खनन विभाग–प्रशासन की मिलीभगत से गुमुरिया और मुंडुई घाटों से दिन-रात अवैध तस्करी जारी
रिपोर्ट—शैलेश सिंह
उच्च न्यायालय के आदेश की खुली धज्जियाँ
जगन्नाथपुर थाना अंतर्गत जैतगढ़ ओपी क्षेत्र के गुमुरिया और मुंडुई बालू घाट आज सरकारी सिस्टम की सबसे बड़ी नाकामी और खनन विभाग की सबसे शर्मनाक मिलीभगत के केंद्र बन चुके हैं।
उच्च न्यायालय बार-बार निर्देश देता रहा कि अवैध बालू का उठाव रोका जाए, लेकिन धरातल की हकीकत यह है—
अवैध कारोबार दिन-रात खुलेआम फल-फूल रहा है।
यह सिर्फ कानून का उल्लंघन नहीं—
यह शासन-प्रशासन की खुली विफलता और आम जनता के विश्वास पर करारा तमाचा है।

पेशा कानून को नजरअंदाज करने का बड़ा खेल
पेशा कानून के तहत जनजातीय क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार ग्राम सभा का होना चाहिए।
बालू घाटों का प्रबंधन और नीलामी ग्राम सभा की सहमति से होना चाहिए था।
लेकिन सरकार ने आज तक इस दिशा में एक भी कदम नहीं उठाया।
नतीजा?
- बालू माफिया सक्रिय
- सरकारी राजस्व का करोड़ों का नुकसान
- जनजातीय ग्राम सभाओं का अधिकार छीन लिया गया
- और प्रशासन की चुप्पी इस पूरे खेल को और संदिग्ध बनाती है
सरकार नहीं चाहती कि ग्राम सभा मजबूत हो,
माफिया नहीं चाहते कि नियंत्रण पहुंचे ग्रामीणों तक,
और अधिकारी चाहते हैं कि ‘मुनाफे का रास्ता’ खुला रहे।
गुमुरिया और मुंडुई घाट: दिन-रात लूट जारी
ट्रैक्टर, हाईवा, जेसीबी—अवैध तंत्र की पूरी फौज सक्रिय
जैतगढ़ ओपी के अंतर्गत आने वाले गुमुरिया और मुंडुई बालू घाटों से हर दिन दर्जनों ट्रैक्टर बालू उठाकर ले जाते हैं।
यह सब होता है—
- बिना चालान
- बिना परमिट
- बिना नीलामी
- और खनन विभाग के अधिकारियों की आंखों के सामने
इन दोनों घाटों पर अवैध खनन की गतिविधि इतनी तेज है कि रात होते ही सड़कें बालू लदे ट्रैक्टर और हाईवा से भर जाती हैं।
कई बार तो 50-60 ट्रैक्टरों का काफिला एक साथ निकलता दिख जाता है।

आसपास के गांवों में दर्जनों जगह बड़े पैमाने पर अवैध स्टॉकयार्ड बनाए गए हैं, जहाँ जेसीबी मशीन से हाईवा में बालू लोड कर दूर-दूर तक भेजा जाता है।
यह पूरा प्रबंधन इतना व्यवस्थित है कि कोई इसे देखकर गलत कहे, उससे पहले माफिया यह साबित कर देते हैं कि यह अवैध नहीं, बल्कि ‘सरकारी मौन स्वीकृति’ के तहत चल रही गतिविधि है।
दो महीने से तस्करी अपने चरम पर
स्थानीय सूत्र बताते हैं कि पिछले दो महीनों में बालू तस्करी ने रफ्तार तोड़ी है।
कारण साफ है—
- न नीलामी
- न प्रशासनिक जांच
- न खनन विभाग की कार्रवाई
- और नेताओं का ‘संरक्षण’
इन दो महीनों में करोड़ों का बालू घाट से निकल चुका है।
राजस्व—शून्य।
लाभ—माफिया और संरक्षण प्राप्त लोगों की जेब में।
राजनीतिक संरक्षण—तस्करी की असली वजह
सूत्र बताते हैं कि इस पूरे खेल में चार से पाँच बड़े और प्रभावशाली राजनीतिक चेहरे शामिल हैं।
यही लोग तय करते हैं—
- कौन ट्रैक्टर चलाएगा
- कौन स्टॉक रखेगा
- किस हाईवा को प्राथमिकता मिलेगी
- और कौन कितना पैसा देगा
इन नेताओं का संरक्षण इतना मजबूत है कि कोई अधिकारी इन बालू माफियाओं के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।
अगर कोई ईमानदार कर्मचारी कार्रवाई कर भी दे, तो अगले ही दिन उसका तबादला तय।
यह गठजोड़—
माफिया + राजनीति + अफसरशाही
मिलकर पूरे क्षेत्र को बालू माफियाओं का साम्राज्य बना चुका है।

ट्रैक्टर मालिकों से मासिक वसूली—पुख्ता वसूली तंत्र
प्रति ट्रैक्टर 15,000 रुपये ‘एकमुश्त टैक्स’!
