रिपोर्ट: शैलेश सिंह
पश्चिम सिंहभूम अब मानव–वन्यजीव संघर्ष का क्षेत्र नहीं, बल्कि सरकारी उपेक्षा के कारण खुला कत्लगाह बनता जा रहा है। जिस हाथी ने पहले सोयां, कुलसुता जैसे गांवों में परिवार उजाड़े, उसी हिंसक हाथी ने अब जेटेया थाना क्षेत्र के बाबरिया गांव में खूनी तांडव मचाकर सारी हदें पार कर दी हैं।
6 जनवरी की रात बाबरिया गांव में एक साथ पांच ग्रामीणों को रौंदकर मौत के घाट उतार देना किसी दुर्घटना नहीं, बल्कि प्रशासनिक नाकामी का सीधा परिणाम है।

बाबरिया गांव: एक ही रात, पांच लाशें, पूरा गांव उजड़ा
जेटेया थाना क्षेत्र के बाबरिया गांव में 6 जनवरी की रात जो हुआ, वह दिल दहला देने वाला नरसंहार है।
एक हिंसक जंगली हाथी ने गांव में घुसकर दो परिवारों को पूरी तरह तबाह कर दिया।

बाबरिया गांव के मृतक
- सनातन मेराल
- जोंकों कुई (पत्नी)
- दो मासूम बच्चे
- मोगदा लागुरी (दूसरे परिवार से)
एक ही घर में माता–पिता और बच्चों की लाशें…
यह दृश्य केवल त्रासदी नहीं, बल्कि सिस्टम पर तमाचा है।
बड़ा पासीया और लांपाईसाई: मौत का सिलसिला थमा नहीं
हाथी का आतंक बाबरिया तक सीमित नहीं रहा।
- बड़ा पासीया गांव में एक ग्रामीण की हत्या
- लांपाईसाई गांव में भी एक ग्रामीण को रौंदकर मार डाला गया
इन दोनों गांवों में मृतकों की पहचान अब तक नहीं हो पाई है, लेकिन मौत का पैटर्न वही है—
रात, घर, नींद और अचानक मौत।

अब तक कितनी लाशें चाहिए?
सोयां गांव में पिता, बेटा, बेटी
कुलसुता में युवा ग्रामीण
बाबरिया में पांच ग्रामीण
बड़ा पासीया और लांपाईसाई में दो और मौतें
👉 10 दिनों में 20 से अधिक मौतें
फिर भी न कोई इमरजेंसी, न कोई ठोस कार्रवाई!

कोल्हान और सारंडा: डर के साये में कट रही हैं रातें
कोल्हान, सारंडा और आसपास के जंगल गांवों में हालात ऐसे हैं कि—
- लोग घर छोड़कर भागने को मजबूर हैं
- बुंडू जैसे गांवों के ग्रामीण
रात होते ही रोवाम समेत अन्य सुरक्षित गांवों में शरण ले रहे हैं - महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग खुले आसमान के नीचे ठंड में रात काट रहे हैं
यह पलायन नहीं, जिंदा रहने की मजबूरी है।

ठंड, अंधेरा और मौत का डर
ठंड के इस मौसम में हर रात एक ही सवाल घूम रहा है—
“आज किसके घर मौत आएगी?”
ग्रामीणों में मौत का स्थायी डर (मौत का खतरा) बन चुका है।
कोई खेत नहीं जा रहा,
कोई चैन से सो नहीं पा रहा,
हर आहट पर लोग कांप उठते हैं।

वन विभाग कहां है? क्यों नहीं मारा जा रहा यह हाथी?
ग्रामीणों का गुस्सा अब फूट पड़ा है।
उनका साफ कहना है—
“इतनी मौतों के बाद भी अगर यह हाथी नहीं मारा गया,
तो सैकड़ों लाशें पोस्टमार्टम हाउस के बाहर मिलेंगी।”
सवाल जो सरकार से पूछे जाने चाहिए
- क्या 20 से ज्यादा मौतें कम हैं?
- क्या आदिवासी जान की कोई कीमत नहीं?
- क्या यह हाथी संरक्षित है, इसलिए इंसान मारे जा रहे हैं?
- अलर्ट सिस्टम, ड्रोन, ट्रैकिंग कहां है?
मुआवजा नहीं, अब कार्रवाई चाहिए
अब ग्रामीणों को
- संवेदना नहीं चाहिए
- चेक नहीं चाहिए
- कागजी आश्वासन नहीं चाहिए
उनकी एक ही मांग है—

👉 “इस खूनी हाथी को तुरंत मारो”
ग्रामीण चेतावनी दे रहे हैं कि
अगर अब भी वन विभाग नहीं जागा,
तो मुआवजा देते–देते सरकारी खजाना खाली हो जाएगा,
लेकिन लाशें रुकेंगी नहीं।
यह मानव–वन्यजीव संघर्ष नहीं, यह सरकारी अपराध है
हाथी को बार-बार हिंसक होने दिया गया।
- न समय पर रेस्क्यू
- न जंगल से खदेड़ने की कोशिश
- न ग्रामीणों को सुरक्षित करने की योजना
यह सब मिलकर साबित करता है कि
👉 यह प्राकृतिक हादसा नहीं, बल्कि प्रशासनिक अपराध है।
वन विभाग की विफल रणनीति
- हाथी के मूवमेंट की कोई निगरानी नहीं
- गांवों में न सायरन, न माइकिंग
- नाइट पेट्रोलिंग पूरी तरह फेल
- हर मौत के बाद सिर्फ “जांच जारी है”
जांच कब खत्म होगी?
शायद तब, जब आखिरी गांव खाली हो जाएगा।
अगर अब भी नहीं चेती सरकार…
अगर सरकार और वन विभाग अब भी
“संरक्षण बनाम मानव जीवन” की बहस में उलझा रहा,
तो आने वाले दिनों में—
- पूरा सारंडा खाली होगा
- कोल्हान के जंगल गांव भूतिया बनेंगे
- और सरकार सिर्फ मुआवजा बांटती रह जाएगी
हाथी नहीं, सिस्टम खूनी है
आज पश्चिम सिंहभूम में
हाथी से ज्यादा खतरनाक सरकार की चुप्पी है।
हर लाश पूछ रही है—
“अगला नंबर किसका है?”
अब भी समय है।
अगर अब भी यह हिंसक हाथी नहीं रोका गया,
तो इतिहास लिखेगा—

“यह मौतें जंगल की नहीं,
सरकारी बेरुखी की देन थीं।”














