दिन-रात ट्रैक्टरों की परेड, STF ठप, राजस्व की खुली लूट—आखिर किसके संरक्षण में चल रहा यह गोरखधंधा?
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
सरकारी गठजोड़ की ‘रेत-राजनीति’
मनोहरपुर थाना क्षेत्र के अवैध तिरला बालू घाट पर आज जो हालत है, वह किसी ‘जंगलराज’ से कम नहीं दिखती।
दिन हो या रात—बस एक आवाज़ सुनाई देती है… ट्रैक्टर-ट्रॉली की गर्जना, जो सीधा मनोहरपुर बाजार की मुख्य सड़कों से होकर गुजरती है।
आम जनता मोबाइल निकालकर वीडियो बनाती है, फोटो खींचती है, सोशल मीडिया पर सवाल उठाती है, लेकिन प्रशासन की आंखों पर जैसे पर्दा पड़ा हुआ है।

खनन विभाग, मनोहरपुर अंचल कार्यालय, स्थानीय पुलिस, वन विभाग—सबके ऊपर संयुक्त STF है, लेकिन अवैध बालू तस्करी रोकने में यह सिस्टम पूरी तरह विफल साबित हो रहा है।
खुला सवाल: प्रशासन सो रहा है या ‘सुला दिया गया’ है?
लोग अब खुलकर पूछने लगे हैं:
- क्या प्रशासन को यह ट्रैक्टरों की लाइनें नहीं दिखती?
- क्या अधिकारी अंधे हैं या जानबूझकर नहीं देखना चाहते?
- यदि प्रशासन को यह तस्करी अदृश्य लगती है, तो क्या वे सार्वजनिक रूप से यह घोषणा करने की हिम्मत रखते हैं?
जनता कह रही है—
“अगर प्रशासन नहीं रोक सकता, तो साफ बोल दे—जनता पकड़कर देगी, प्रशासन बस कार्रवाई कर दे।”
गाँव से बाजार तक—रेत की खुली परेड
तिरला घाट से हर दिन दर्जनों ट्रैक्टर निकलते हैं।
मुख्य सड़क से होकर मनोहरपुर बाजार में प्रवेश करते हैं और फिर अलग-अलग स्थानों की ओर रवाना होते हैं।
यह सब खुलेआम, बिलकुल प्रशासन के नाक तले हो रहा है।
जिस रास्ते से विधायक और अधिकारी गुजरते हैं, उसी रास्ते से बालू लदा ट्रैक्टर भी गुजर रहा है।
ऐसे में सवाल उठना लाजमी है—
क्या यह प्रशासनिक नाकामी है या मिलीभगत?

STF बनी कागज़ी: केवल बैठकों में सक्रिय, जमीन पर गायब
सरकार ने जिला स्तर पर
उपायुक्त, पुलिस अधीक्षक, DFO, DMO के नेतृत्व में एक संयुक्त STF बनाई थी।
इसका उद्देश्य था:
- अवैध खनन रोकना
- घाटों की निगरानी
- ट्रैक्टर-ट्रॉली की चल रही लाइन पर अंकुश लगाना
लेकिन वास्तविकता यह है—
STF फाइलों तक सीमित हो चुकी है, और तस्कर खुले मैदान में लूट मचा रहे हैं।
माफियाओं का सिंडिकेट—‘सब सेट’ का खेल
स्थानीय सूत्र बताते हैं—
“बालू माफियाओं का पूरा सेटिंग तैयार है।”
उनका सबसे बड़ा डर होता है—
कि अगर किसी दिन ट्रैक्टर पकड़ा गया,
तो थाने में FIR दर्ज न हो जाए।
इसलिए वे पहले से ही ‘सेटिंग’ करके रखते हैं:
- पुलिस से संपर्क
- खनन विभाग से विशेष तालमेल
- फाइन लगवाकर वाहनों को बालू समेत छुड़वाना
- घाट पर चौकीदार की तरह लगाए गए दलाल
- रात के समय ‘सिग्नल सिस्टम’
यानी इस अवैध व्यापार को रोकने की कोशिश करने वाला हर विभाग पहले ही उनके पाले में खड़ा दिखाई देता है।
खनन विभाग की भूमिका पर गंभीर सवाल
खनन विभाग के कार्यालय से गहरा संबंध सिर्फ कागज़ी नहीं—बल्कि मैदान में भी सबसे मजबूत माना जाता है।
कई मामलों में देखा गया है कि:
- वाहन पकड़े गए
- अवैध बालू भी बरामद हुआ
- लेकिन थाने तक FIR नहीं पहुंचती
क्यों? क्योंकि खनन विभाग के ‘फाइन’ का खेल इतना मजबूत है कि—
बड़े माफिया तो छोड़िए, ट्रैक्टर भी मुस्कुराते हुए वापस चला जाता है।