अवैध बालू कारोबार में सक्रिय ट्रैक्टर मालिकों ने साफ बताया है कि उन्हें हर महीने 15,000 रुपये ‘माफिया टैक्स’ के रूप में देना पड़ता है।
यह टैक्स किसे दिया जाता है?
- माफियाओं को
- माफिया के पीछे खड़े राजनीतिक लोगों को
- और उस हिस्से को, जो प्रशासन की ‘खामोशी’ खरीदता है
हाईवा मालिकों से प्रति माह दोगुनी या तिगुनी रकम ली जाती है।
जो मालिक पैसा नहीं दे पाते—
उनके ट्रैक्टर जान-बूझकर पकड़वा दिए जाते हैं,
उन पर मामला दर्ज कराकर बाकियों को डराया जाता है।
यह वसूली अब संगठित अपराध की तरह चल रही है।
जेसीबी से कच्चे घाट की खुदाई—पर्यावरण को बड़ा नुकसान
बालू तस्करी सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं है—
यह नदी तंत्र और पर्यावरण पर घातक हमला है।
जेसीबी मशीन से नदी की धारा काटकर बालू निकाला जाता है।
नतीजा—
- नदी का रुख बदल रहा है
- कटाव बढ़ रहा है
- खेत बर्बाद हो रहे हैं
- जलस्तर घट रहा है
- पुल-पुलियों की नींव कमजोर हो रही है
- और मानसून में बाढ़ का खतरा कई गुना बढ़ चुका है
प्रशासन यह सब जानता है,
पर कार्रवाई?
शून्य।
रात में जैतगढ़ की सड़कें बनती हैं ‘बालू हाईवे’
रात 10 बजे के बाद जैतगढ़ से कराईकेला, जगन्नाथपुर, मनोहरपुर और आस-पास के इलाकों की सड़कें बालू लदे वाहनों की तेज रफ्तार की आवाज से गूंजने लगती हैं।
यह दृश्य किसी वैध परिवहन जैसा लगता है, लेकिन असल में यह—
अवैध बालू का रात्री राजमार्ग है।
जहाँ पुलिस को रात में पेट्रोलिंग करनी चाहिए,
वहीं सड़कें वाहनों की कतारों से भरी होती हैं और पुलिस चौकियां खामोश।
लोग कहते हैं कि चौकियों पर ‘बात हो चुकी होती है’, इसलिए वाहनों को रोका भी नहीं जाता।

खनन विभाग—सबसे बड़ा मौन सहयोगी
खनन विभाग की भूमिका सबसे अधिक संदिग्ध है।
क्योंकि—
- घाट की नीलामी रोककर माफियाओं का रास्ता खोला गया
- प्राथमिकी दर्ज नहीं होती
- ट्रैक्टर और हाईवा को छोड़ दिया जाता है
- अधिकारियों का मौके पर जाना ‘औपचारिकता’ भर है
जब खनन विभाग ही सुरक्षा कवच बन जाए,
तब बालू तस्करों को डर किस बात का?
