गंभीर देख रात में ही उन्हें किरीबुरू सेल हॉस्पिटल भेजा गया। वहां डॉक्टरों ने पूरी कोशिश की, लेकिन नियति ने अपना फैसला सुनाया। 30 सितम्बर की मध्यरात्रि लगभग 12 बजे संदीप कुमार ने अंतिम सांस ली।
शोक में डूबे साथी और जनता
जवान की मौत की खबर मिलते ही कोबरा 209 बटालियन के कैंपों में गहरा शोक छा गया। साथी जवान, जिन्होंने संदीप को हमेशा हंसते-मुस्कुराते देखा था, उनकी आकस्मिक विदाई को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। स्थानीय पुलिस अधिकारी और क्षेत्र की जनता भी स्तब्ध हैं।
थोलकोबाद से लेकर किरीबुरू तक हर चेहरे पर उदासी है। लोग कह रहे हैं — “देश की रक्षा में जुटा जवान, किसी युद्ध में नहीं बल्कि प्रकृति के एक विषैले वार से चला गया।”
रांची रवाना हुआ पार्थिव शरीर
इलाज के दौरान शहीद हुए संदीप कुमार का पार्थिव शरीर आवश्यक औपचारिकताओं के बाद रांची भेजा गया। वहां पोस्टमार्टम के बाद पार्थिव शरीर को राजकीय सम्मान के साथ परिजनों को सौंप अंतिम संस्कार किया जाएगा।
कर्तव्य पर शहादत : संदीप की याद में
संदीप कुमार की उम्र महज़ 27 वर्ष थी। अपने करियर की शुरुआत में ही वे कठिन और खतरनाक इलाकों में तैनात थे। नक्सल प्रभावित सारंडा के जंगल में तैनाती किसी भी जवान के लिए साहस और समर्पण की मांग करती है। संदीप ने वही किया — कर्तव्य को प्राथमिकता दी, व्यक्तिगत जीवन से ऊपर उठकर देश की रक्षा को चुना।
आमजन की संवेदनाएं
स्थानीय ग्रामीणों ने भी इस दुखद घटना पर संवेदना व्यक्त की। उनका कहना है कि जवानों के बलिदान से ही यह इलाका नक्सलियों के खौफ से बाहर निकल रहा है। संदीप की शहादत को लोग हमेशा याद रखेंगे।
निष्कर्ष : एक अधूरी कहानी, लेकिन अमर गाथा
सारंडा के जंगलों में जवान संदीप कुमार की शहादत यह बताती है कि सुरक्षा बल सिर्फ दुश्मन की गोलियों से ही नहीं, बल्कि जंगल की कठिन परिस्थितियों और अदृश्य खतरों से भी जूझते हैं।
27 साल की छोटी उम्र में संदीप का इस तरह चले जाना एक अपूरणीय क्षति है। लेकिन उनकी शहादत हमेशा यह प्रेरणा देती रहेगी कि ड्यूटी और देशप्रेम सबसे ऊपर है।