सरकार को लग रहा करोड़ों का नुकसान
इस अवैध रेत तस्करी से—
- शासन
- राजस्व विभाग
- जिला प्रशासन
- और राज्य सरकार
सभी को प्रतिवर्ष लाखों–करोड़ों रुपए का सीधा नुकसान हो रहा है।
वैध घाटों से जो कर संग्रह होना चाहिए था, वह सब ‘काली कमाई’ में बदलकर
माफिया–अधिकारी–दलाल गठजोड़ की जेब में जा रहा है।
राजनीतिक संरक्षण—सबसे बड़ा सुरक्षा कवच
स्थानीय लोगों की मानें तो इस अवैध कारोबार के पीछे एक प्रभावशाली राजनेता का आशीर्वाद बताया जा रहा है।
उसका संपर्क सत्ता के गलियारों तक मजबूत है, जिसके चलते:
- पुलिस हाथ नहीं डालती
- खनन विभाग आंखें बंद कर लेता है
- वन विभाग औपचारिक नोटिस तक सीमित
- और जिला प्रशासन की बैठकों में सिर्फ ‘औपचारिकता’ निभाई जाती है
यह राजनीतिक संरक्षण ही वह कारण है, जिसके चलते अवैध तिरला घाट आज ‘बालू का सोना-खदान’ बन चुका है।
जनता नाराज़: “हम पकड़ेंगे, प्रशासन कार्रवाई करे”
क्षेत्र की जनता बेहद आक्रोशित है।
लोगों का कहना है—
“अगर सरकार रोक नहीं पा रही है, तो अनुमति दे दे—जनता खुद माफियाओं को पकड़कर सौंप देगी।”
यह बयान बताता है कि
प्रशासनिक विश्वास अब जमीन में समा चुका है।
दिन-रात चल रही तस्करी का वीडियो वायरल
सोशल मीडिया पर हर दिन दर्जनों वीडियो आ रहे हैं।
मनोहरपुर की मुख्य सड़क से:
- लंबी कतार में चलती ट्रैक्टर-ट्रॉलियां
- बिना नंबर प्लेट वाले वाहन
- लोडिंग पॉइंट से बाजार तक का रूट
- रात में हेडलाइट बंद करके चलने वाली गाड़ियां
- गांवों में कच्चे रास्तों से निकाली जा रही रेत
यह सब दिखाई देता है।
प्रशासन भी यही वीडियो देख रहा है—पर कार्रवाई शून्य।
स्थानीय व्यवसाय पर पड़ रहा असर
इस अवैध कारोबार के कारण:
- वैध बालू कारोबार खत्म हो रहा
- स्थानीय ट्रांसपोर्टर प्रभावित
- मजदूरों को उचित मजदूरी नहीं मिलती
- घाटों पर कानून-व्यवस्था बिगड़ती
- ग्रामीणों का रास्ता चौपट
- नदी के प्राकृतिक तट का विनाश जारी
नदी का किनारा कट रहा है, पर्यावरण को भारी खतरा है, लेकिन इन मुद्दों पर प्रशासन चुप है।
नदी भी कर रही ‘न्याय की गुहार’
तिरला घाट पर इतनी अंधाधुंध बालू निकाली जा रही है कि:
- नदी की गहराई असंतुलित
- जलधारा बदल रही
- वर्षा में बाढ़ का खतरा बढ़ रहा
- गांवों की सुरक्षा पर संकट
- मीठे पानी की परतें नष्ट
पर्यावरण विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं—
“नदी मर रही है, और प्रशासन सो रहा है।”
क्या सरकार जिम्मेदारों पर कार्रवाई करेगी?
अब सवाल यह है कि:
- क्या अवैध बालू माफियाओं पर FIR होगी?
- क्या पुलिस और खनन विभाग से जुड़े लापरवाह अधिकारियों पर जांच होगी?
- क्या STF का पुनर्गठन होकर नई टीम बनेगी?
- क्या राजनीतिक संरक्षण खत्म किया जाएगा?
अगर सरकार चुप रही, तो जनता इसे प्रशासन–माफिया–राजनेता गठजोड़ की सरकारी मुहर मानेगी।
अंतिम शब्द: अवैध तिरला घाट—कब तक चलेगा यह ‘खुला लूट बाजार’?
मनोहरपुर का तिरला घाट आज एक उदाहरण बन चुका है कि—
किस तरह सरकारी विभागों की मिलीभगत से अवैध खनन का विशाल साम्राज्य खड़ा हो सकता है।
दिन-रात ट्रैक्टरों की कतारें
रेत से भरे ट्रॉली
और प्रशासन की गोलमाल चुप्पी—
यह सब बताता है कि मनोहरपुर में
कानून से ज्यादा मजबूत है
‘सेटिंग सिस्टम’।
जब तक सरकार इस रेत माफिया पर नकेल नहीं कसती,
तब तक
राजस्व की लूट, नदी का विनाश
और भ्रष्टाचार की यह परंपरा
जारी रहेगी।















