ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल के मुख्य अभियंता पर उठे सवाल, अपने ही पत्र से फंसे अवधेश कुमार
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
पत्र जारी, कड़ा आदेश
ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल, रांची के मुख्य अभियंता अवधेश कुमार ने हाल ही में एक पत्र जारी कर सभी अधीक्षण अभियंता और कार्यपालक अभियंताओं को कड़े निर्देश दिए। पत्र में साफ कहा गया है कि—
- ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल की योजनाओं का ई-टेंडरिंग (e-tendering) प्रक्रिया किसी अन्य विभाग से नहीं कराई जाएगी।
- यदि संवेदक (Contractor) को कार्य आवंटन की प्रक्रिया यानी सीएस अनुमोदन किसी दूसरे विभाग के सक्षम अभियंता से कराया गया तो संबंधित कार्यपालक अभियंता पर निलंबन की कार्रवाई होगी।
यह आदेश जिले और प्रखंड स्तर पर काम कर रहे इंजीनियरों के लिए किसी ‘फरमान’ से कम नहीं है।

नियम पालन का सख्त दावा
पत्र में मुख्य अभियंता ने सख्त भाषा का प्रयोग करते हुए कहा है कि सभी अधिकारी तुरंत इसका अनुपालन सुनिश्चित करें। उन्होंने यह भी चेतावनी दी है कि किसी भी स्तर पर गड़बड़ी या आदेश की अवहेलना बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
पर्दे के पीछे की हकीकत
लेकिन सूत्रों के मुताबिक इस आदेश के पीछे एक बड़ी पोलखोल कहानी छिपी है। दरअसल, कई जिलों में देखा गया है कि डीएमएफटी (District Mineral Foundation Trust) और अन्य मद से चल रही योजनाओं का ई-टेंडरिंग और सीएस अनुमोदन कार्य ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल के बजाय अन्य विभागों के अभियंताओं से करा लिया जाता है। इसकी शिकायत सीधे मुख्य अभियंता तक पहुँची।

यही कारण है कि अवधेश कुमार ने आनन-फानन में पत्र जारी कर सभी अधीक्षण अभियंता और कार्यपालक अभियंताओं को ‘अनुशासन में रहने’ का आदेश सुना दिया।
मगर सवाल उठे—कौन खुद पाक-साफ है?
पत्र जारी होते ही विभागीय गलियारों में कानाफूसी शुरू हो गई। सवाल यह उठने लगा कि जो मुख्य अभियंता दूसरों पर कड़ाई दिखा रहे हैं, क्या वे खुद नियमों का पालन करते हैं?
सूत्र बताते हैं कि—
- अवधेश कुमार ने अपने कार्यकाल में ही अन्य विभागों के अभियंताओं से जिला स्तरीय निविदाओं का सीएस अनुमोदन कराया है।
- इतना ही नहीं, अपने ही मुख्य अभियंता कार्यालय के तत्कालीन तकनीकी सचिव सुनील नाथ से लगभग 200 करोड़ रुपये की योजनाओं का अनुमोदन नहीं लिया गया।
यानी, नियम बनाने वाले ही नियमों को तोड़ते रहे।
“सौ चूहे खाकर, बिल्ली हज को चली”
यह कहावत विभाग के अफसरों के बीच चर्चा का विषय बन गई है। अवधेश कुमार द्वारा जारी पत्र को पढ़ते ही कई अधिकारी तंज कसते सुने गए—
“जो खुद 200 करोड़ की योजनाओं में नियमों को ताक पर रख चुका हो, वह दूसरों को निलंबन की धमकी दे रहा है। सच सामने आए तो सबसे पहले कार्रवाई उसी पर होनी चाहिए।”

अधिकारियों में नाराजगी
मुख्य अभियंता के इस पत्र से विभागीय अधिकारियों में असंतोष फैल गया है। अधीक्षण अभियंता और कार्यपालक अभियंता मानते हैं कि:
- एक तरफ उन्हें निलंबन की धमकी दी जा रही है।
- दूसरी तरफ, खुद शीर्ष अधिकारी खुलेआम नियम तोड़ते रहे हैं।
- यह आदेश “नैतिक अधिकार” से ज्यादा “दिखावा” प्रतीत हो रहा है।
200 करोड़ की योजनाओं पर बड़ा सवाल
सबसे गंभीर आरोप है कि मुख्य अभियंता अवधेश कुमार ने अपने कार्यकाल में तकनीकी सचिव सुनील नाथ से लगभग 200 करोड़ रुपये की योजना का ‘मंतव्य’ (Opinion/Approval) तक नहीं लिया। यहाँ तक कि उन्होंने अधीक्षण अभियंता रहते भी अन्य विभागों के अभियंताओं से संबंधित एजेंसियों के निविदा अनुमोदन कराए।
अगर इसकी जांच निष्पक्ष रूप से कराई जाए तो खुद मुख्य अभियंता की गंभीर लापरवाही और नियम उल्लंघन सामने आ सकता है।
दोहरे चरित्र की मिसाल?
पत्र जारी कर मुख्य अभियंता ने खुद को “नियमों का प्रहरी” बताने की कोशिश की। लेकिन उनके ही कार्यकाल की परतें खुलने पर साफ हो रहा है कि मामला उल्टा है।
यानी, “दूसरों को कानून का पाठ पढ़ाना और खुद मनमानी करना”— यही असली तस्वीर सामने आ रही है।
सरकार और विभाग की भूमिका
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार और विभागीय मंत्री इस मामले को गंभीरता से लेंगे?
- क्या मुख्य अभियंता के आदेश का पालन करवाने के साथ-साथ उनकी अपनी भूमिका की भी जांच होगी?
- या यह पत्र केवल अधीनस्थ अधिकारियों को डराने और खुद को ‘ईमानदार छवि’ दिखाने का साधन भर है?
जांच की मांग तेज
पत्र जारी होते ही विभागीय हलकों में यह मांग उठने लगी है कि—
- अवधेश कुमार के पिछले सभी आदेशों और अनुमोदनों की आंतरिक जांच कराई जाए।
- खासकर 200 करोड़ रुपये की योजना के मामले की फाइलें सार्वजनिक की जाएँ।
- यदि नियम उल्लंघन साबित होता है तो मुख्य अभियंता पर भी वही कार्रवाई हो, जिसकी धमकी वे दूसरों को दे रहे हैं।
निष्कर्ष
ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल का यह ताजा मामला बताता है कि ऊपर से नीचे तक दोहरा खेल चल रहा है। मुख्य अभियंता का पत्र देखने में तो सख्त और अनुशासनात्मक प्रतीत होता है, लेकिन हकीकत में यह खुद उनके गुनाहों पर पर्दा डालने की कोशिश लग रहा है।
यही कारण है कि आज विभागीय अफसरों के बीच यह चर्चा जोर पकड़ रही है—













