निर्माणाधीन पुल बना आदिवासियों की मौत का रास्ता, विभाग और जेई कठघरे में
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
अत्यंत नक्सल प्रभावित सारंडा जंगल के छोटानागरा थाना क्षेत्र अंतर्गत ऊसुरुइया गांव के समीप नदी पर निर्माणाधीन बड़े पुल की गुणवत्ता को लेकर ग्रामीणों का गुस्सा अब सड़क पर उतर आया है। ग्रामीणों ने इस पुल निर्माण को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं कि इसमें जानबूझकर घटिया सामग्री का उपयोग किया जा रहा है और सरिया की दूरी मानक से कहीं अधिक रखी जा रही है, जिससे यह पुल भविष्य में कभी भी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकता है।
ग्रामीणों का आरोप है कि दो सरियों के बीच की दूरी 300 से 350 एमएम (12 से 14 इंच) तक रखी जा रही है, जबकि इंजीनियरिंग मानकों के अनुसार डेक स्लैब में मुख्य सरिया की दूरी 100 से 150 एमएम (4 से 6 इंच) और वितरण सरिया की दूरी 150 से 200 एमएम (6 से 8 इंच) होनी चाहिए। यह अंतर केवल तकनीकी गलती नहीं बल्कि सीधे तौर पर भ्रष्टाचार और जनजीवन से खिलवाड़ का प्रमाण है।

ग्रामीणों का आरोप: “सरिया बचाकर पुल बनाया जा रहा है”
सारंडा के आदिवासी ग्रामीणों का कहना है कि ठेकेदार द्वारा जानबूझकर सरिया कम लगाया जा रहा है ताकि लागत बचाकर मुनाफा कमाया जा सके। यह खेल विभागीय अधिकारियों और निर्माण कार्य की देखरेख करने वाले जूनियर इंजीनियर (JE) की मिलीभगत के बिना संभव नहीं है।
ग्रामीणों ने कहा कि जब उन्होंने सवाल उठाया तो उन्हें चुप कराने की कोशिश की गई। यह स्पष्ट संकेत है कि इस पूरे निर्माण में भारी भ्रष्टाचार हो रहा है। सवाल यह है कि क्या नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण अधिकारियों को लगता है कि यहां कोई पूछने वाला नहीं?
दर्जनों गांवों की लाइफ लाइन है यह पुल
यह पुल केवल एक निर्माण परियोजना नहीं, बल्कि थोलकोबाद, बालिबा, ऊसुरुइया, कुदलीबाद, कोलाईबुरु, कुमडीह, होलांगउली सहित दर्जनों गांवों की जीवनरेखा है। बरसात के मौसम में नदी उफान पर आ जाती है और ये गांव टापू में तब्दील हो जाते हैं।
ग्रामीणों के लिए जिला और प्रखंड मुख्यालय से संपर्क पूरी तरह टूट जाता है। राशन, दवा, शिक्षा और रोजगार सब कुछ ठप हो जाता है। यही पुल इन गांवों को दुनिया से जोड़ने का एकमात्र साधन है।
मरीजों के लिए मौत का रास्ता
बरसात के दिनों में जब कोई बीमार पड़ता है तो उसे अस्पताल ले जाना लगभग असंभव हो जाता है। कई बार ग्रामीणों को नदी पार कराने के लिए चारपाई या बांस के सहारे अस्थायी पुल बनाना पड़ता है।
अब तक कई ग्रामीण नदी पार करते समय बहकर अपनी जान गंवा चुके हैं।
गर्भवती महिलाओं के लिए यह स्थिति और भी भयावह है। प्रसव के समय अस्पताल पहुंचना एक जुआ खेलने जैसा होता है—या तो जान बचेगी या नदी में समा जाएगी।
बच्चों की शिक्षा पर भी संकट
इन गांवों के बच्चे स्कूल और कॉलेज जाने के लिए रोज नदी पार करते हैं। बरसात में स्कूल बंद हो जाते हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई महीनों तक प्रभावित रहती है। कई बच्चे इसी वजह से पढ़ाई छोड़ चुके हैं।
सरकार “शिक्षा सबके लिए” का नारा देती है, लेकिन सारंडा के बच्चों के लिए स्कूल तक पहुंचना ही सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है।
सुरक्षा बलों के लिए भी खतरा
इस क्षेत्र में दर्जनों पुलिस और सीआरपीएफ कैंप हैं जो नक्सलियों से लड़ाई लड़ रहे हैं। बीते 22 जनवरी को इसी क्षेत्र के कुमडीह–बहदा गांव के बीच जंगल में मुठभेड़ हुई थी, जिसमें 17 इनामी नक्सली मारे गए थे।
बरसात के समय जब नदी उफान पर होती है, तब सुरक्षा बलों की आवाजाही भी बाधित होती है। पिछले वर्ष सीआरपीएफ का वाहन नदी पार करते समय बहने लगा था। यदि मजबूत पुल होता तो ऐसी स्थिति पैदा ही नहीं होती।
तीन साल से विवादों में निर्माण कार्य
इस पुल का निर्माण तीन साल पहले शुरू हुआ था और तब से यह विवादों में है। पूर्व सांसद गीता कोड़ा ने भी निर्माण स्थल का निरीक्षण कर घटिया निर्माण पर गंभीर सवाल उठाए थे।
उनके द्वारा लगाए गए आरोपों में शामिल थे:
सारंडा जंगल से अवैध रूप से पत्थर निकालकर पुल निर्माण में लगाना
ग्रामीण मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी नहीं देना
प्राक्कलन के विपरीत कार्य करना
गुणवत्ता से समझौता करना
इतने गंभीर आरोपों के बावजूद आज तक न तो कोई ठोस जांच हुई और न ही किसी पर कार्रवाई।
जांच क्यों नहीं हुई? किसे बचाया जा रहा है?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब जनप्रतिनिधि और ग्रामीण दोनों ने शिकायत की, तो अब तक जांच क्यों नहीं हुई? क्या विभागीय अधिकारियों को बचाया जा रहा है? क्या नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण सरकार ने आंखें मूंद ली हैं?
यह पुल केवल कंक्रीट और सरिया का ढांचा नहीं, बल्कि हजारों आदिवासियों की उम्मीद है। अगर इसमें घटिया निर्माण हुआ तो यह भविष्य में सामूहिक मौत का कारण बन सकता है।