राजस्व का करोड़ों का नुकसान—पर किसी को चिंता नहीं
गुमुरिया और मुंडुई घाट से रोजाना 10–12 लाख रुपये की बालू तस्करी होती है।
यह कोई अनुमान नहीं—
ट्रैक्टरों की संख्या, हाईवा के फेरों और बाजार भाव को देखकर यह स्पष्ट है।
अगर घाट की वैध नीलामी होती तो—
सरकार को हर साल 20–25 करोड़ रुपये का राजस्व मिलता।
पर अभी?
सारा पैसा सीधे माफियाओं की जेब में जा रहा है।
यह सरकारी खजाने की नहीं,
जनता की लूट है।
ग्रामीणों में बढ़ रहा आक्रोश—पर आवाज दबा दी जाती है
गांव के कई लोग इस अपराध के खिलाफ बोलना चाहते हैं,
पर उन्हें धमकाया जाता है—
“बालू घाट हमारा है, चुप रहो नहीं तो अंजाम खराब होगा।”
कुछ लोगों ने बताया कि माफिया के लोग घर जाकर धमकी देते हैं।
कुछ का कहना है कि प्रशासन भी अप्रत्यक्ष रूप से लोगों की आवाज दबाने में मदद करता है।
पर अब धैर्य टूट रहा है—
जनता समझ चुकी है कि यह अपराध उनके गाँव, नदी और आजीविका को तबाह कर देगा।
कई पंचायतों में बढ़े विवाद—ग्राम सभा को अधिकार न देना बड़ी साजिश
पेशा कानून स्पष्ट कहता है—
प्राकृतिक संसाधन ग्राम सभा के हैं।
लेकिन माफियाओं को फायदा पहुंचाने के लिए सरकार ने ग्राम सभा को अधिकार देने से इंकार कर दिया।
इससे—
- ग्राम सभा कमजोर हुई
- पंचायतों में विवाद बढ़े
- माफिया मजबूत हुए
- भ्रष्ट अधिकारियों को मौका मिला
- और पूरा प्रशासन मूक दर्शक बन गया
प्रशासन की चुप्पी सबसे बड़ा सवाल
सब जानते हैं—
- कौन माफिया है
- कौन संरक्षण दे रहा है
- कौन अधिकारी शामिल है
- पैसा कहाँ जाता है
- तस्करी कब होती है
फिर भी कार्रवाई शून्य।
यह चुप्पी संदेह पैदा करती है कि इस अवैध कारोबार में ऊपरी स्तर तक की मिलीभगत है।
अंतिम सवाल—क्या सरकार जनजातीय भूमि को माफियाओं के हवाले कर देगी?
आज सवाल सिर्फ बालू तस्करी का नहीं—
यह जनजातीय समाज के अधिकारों, पर्यावरण, और सरकारी राजस्व की लड़ाई है।
अगर सरकार ने—
- घाटों की नीलामी
- पेशा कानून का पालन
- खनन विभाग पर नियंत्रण
- माफियाओं पर कार्रवाई
नहीं किया,
तो आने वाले दिनों में गुमुरिया और मुंडुई घाट का हाल वही होगा जो प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में हो चुका है—
माफियाओं का राज, प्रशासन का मौन, और जनता की बर्बादी।
जैतगढ़ के बालू घाटों को बचाना अब जरूरी नहीं—जरूरी है माफियाओं से मुक्त कराना
यह समय है कि—
- जिले का प्रशासन जागे
- पुलिस कार्रवाई करे
- खनन विभाग पर नकेल कसे
- और ग्राम सभा को उसका अधिकार वापस मिले
वरना गुमुरिया और मुंडुई घाट आने वाले वर्षों में पर्यावरण और कानून व्यवस्था दोनों के लिए खतरा बन जाएंगे।















