झारखण्ड में ₹2450 प्रति क्विंटल पर पारदर्शी खरीद, बिहार में ₹1800 पर किसान असंतुष्ट
विशेष समीक्षात्मक रिपोर्ट | शैलेश सिंह
झारखण्ड में सरकारी भरोसा, किसानों को सीधा लाभ
झारखण्ड सरकार ने इस वर्ष धान अधिप्राप्ति की प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी और नियमबद्ध बनाने का दावा किया है। राज्यभर में 700 से अधिक धान अधिप्राप्ति केंद्रों के माध्यम से किसानों से सीधे धान की खरीद की जा रही है। सरकार द्वारा निर्धारित ₹2450 प्रति क्विंटल की दर से भुगतान किसानों के बैंक खातों में सीधे किया जा रहा है, जिससे बिचौलियों की भूमिका लगभग समाप्त हो गई है।

मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने स्वयं किसानों को संबोधित करते हुए स्पष्ट अपील की है कि वे किसी भी बिचौलिए या कथित एजेंट के झांसे में न आएँ। उन्होंने कहा है कि यदि कोई व्यक्ति अवैध रूप से धन की मांग करता है या भुगतान दिलाने के नाम पर गुमराह करता है, तो उसकी सूचना तत्काल अंचल कार्यालय या जिला प्रशासन को दी जाए।
मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन की अपील (प्रमुख रूप से):
“झारखण्ड सरकार द्वारा राज्य के 700 से अधिक धान अधिप्राप्ति केंद्रों पर धान खरीद की प्रक्रिया पूरी पारदर्शिता एवं निर्धारित नियमों के अनुरूप संचालित की जा रही है। सभी किसान अपने प्रखंड के नजदीकी धान अधिप्राप्ति केंद्र पर जाकर धान की बिक्री कर सकते हैं। किसानों को प्रति क्विंटल धान ₹2450 की दर से भुगतान सीधे उनके बैंक खातों में किया जा रहा है।
मैं सभी किसान भाइयों-बहनों से अपील करता हूँ कि मुआवज़ा अथवा भुगतान दिलाने के नाम पर किसी भी बिचौलिए के बहकावे में न आएँ।
यदि कोई व्यक्ति अवैध रूप से धन की मांग करता है या किसानों को गुमराह करता है, तो इसकी सूचना तुरंत संबंधित अंचल कार्यालय अथवा जिला प्रशासन को दें। किसानों की समृद्धि ही झारखण्ड की शक्ति है एवं सरकार हमेशा आपके अधिकारों की रक्षा के लिए संकल्पित है।”
धान खरीद: झारखण्ड मॉडल
झारखण्ड में धान खरीद को लेकर सरकार की रणनीति साफ दिखाई देती है—
- उच्च समर्थन मूल्य (₹2450 प्रति क्विंटल)
- डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT)
- बिचौलियों पर सख्त नजर
- प्रशासनिक निगरानी
ग्रामीण इलाकों में इसका असर यह दिख रहा है कि किसान अपेक्षाकृत संतुष्ट हैं और सरकारी व्यवस्था पर भरोसा बढ़ा है। कई किसानों का कहना है कि पहली बार उन्हें बिना कटौती के पूरा भुगतान समय पर मिल रहा है।
बिहार में धान की कीमत बनी चिंता का विषय
दूसरी ओर, धान बहुल्य राज्य बिहार में स्थिति ठीक इसके उलट नजर आ रही है। वर्तमान में वहां किसानों को ₹1800 प्रति क्विंटल के आसपास धान बेचना पड़ रहा है। यह कीमत न तो लागत के अनुरूप मानी जा रही है और न ही किसानों की मेहनत का उचित मूल्य।
कम कीमत के कारण बिहार के किसान मजबूरी में निजी व्यापारियों और बिचौलियों को धान बेचने को विवश हैं। कई जिलों से यह शिकायत सामने आ रही है कि सरकारी खरीद केंद्र या तो समय पर शुरू नहीं हुए या फिर वहां प्रक्रिया इतनी जटिल है कि किसान हतोत्साहित हो रहे हैं।
बिहार के किसानों में बढ़ती नाराज़गी
बिहार के किसानों का कहना है कि
- डीजल, खाद और बीज की लागत बढ़ चुकी है
- धान की कीमत लागत से भी कम मिल रही है
- भुगतान में देरी और सरकारी उदासीनता बनी हुई है
इसी वजह से किसान संगठनों में असंतोष बढ़ रहा है और आने वाले समय में आंदोलन की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

नीतियों का फर्क, परिणाम भी अलग
झारखण्ड और बिहार की तुलना करें तो साफ दिखाई देता है कि
- झारखण्ड में राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक सक्रियता
- बिहार में नीति और क्रियान्वयन के बीच बड़ा अंतर
जहां झारखण्ड सरकार किसानों को सीधे संबोधित कर भरोसा जता रही है, वहीं बिहार में किसानों को अब भी जवाब का इंतजार है।
किसान केंद्र में या हाशिये पर?
धान खरीद नीति केवल आर्थिक मामला नहीं, बल्कि किसानों के सम्मान और भरोसे का सवाल है। झारखण्ड में ₹2450 प्रति क्विंटल की दर और मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन की स्पष्ट अपील ने किसानों को सरकार से जोड़ा है। वहीं बिहार में कम कीमत और अव्यवस्था ने किसानों को नाराज़ और असहाय बना दिया है।
अब सवाल यह है कि क्या बिहार सरकार झारखण्ड मॉडल से सबक लेगी, या फिर धान उत्पादक किसान यूं ही अपने हक के लिए संघर्ष करते रहेंगे?










