गवर्नेस बॉडी को दरकिनार कर अभियंता प्रतिनियुक्ति, सत्ता–संरक्षण में प्रशासन बेलगाम
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
पश्चिमी सिंहभूम जिला इन दिनों प्रशासनिक मनमानी, नियम-विरोधी प्रतिनियुक्ति और संभावित भ्रष्टाचार को लेकर उबाल पर है। बिना विभागीय सहमति, बिना पूर्व सूचना और अब जिला परिषद की गवर्नेस बॉडी को पूरी तरह नजरअंदाज कर अभियंताओं की प्रतिनियुक्ति का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। यह प्रकरण अब केवल जिला स्तर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मुख्य सचिव अविनाश कुमार तक पहुंच चुका है।

जिला परिषद की गवर्नेस बॉडी को दरकिनार करना: सीधा संविधानिक अपमान
नियमों के अनुसार,
👉 जिला परिषद में किसी भी प्रकार की नियुक्ति या प्रतिनियुक्ति का विषय जिला परिषद की गवर्नेस बॉडी, अर्थात जिला परिषद की औपचारिक बैठक में प्रस्ताव के रूप में लाया जाना अनिवार्य है।
लेकिन पूर्व विधायक मंगल सिंह बोबोंगा के अनुसार,
जिला अभियंता धीरेन्द्र कुमार ने इस पूरी प्रक्रिया को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।
- न जिला परिषद की बैठक में प्रस्ताव रखा गया
- न निर्वाचित सदस्यों से चर्चा की गई
- न गवर्नेस बॉडी की स्वीकृति ली गई
यह न सिर्फ प्रशासनिक अनियमितता है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का खुला उल्लंघन भी माना जा रहा है।
क्या जिला परिषद अब अफसरों की बपौती है?
जिला परिषद एक संवैधानिक स्वायत्त संस्था है,
जिसके निर्णय निर्वाचित जनप्रतिनिधियों द्वारा लिए जाते हैं।
लेकिन यहां स्थिति यह बन गई है कि—
“अफसर तय करेंगे, परिषद मूकदर्शक बनेगी।”
यह सवाल अब खुले तौर पर उठ रहा है कि
क्या जिला परिषद को जानबूझकर कमजोर किया जा रहा है?
सत्ता की छाया में जिला अभियंता की ताजपोशी
इस पूरे विवाद के केंद्र में हैं जिला अभियंता धीरेन्द्र कुमार।
सूत्र बताते हैं कि—
- पूर्व मंत्री दिवंगत महतो से पारिवारिक संबंध
- पिछली सरकार में मंत्री रहीं बेबी देवी के दामाद
- पंचायती राज सेवा में लाने की विशेष व्यवस्था
- और फिर पहुंच और पैरवी के दम पर
सहायक अभियंता से जिला अभियंता तक की छलांग
इन तथ्यों के बाद यह सवाल स्वाभाविक है—
क्या यह पदस्थापना योग्यता की देन है या रिश्तों की?
पदभार संभालते ही ‘अपनी टीम’ की कवायद
जिला अभियंता का पदभार संभालते ही
जिले से अभियंताओं की मांग शुरू कर दी गई, लेकिन—
- पंचायती राज विभाग से सहमति नहीं ली
- ग्रामीण कार्य विभाग से NOC नहीं ली
- जिला परिषद की बैठक में प्रस्ताव नहीं रखा
यानि हर उस मंच को दरकिनार कर दिया गया
जहां जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित होती है।
भुगतान लटकाकर दबाव की राजनीति?
जिला परिषद में यह चर्चा भी तेज है कि
संवेदकों के भुगतान को अनावश्यक रूप से रोका जा रहा है।
सूत्रों का दावा है—
- फाइलें जानबूझकर रोकी जा रही हैं
- भुगतान में देरी कर दबाव बनाया जा रहा है
- ताकि “मैनेजमेंट” और “समझौते” का रास्ता खुले
यानी विकास कार्यों से ज्यादा
डीलिंग सिस्टम सक्रिय नजर आ रहा है।

“कमिशन वसूली की टीम” — पूर्व विधायक का बड़ा आरोप
पूर्व विधायक मंगल सिंह बोबोंग ने इस पूरे प्रकरण को
सीधे-सीधे “कमिशन वसूली की टीम” करार दिया है।
उनका कहना है—
“नियमों को तोड़कर अभियंताओं की प्रतिनियुक्ति
विकास के लिए नहीं,
बल्कि विकास राशि की लूट के लिए की जा रही है।”
जिला परिषद के प्रस्ताव के बिना नियुक्ति = अवैध कार्रवाई?
पूर्व विधायक का कहना है कि—
“जब तक जिला परिषद की गवर्नेस बॉडी में प्रस्ताव पारित नहीं होता,
तब तक कोई भी नियुक्ति या प्रतिनियुक्ति
पूरी तरह अवैध मानी जाएगी।”
उन्होंने इसे
👉 लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने की साजिश
👉 अफसरशाही का तानाशाही रवैया
बताया है।
मुख्य सचिव तक पहुंचेगा मामला
पूर्व विधायक मंगल सिंह बोबोंग ने साफ किया है कि—
“जिला प्रशासन द्वारा नियमों की अनदेखी कर
अभियंताओं की प्रतिनियुक्ति की गई है।
इसकी लिखित शिकायत मुख्य सचिव अविनाश कुमार से की जाएगी।”
सूत्रों के अनुसार,
इस शिकायत में
- विभागीय सहमति की अनदेखी
- जिला परिषद की गवर्नेस बॉडी को दरकिनार करना
- और भुगतान रोके जाने जैसे बिंदुओं को प्रमुखता से उठाया जाएगा।
“टीम बनाकर विकास राशि लूटने की तैयारी” – सीधा हमला
पूर्व विधायक ने यह भी आरोप लगाया कि—
“जिला अभियंता धीरेन्द्र कुमार
अपनी मनपसंद टीम बनाकर
विकास राशि को नियंत्रित और लूटने की तैयारी में हैं।”
अगर यह आरोप सही साबित होते हैं,
तो यह मामला
👉 केवल प्रशासनिक अनियमितता नहीं
👉 बल्कि संगठित भ्रष्टाचार की श्रेणी में आएगा।
सबसे बड़ा सवाल: जवाबदेही कौन तय करेगा?
आज पश्चिमी सिंहभूम में स्थिति यह है कि—
- नियम तोड़े जा रहे हैं
- संस्थाओं को दरकिनार किया जा रहा है
- और सत्ता की छाया में फैसले लिए जा रहे हैं
लेकिन सवाल वही है—
क्या कोई अफसर जवाबदेह होगा?
विकास नहीं, वसूली की स्क्रिप्ट?
जिला परिषद जैसी संवैधानिक संस्था को नजरअंदाज कर
अगर नियुक्तियां और प्रतिनियुक्तियां होंगी,
तो यह साफ संकेत है कि—
- विकास प्राथमिकता नहीं
- पारदर्शिता बोझ है
- और नियम सिर्फ कागजों तक सीमित हैं
अब निगाहें मुख्य सचिव और राज्य सरकार पर टिकी हैं।
अगर यहां भी चुप्पी रही,
तो यह संदेश जाएगा कि—
“पश्चिमी सिंहभूम में
नियम नहीं,
पहचान और पहुंच चलती है।”













