“अधिकारियों की आंखों के सामने भ्रष्टाचार का खेल!”
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
जगन्नाथपुर प्रखंड कार्यालय के ठीक सामने बने फुटबॉल मैदान में हुआ निर्माण कार्य अब भ्रष्टाचार की जिंदा मिसाल बन चुका है।
घटिया सामग्री से बने चेंजिंग रूम, पेयजल व्यवस्था, शौचालय और गैलरी कुछ ही दिनों में जवाब दे चुके हैं। दीवारों में दरारें पड़ गई हैं, प्लास्टर उखड़ने लगा है और शौचालय का सेप्टिक टैंक अधूरा पड़ा है।
सोमवार को झारखण्ड आंदोलनकारी संयुक्त मोर्चा के केंद्रीय उपाध्यक्ष मंजीत कोड़ा ने इस पूरे मामले की लिखित शिकायत उपायुक्त के नाम अनुमंडल विकास पदाधिकारी को सौंपकर प्रशासन और संवेदक पर तीखा हमला बोला।
उन्होंने साफ शब्दों में कहा—
“यह सिर्फ विकास के नाम पर भ्रष्टाचार नहीं है,
बल्कि खिलाड़ियों और खेल प्रेमियों के नाम पर खुला धोखा है।”

12 लाख की योजना, कुछ दिनों में जर्जर
शिकायत पत्र में बताया गया है कि कार्यकारी एजेंसी ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल, चाईबासा द्वारा
जगन्नाथपुर पंचायत के प्रखंड स्टेडियम फुटबॉल मैदान में—
* चेंजिंग रूम
* पेयजल व्यवस्था
* शौचालय
* गैलरी
का निर्माण कराया गया।
इस योजना की कुल लागत थी 12,20,403.88 रुपये।
कार्य प्रारंभ होने की तिथि 20 जुलाई 2023 और समाप्ति की तिथि 19 अक्टूबर 2024 निर्धारित थी।
लेकिन हैरानी की बात यह है कि निर्माण पूरा होने के कुछ ही दिनों बाद—
* गैलरी में दरारें पड़ने लगीं
* दीवारों का प्लास्टर उखड़ने लगा
* शौचालय के सेप्टिक टैंक में मिट्टी लेवलिंग अधूरी रह गई
मंजीत कोड़ा ने सवाल उठाया—
“अगर लाखों रुपये की योजना का हाल यह है, तो पैसा आखिर गया कहां?”

50 कदम पर अफसरों के दफ्तर, फिर भी घटिया निर्माण
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह घटिया निर्माण—
एसडीओ, एसडीपीओ, बीडीओ और सीओ के कार्यालय से महज 50 कदम की दूरी पर किया गया है।
मंजीत कोड़ा ने तीखे शब्दों में कहा—
“जब बड़े अधिकारियों के कार्यालय और आवास के बगल में संवेदक इस तरह घटिया निर्माण कर सकता है,
तो ग्रामीण इलाकों में विकास कार्य की हालत कैसी होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।”
उन्होंने आरोप लगाया कि—
“संवेदक को किसी तरह का डर या भय नहीं है,
क्योंकि उसे संरक्षण मिला हुआ है।”
खेल और खिलाड़ियों के नाम पर घोटाला
मंजीत कोड़ा ने कहा कि यह मामला सिर्फ तकनीकी गड़बड़ी नहीं, बल्कि—
खेल और खिलाड़ियों के नाम पर सुनियोजित लूट है।
उन्होंने कहा—
“खिलाड़ियों के लिए बनाए गए चेंजिंग रूम खुद बदलने लायक नहीं बचे हैं।
गैलरी में बैठना खतरे से खाली नहीं है।
शौचालय अधूरा पड़ा है।
क्या यही खेल विकास है?”
उनका कहना है कि इस घटिया निर्माण से कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है और इसकी पूरी जिम्मेदारी संवेदक और संबंधित अधिकारियों की होगी।

संवेदक पर कड़ी कार्रवाई की मांग
मंजीत कोड़ा ने उपायुक्त से मांग की है कि—
* पूरे निर्माण कार्य की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए
* दोषी संवेदक पर कठोर कानूनी कार्रवाई हो
* योजना का तकनीकी ऑडिट कराया जाए
* जिम्मेदार अधिकारियों की भी जवाबदेही तय की जाए
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
अब तक इस मामले में प्रशासन की ओर से कोई ठोस बयान सामने नहीं आया है।
लेकिन सवाल गंभीर हैं—
* बिना गुणवत्ता जांच के भुगतान कैसे कर दिया गया?
* इंजीनियरों की निरीक्षण रिपोर्ट कहां है?
* क्या यह मिलीभगत का खेल है?
* क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी या मामला दबा दिया जाएगा?

“यह विकास नहीं, भ्रष्टाचार का स्मारक है”
मंजीत कोड़ा ने कहा—
“यह खेल मैदान विकास का प्रतीक होना चाहिए था, लेकिन इसे भ्रष्टाचार का स्मारक बना दिया गया है।”
उन्होंने आगे कहा—
“अगर आज यहां चुप रहे,
तो कल पूरे झारखंड में यहीं लूट मचेगी”

अब प्रशासन की अग्निपरीक्षा
जगन्नाथपुर स्टेडियम का यह मामला अब सिर्फ निर्माण की गड़बड़ी नहीं,
बल्कि यह प्रशासन की ईमानदारी की अग्निपरीक्षा बन चुका है।
सवाल साफ है—
क्या दोषी संवेदक पर कार्रवाई होगी?
या फिर यह मामला भी फाइलों में दबा दिया जाएगा?
आज स्टेडियम की दीवारों पर दरारें हैं,
और जनता पूछ रही है—
**“अगर अधिकारियों की नाक के नीचे यह हाल है,
तो गांवों में विकास का क्या हाल होगा?”**
अब गेंद प्रशासन के पाले में है—
या तो भ्रष्टाचार पर वार होगा,
या यह घटिया निर्माण पूरे सिस्टम पर एक काला धब्बा बनकर रह जाएगा।