आदिवासियों की पीड़ा बनाम सरकारी संवेदनहीनता
सारंडा के आदिवासी पहले ही जंगल, पानी, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। अब जो एकमात्र बड़ा विकास कार्य हो रहा है, उसमें भी भ्रष्टाचार की बदबू आ रही है।
ग्रामीणों का कहना है—
“सरकार हमें नक्सल प्रभावित कहकर हर बार नजरअंदाज कर देती है। क्या हमारी जान की कीमत कम है?”
उच्च स्तरीय जांच की मांग
ग्रामीणों ने मांग की है कि इस पुल निर्माण की उच्च स्तरीय तकनीकी जांच कराई जाए। किसी स्वतंत्र एजेंसी से सरिया, कंक्रीट और डिजाइन की जांच होनी चाहिए। दोषी ठेकेदार और विभागीय अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
साथ ही निर्माण कार्य तब तक रोका जाए जब तक मानकों के अनुसार पुनः कार्य न किया जाए।
अगर यह पुल गिरा तो जिम्मेदार कौन?
यह सवाल अब पूरे सारंडा में गूंज रहा है—
अगर कल यह पुल गिर गया और दर्जनों जानें चली गईं, तो जिम्मेदार कौन होगा? ठेकेदार? जेई? विभाग? या सरकार?
इतिहास गवाह है कि जब भी कोई पुल गिरता है, जांच होती है, कुछ निलंबन होते हैं और मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। लेकिन सारंडा के आदिवासी अब और लाशें नहीं देखना चाहते।

सारंडा की आवाज: “पुल चाहिए, मौत नहीं”
सारंडा के गांवों की एक ही मांग है—
मजबूत पुल, ईमानदार निर्माण और जवाबदेह प्रशासन।
यह पुल उनके लिए विकास का प्रतीक बन सकता था, लेकिन भ्रष्टाचार ने इसे डर का प्रतीक बना दिया है।
यदि समय रहते जांच और सुधार नहीं हुआ, तो यह निर्माणाधीन पुल सारंडा के इतिहास में एक और घोटाले और त्रासदी के रूप में दर्ज होगा।
यह मामला केवल तकनीकी खामी का नहीं, बल्कि आदिवासियों के जीवन अधिकार का है। सरकार यदि सच में विकास और सुरक्षा चाहती है, तो उसे सबसे पहले इस पुल निर्माण की निष्पक्ष जांच करानी होगी और दोषियों को जेल भेजना होगा।
वरना सारंडा के लोग यही कहेंगे—
“सरकार ने हमें पुल नहीं दिया, बल्कि मौत का रास्ता बना दिया।”













