सात साल जूनियर अफसर की ताजपोशी, विकास कार्य ठप—पंचायती राज व्यवस्था पर सीधा हमला
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
पश्चिमी सिंहभूम जिला में इन दिनों पंचायती राज व्यवस्था के भीतर एक ऐसा विवाद सिर उठा चुका है, जिसने पूरे प्रशासनिक ढांचे को सवालों के घेरे में ला दिया है। आरोप है कि जिला परिषद में विकास कार्यों को प्रभावित करने, अभियंताओं के कार्य क्षेत्र में भारी अनियमितता बरतने और संवेदकों से आर्थिक दोहन जैसे गंभीर मामलों के बीच एक विवादित नियुक्ति कर दी गई—और वह भी नियमों को ताक पर रखकर।
मामला जल संसाधन विभाग के सहायक अभियंता धीरेन्द्र कुमार को जिला अभियंता के रूप में पदस्थापित करने से जुड़ा है, जिसने आते ही पूरे सिस्टम में भूचाल ला दिया है।

नियमों की धज्जियां: सात साल जूनियर को बना दिया ‘बॉस’
सूत्रों के अनुसार, धीरेन्द्र कुमार सहायक अभियंताओं की वरीयता सूची में अपने समकक्ष अधिकारियों से करीब सात साल जूनियर बताए जा रहे हैं। ऐसे में उनका सीधे जिला अभियंता जैसे महत्वपूर्ण पद पर बैठना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
यह सिर्फ एक पदस्थापन नहीं, बल्कि सीनियरिटी और पारदर्शिता की खुलेआम अनदेखी है। विभागीय नियमों को दरकिनार कर की गई यह नियुक्ति पूरे प्रशासनिक तंत्र पर सवालिया निशान लगा रही है।
‘पावर कनेक्शन’ का खेल? पूर्व मंत्री से रिश्ते का दावा
इस विवाद को और हवा तब मिली, जब यह चर्चा सामने आई कि धीरेन्द्र कुमार खुद को स्वर्गीय जगन्नाथ महतो, पूर्व मंत्री का दामाद बताते हैं।
अगर यह दावा सही है, तो सवाल उठना लाजिमी है—
👉 क्या यह नियुक्ति योग्यता के आधार पर हुई या ‘रिश्तों की ताकत’ पर?
👉 क्या राजनीतिक पहुंच ने प्रशासनिक नियमों को कुचल दिया?
जिला परिषद में बगावत: 10 सदस्यों ने खोला मोर्चा
धीरेन्द्र कुमार के पदभार ग्रहण करते ही जिला परिषद के भीतर असंतोष फूट पड़ा।
जिला परिषद के 10 सदस्यों ने एकजुट होकर उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
इन जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि—
* पंचायत स्तर पर विकास कार्यों को जानबूझकर बाधित किया जा रहा है
* अभियंताओं के कार्य क्षेत्र का बंटवारा मनमाने ढंग से किया गया
* पूर्व में आवंटित निविदाओं में हस्तक्षेप कर संवेदकों का आर्थिक शोषण किया गया
यह सीधा-सीधा पंचायती राज व्यवस्था को कमजोर करने की साजिश बताया जा रहा है।

DC से लेकर सचिव तक शिकायत—फिर भी चुप्पी क्यों?
मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि—
* उपायुक्त चन्दन कुमार
* उप विकास आयुक्त (DDC)
* विभागीय सचिव
सभी को लिखित शिकायत सौंपी जा चुकी है।
इसके बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होना प्रशासनिक निष्क्रियता को उजागर करता है। सवाल यह है कि—
👉 आखिर किस दबाव में फाइलें दबाई जा रही हैं?
👉 क्यों नहीं हो रही निष्पक्ष जांच?
सत्ताधारी दल भी नाराज: कांग्रेस जिला अध्यक्ष ने भी उठाया मुद्दा
मामला सिर्फ प्रशासनिक गलियारों तक सीमित नहीं रहा।
सत्ता में शामिल कांग्रेस पार्टी के जिला अध्यक्ष ने भी इस नियुक्ति और कार्यशैली पर गंभीर आपत्ति जताते हुए विभागीय सचिव को लिखित शिकायत भेजी है।
जब सत्ताधारी गठबंधन के भीतर से ही विरोध उठ रहा हो, तो यह संकेत है कि मामला बेहद गंभीर और व्यापक है।

वित्तीय वर्ष के अंत में ‘गायब’ सिस्टम—किसके इशारे पर खेल?
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि वित्तीय वर्ष के अंतिम महीने में, जब विकास कार्यों को तेजी से पूरा किया जाना चाहिए था, उस समय—
👉 संबंधित अधिकारी की अनुपस्थिति
👉 कार्यों की धीमी गति
👉 और फाइलों का अटकना
यह सब मिलकर यह संकेत देता है कि कहीं न कहीं योजनाबद्ध तरीके से विकास कार्यों को प्रभावित किया जा रहा है।
संवेदकों से ‘आर्थिक दोहन’ का आरोप—गंभीर जांच की मांग
पूर्व में आवंटित निविदाओं से जुड़े संवेदकों ने भी आरोप लगाया है कि—
* उनसे अनुचित दबाव बनाया गया
* कार्य में अनावश्यक हस्तक्षेप किया गया
* और आर्थिक लाभ के लिए परेशान किया गया
अगर यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का संगठित नेटवर्क हो सकता है।
पंचायती राज पर सीधा हमला—गांवों का विकास दांव पर
पंचायती राज व्यवस्था का उद्देश्य गांव-गांव तक विकास पहुंचाना है। लेकिन अगर जिला स्तर पर ही ऐसी अनियमितताएं होंगी, तो इसका सीधा असर—
👉 ग्रामीण सड़कों
👉 जल योजनाओं
👉 और बुनियादी सुविधाओं पर पड़ेगा
यानी, इस पूरे विवाद की कीमत आखिरकार आम जनता और ग्रामीण इलाकों को चुकानी पड़ेगी।
अब बड़ा सवाल: कार्रवाई कब?
इस पूरे मामले में अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
👉 क्या सरकार इस विवादित नियुक्ति पर कार्रवाई करेगी?
👉 क्या निष्पक्ष जांच होगी या मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
अगर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला सिर्फ एक जिले तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे राज्य में प्रशासनिक पारदर्शिता पर बड़ा सवाल बन जाएगा।
सिस्टम पर भरोसा या ‘सिस्टम का खेल’?
पश्चिमी सिंहभूम में उठे इस विवाद ने यह साफ कर दिया है कि—
जब नियमों को नजरअंदाज कर फैसले लिए जाते हैं,
तो सिस्टम पर भरोसा कमजोर पड़ता है।
अब देखना यह है कि—
👉 सरकार और प्रशासन इस ‘इंजीनियर राज’ के खेल को खत्म करते हैं,
या फिर यह मामला भी फाइलों के ढेर में दबकर रह जाएगा।














