समाजसेवी संतोष पंडा ने कलेईता गांव के बच्चों संग खेली अनोखी होली, जंगल में गूंजी मासूमों की हंसी
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
एशिया के सबसे बड़े साल वन क्षेत्र सारंडा की दुर्गम पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच इस बार होली का रंग कुछ अलग ही दिखाई दिया। जहां एक ओर शहरों में होली डीजे और आधुनिक रंगों के साथ मनाई जा रही थी, वहीं सारंडा के बीहड़ों में मानवता, स्नेह और अपनापन का अनोखा रंग बिखेरते नजर आए समाजसेवी संतोष पंडा।

हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी उन्होंने सारंडा वन प्रमंडल के दूरस्थ कलेईता गांव पहुंचकर वहां चल रहे सारंडा शिशु विकास स्कूल के नन्हे–मुन्ने बच्चों के साथ होली खेली और उन्हें रंग, अबीर और खुशियों से सराबोर कर दिया। जंगल की नीरवता के बीच बच्चों की खिलखिलाहट और रंगों की बौछार ने पूरे इलाके को उत्सव में बदल दिया।
रंग, अबीर और पिचकारी के साथ पहुंचे पंडा
होली के अवसर पर समाजसेवी संतोष पंडा अपने साथ रंग, अबीर, पिचकारी, गुब्बारे और अन्य होली सामग्री लेकर कलेईता गांव पहुंचे। जैसे ही गांव के बच्चों को उनके आने की खबर मिली, वे घरों से दौड़ते हुए होली खेलने के स्थान पर पहुंचने लगे।
बच्चों के मुंह से एक ही आवाज गूंज रही थी—
“पंडा भैया आ गए… जल्दी चलो, होली खेलना है।”
कुछ ही देर में जंगल के बीच बना छोटा सा मैदान रंगों से भर गया। बच्चों ने एक-दूसरे पर रंग लगाया, पिचकारी चलाई और हंसी-ठिठोली के बीच होली का असली आनंद लिया।

बच्चों की खुशी देख खिल उठे चेहरे
सारंडा जैसे दुर्गम क्षेत्र में रहने वाले इन बच्चों के लिए यह दिन किसी त्योहार से कम नहीं था। जिन बच्चों के पास सामान्य दिनों में खेलने के साधन भी कम होते हैं, उनके लिए रंग, पिचकारी और अबीर किसी बड़े उपहार से कम नहीं थे।
बच्चों के चेहरे पर रंग लगते ही उनकी मुस्कान और भी खिल उठी। छोटे-छोटे हाथों से वे संतोष पंडा को भी रंग लगाने लगे और पूरे माहौल में अपनापन और प्रेम की भावना फैल गई।
ग्रामीणों का कहना था कि इस तरह के आयोजन से बच्चों में उत्साह और आत्मविश्वास दोनों बढ़ता है।
मिट्टी और राख से होली खेलते बच्चों ने बदली सोच
समाजसेवी संतोष पंडा ने बताया कि कई वर्ष पहले जब वे कलेईता गांव पहुंचे थे, तब उन्होंने बच्चों को मिट्टी और चूल्हे की राख से होली खेलते देखा था।
उन्होंने बच्चों से पूछा कि वे रंगों की जगह मिट्टी से होली क्यों खेल रहे हैं। तब बच्चों ने मासूमियत से जवाब दिया—
“हमारे पास रंग नहीं है, इसलिए हम मिट्टी से ही होली खेल रहे हैं।”
बच्चों का यह जवाब सुनकर पंडा भावुक हो गए। उसी दिन उन्होंने संकल्प लिया कि हर वर्ष होली के अवसर पर वे इन बच्चों के बीच आएंगे और उनके लिए रंग व खुशियां लेकर पहुंचेंगे।
तब से लेकर आज तक यह परंपरा लगातार जारी है।

होली सिर्फ त्योहार नहीं, मुस्कान का उत्सव
संतोष पंडा का कहना है कि उनके लिए होली केवल रंगों का त्योहार नहीं बल्कि बच्चों की मुस्कान का उत्सव है।
उन्होंने कहा—
“सारंडा के ये बच्चे मेरे लिए देवतुल्य हैं। इनके साथ होली खेलना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। ऊपरवाला मुझे हर साल इन मासूमों के बीच आने और इनके चेहरों पर मुस्कान लाने की शक्ति देता रहे, यही मेरी प्रार्थना है।”
उन्होंने यह भी कहा कि समाज के सक्षम लोगों को ऐसे दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों के लिए आगे आना चाहिए, ताकि उन्हें भी त्योहारों की खुशियों का अनुभव हो सके।
ग्रामीण भी हुए भावुक
कलेईता गांव के ग्रामीणों ने बताया कि सारंडा जैसे दुर्गम क्षेत्र में त्योहारों का उल्लास अक्सर सीमित संसाधनों के कारण फीका पड़ जाता है। लेकिन जब कोई व्यक्ति अपने स्तर पर बच्चों के लिए खुशियां लेकर आता है, तो पूरा गांव उत्साहित हो उठता है।
ग्रामीणों का कहना था कि संतोष पंडा पिछले कई वर्षों से इस परंपरा को निभा रहे हैं और हर साल बच्चे उनके आने का बेसब्री से इंतजार करते हैं।
जंगल में गूंजती रही बच्चों की हंसी
घने जंगलों के बीच जब रंग उड़ रहे थे और बच्चों की हंसी गूंज रही थी, तब ऐसा लग रहा था मानो पूरा सारंडा खुशियों से महक उठा हो। छोटे-छोटे हाथों में पिचकारी और चेहरे पर रंग लिए बच्चे खुशी से झूम रहे थे।
यह दृश्य इस बात का प्रमाण था कि सच्चे मायनों में त्योहार वही है, जो लोगों के जीवन में खुशियां और मुस्कान लेकर आए।
मानवता की मिसाल बनती पहल
संतोष पंडा की यह पहल समाज के लिए एक प्रेरणा है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि त्योहार केवल अपने परिवार या दोस्तों के साथ मनाने के लिए नहीं होते, बल्कि उन लोगों के बीच खुशियां बांटने के लिए भी होते हैं जिनके जीवन में इन खुशियों की कमी है।
सारंडा के कलेईता गांव में खेली गई यह होली सिर्फ रंगों का उत्सव नहीं थी, बल्कि मानवता, संवेदना और सामाजिक जिम्मेदारी की मिसाल भी बन गई।












