रिपोर्ट: शैलेश सिंह
झारखंड के ग्रामीण कार्य विभाग सहित कई जिला स्तरीय योजनाओं में टेंडर और पोस्टिंग का खेल इस कदर गहराया हुआ है कि अभियंताओं की नौकरी सीधे दांव पर लग चुकी है। राजनीतिक हस्तक्षेप का दबाव इतना बढ़ चुका है कि अभियंता न तो स्वतंत्र रूप से निर्णय ले पा रहे हैं और न ही सही तरीके से काम करने की स्थिति में हैं। विभाग के अंदरूनी मामलों में जिस तरह टेंडर प्रक्रियाओं में दखल दिया जा रहा है, वह आने वाले समय का एक बड़ा प्रशासनिक संकट बनने जा रहा है।
टेंडर प्रक्रिया का नया रोग: पास-फेल का ब्लैकमेलिंग खेल
राज्य में कई संवेदक सालों से यह आरोप लगाते रहे हैं कि टेंडर प्रक्रिया पूरी तरह ‘मैनेजमेंट’ पर आधारित हो गई है। हाल की घटनाओं में कई योग्य संवेदकों को पास होने के बावजूद फेल कर दिया गया, जबकि कमजोर संवेदकों को राजनीतिक दबाव के तहत पास कर दिया गया। यह सिर्फ कागज़ी हेरफेर नहीं, बल्कि अभियंताओं पर सीधे-सीधे रिश्वत और दबाव का खेल है।

एक वर्ष तक टेंडर लंबित रखना, फाइल रोकना, नोटिंग बदलना—ये सब आम होता जा रहा है। जब संवेदक न्यायालय पहुंच रहे हैं तो विभाग की पोल खुल रही है और अभियंताओं की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय होने लगी है।
राजनीतिक हस्तक्षेप ने तोड़ी सिस्टम की रीढ़
ग्रामीण कार्य विभाग में टेंडर आवंटन अब तकनीकी योग्यता का मामला कम और सत्ता से संबंध का मामला ज्यादा बन गया है। जो अभियंता राजनीतिक नेताओं के इशारे पर काम नहीं करता, उस पर चौतरफा दबाव बनाया जाता है—
- पोस्टिंग रोक देना
- कार्यभार हटाना
- फाइल आगे न बढ़ाना
- अनुशासनात्मक कार्रवाई का डर
यह स्थिति न सिर्फ अभियंताओं की प्रोफेशनल गरिमा को नष्ट कर रही है, बल्कि सरकारी योजनाओं को भी बंधक बना रही है।
पूर्व मुख्य अभियंता बिरेंद्र राम—एक चेतावनी, एक सबक
सेवानिवृत्त अभियंता प्रमुख ने साफ कहा है— “राजनीतिज्ञों को खुश करने की कोशिश में अभियंता खुद को बर्बाद कर रहे हैं।”
उन्होंने पूर्व मुख्य अभियंता बिरेंद्र राम का उदाहरण दिया, जो नेताओं को खुश करने के चक्कर में जेल तक पहुंच गए। सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि जिन नेताओं के इशारों पर उन्होंने काम किया— वही नेता एक भी दिन उनके समर्थन में नहीं खड़े हुए।
यही वह सबक है जिसे आज के अभियंता अनदेखा कर रहे हैं। किसी और को गलत ढंग से लाभ पहुंचाकर अपनी नौकरी, करियर और परिवार को बर्बादी की ओर धकेलना— यह मूर्खता है, सेवा नहीं।
क्रीम पोस्ट की बोली—अभियंता खुद ले रहे हैं भ्रष्टाचार का ठेका
राज्य में यह नई प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है कि ‘क्रीम पोस्ट’ पाने के लिए लाखों रुपये की बोली लगाई जा रही है। जो पोस्टिंग राजनीतिक पहुंच और रुपए देकर ली जाती है, वहां ईमानदारी की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
सच्चाई यह है कि अभियंता की सैलरी पहले से ही संतोषजनक है। फिर भी अतिरिक्त कमाई के लालच में कई अभियंता अपनी इज्जत, प्रतिष्ठा और भविष्य को दांव पर लगा रहे हैं। आख़िर किसके लिए? नेतृत्व तो जरूरत पड़ने पर पल भर में किनारा कर लेता है।
गंभीर विडंबना: गलत को बचाने में अभियंता खुद को फंसा रहे
आज झारखंड में टेंडर प्रक्रिया इतनी अनियमित हो चुकी है कि ‘सिस्टम’ नाम की चीज बेजान हो गई है।
- टेंडर समय पर नहीं निकल रहा
- पास को फेल, फेल को पास किया जा रहा
- न्यायालय में विवादों की संख्या बढ़ रही
- तकनीकी रिपोर्ट राजनीति के इशारे पर बदली जा रही
इस सबके बीच अभियंता सबसे कमजोर कड़ी बन चुके हैं। नेता बदलेंगे, सरकार बदलेगी, लेकिन अभियंता ही आरोप, FIR, जेल और निलंबन भुगतेंगे।
अभियंताओं के लिए चेतावनी: “अपने परिवार को देखिए, नहीं तो परिणाम बिरेंद्र राम से भी भयावह होंगे”
सेवानिवृत्त अभियंता प्रमुख का यह बयान विभाग की वास्तविकता बयान करता है: “आज के अभियंता राजनीतिक दबाव में काम कर रहे हैं। यह प्रवृत्ति उन्हें बरबाद कर देगी। अपने परिवार, अपने करियर को देखिए—क्योंकि राजनेता न आज आपके साथ थे, न कल खड़े होंगे।”
अभियंता आज एक खतरनाक मोड़ पर खड़े हैं— सिस्टम और राजनीति के बीच पिसता हुआ वर्ग। सही कहा जाए तो झारखंड में अभियंता ‘तलवार की नोक पर नौकरी’ कर रहे हैं।
समाधान: पारदर्शिता ही ‘सुरक्षा कवच’ है
यदि अभियंता समय रहते नहीं चेते, तो आने वाले वर्षों में विभाग में बड़े पैमाने पर कार्रवाई और गिरफ्तारियां देखनी पड़ सकती हैं। सेवानिवृत्त अभियंता प्रमुख का स्पष्ट कहना है: “टेंडर प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता ही अभियंताओं की सुरक्षा कवच है। सीएस (कम्प्लीट सेट) साफ-सुथरा बनाएं, नियम का पालन करें—यही एकमात्र रास्ता है।”
निष्कर्ष
झारखंड का टेंडर सिस्टम गहरे संकट में है। राजनीतिक दखल, पोस्टिंग की बोली, पास-फेल की हेराफेरी और संवेदकों की न्यायालयी लड़ाई—इस सबके बीच अभियंता चाहे या न चाहे, आरोपी बनाया जा रहा है।
जो आज नहीं चेते, कल वही बिरेंद्र राम की तरह अकेले खड़े होंगे— और नेता… नेता वहीं होंगे जहां हमेशा रहते हैं—सिर्फ अपने लाभ के साथ।














