“हम 10,000 रुपये महीना देते हैं… हमें कौन रोकेगा?
रिपोर्ट शैलेश सिंह।
मनोहरपुर में अवैध बालू तस्करी पर प्रशासन की खामोशी इतनी गहरी है कि दूसरे दिन भी वही नज़ारा देखने को मिला। तिरला घाट से ट्रैक्टरों की कतारें पहले की तरह धड़ल्ले से निकलीं—न कोई चेकिंग, न रोक-टोक, न किसी अधिकारी की मौजूदगी।
लेकिन असली झटका तब लगा, जब कुछ बालू माफियाओं ने खुलेआम कहा—
“जब एक पुलिस पदाधिकारी को हर ट्रैक्टर से प्रति महीना 10,000 रुपये पहुंच रहा है…
तो फिर हमें कौन रोक सकता है?
सैयां भए कोतवाल—तो डर काहे का!”

यह बयान न सिर्फ प्रशासन की कार्यशैली पर करारा तमाचा है, बल्कि यह भी साबित करता है कि मनोहरपुर में अब कानून नहीं, रिश्वत का रेट कार्ड चलता है।
और जिस पुलिस पदाधिकारी पर जनता की सुरक्षा का जिम्मा है… वही कथित रूप से इस पूरे गोरखधंधे का महीनावार लाभार्थी बन चुका है।
“हम पैसा देते हैं—इसलिए हम राजा हैं।” माफियाओं की यह भाषा बताती है कि…
- कानून उनके लिए मज़ाक बन चुका है
- पुलिस के कुछ भ्रष्ट चेहरों से उन्हें सुरक्षा कवच मिला है
- प्रशासन की पूरी प्रणाली ‘मंथली सेटिंग’ पर चल रही है
- STF, DMO, CO—सबकी नाक के नीचे यह तस्करी अब ‘वैध’ जैसा व्यवहार पा चुकी है
माफियाओं की चुनौतीपूर्ण भाषा सुनकर साफ लगता है—
यह सिर्फ अवैध खनन नहीं, बल्कि प्रशासनिक संरचना की नंगी लूट का नमूना है।

“सैयां भए कोतवाल”—अब जनता का सवाल: फिर किससे उम्मीद करें?
माफिया खुलेआम कहते फिर रहे हैं कि—
“हमने सब सेट कर रखा है, ऊपर तक पैसा जाता है, कोई हमें छू भी नहीं सकता।”
जब अपराधी बिना डर के यह स्वीकार करें कि पुलिस की जेब भरकर वे सड़क पर ‘दबंगई’ करते हैं,
तो यह केवल भ्रष्टाचार नहीं—
पूरे सिस्टम की आत्महत्या है।

अगर पुलिस ही संरक्षण दे, तो माफिया क्यों रुकेंगे?
यह स्थिति बताती है कि:
- पुलिस का एक हिस्सा माफिया का ‘अकाउंट ऑफिस’ बन चुका है
- प्रशासन की चुप्पी संकेत देती है कि मामला काफी ऊपर तक पहुंचा है
- और जनता आज भी केवल वीडियो बना रही है—क्योंकि कार्रवाई की उम्मीद खत्म हो चुकी है
इसी कारण तिरला घाट की तस्करी सिर्फ धंधा नहीं, बल्कि
‘सरकारी धंधा + माफिया भागीदारी’ जैसा मॉडल बन चुका है।

अंतिम वार
जब माफिया खुद सार्वजनिक रूप से यह कहें कि
“हम महीने का पैसा दे देते हैं… हमें कोई नहीं छूएगा”,
तो इसका अर्थ साफ है—
मनोहरपुर की प्रशासनिक मशीनरी को बालू माफिया ने
भाड़े पर ले लिया है।
और जब
“सैयां भए कोतवाल”,
तो वाकई—
“डर काहे का”
—यह बात आज तिरला घाट की हर सड़क पर सच साबित हो रही है।















