धार्मिक परंपरा, कीर्तन, अरदास और लंगर के साथ गूंजा डेरा परिसर
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
2 मार्च को होलिका दहन के पावन अवसर पर चर्च रोड, किरीबुरू स्थित प्रतिमा सिंह एवं संतोष सिंह के आवास परिसर में बाबा बड़भाग सिंह का ऐतिहासिक होला मोहल्ला (होली मेला) श्रद्धा और उल्लास के साथ आयोजित किया गया। इस अवसर पर सिख धर्म की परंपराओं के अनुसार गुरुवाणी पाठ, अरदास, कीर्तन और सामूहिक लंगर का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए।
कार्यक्रम की शुरुआत सिख धर्म गुरु द्वारा पवित्र पाठ और अरदास से हुई। वातावरण “वाहेगुरु” के जयकारों से गुंजायमान हो उठा। इसके बाद महिलाओं द्वारा सांस्कृतिक कीर्तन और भक्ति नृत्य प्रस्तुत किया गया, जिसने पूरे आयोजन को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। श्रद्धालुओं ने एक-एक कर बाबा बड़भाग सिंह की तस्वीर के समक्ष नतमस्तक होकर आशीर्वाद प्राप्त किया और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।

बाबा बड़भाग सिंह की ऐतिहासिक और धार्मिक पृष्ठभूमि
बाबा बड़भाग सिंह सिख इतिहास के एक महान संत और तपस्वी माने जाते हैं, जिन्हें चमत्कारी साधना और मानव सेवा के लिए जाना जाता है। उनका जन्म पंजाब क्षेत्र में हुआ और उन्होंने अपना जीवन समाज के कमजोर वर्गों की सेवा, भक्ति और मानवता के प्रचार में समर्पित किया। मान्यता है कि उन्होंने अनेक रोगों से पीड़ित लोगों को आध्यात्मिक शक्ति और आशीर्वाद से राहत प्रदान की।
सिख परंपरा में बाबा बड़भाग सिंह को ऐसे संत के रूप में स्मरण किया जाता है, जिन्होंने जाति, धर्म और भेदभाव से ऊपर उठकर मानवता को सर्वोपरि माना। होला मोहल्ला उनके स्मरण में आयोजित किया जाने वाला धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव है, जो वीरता, भक्ति और सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व केवल रंगों का नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धता और सेवा भावना का संदेश देता है।

श्रद्धा और रंगों का संगम
अरदास और कीर्तन के उपरांत महिलाओं और पुरुषों ने परंपरागत तरीके से रंग और गुलाल खेलकर होला मोहल्ला उत्सव मनाया। यहां रंग केवल उत्सव का प्रतीक नहीं, बल्कि आपसी प्रेम, भाईचारे और सौहार्द का संदेश लेकर आए। बच्चे, बुजुर्ग और युवा सभी ने इस पर्व में बढ़-चढ़कर भाग लिया।
श्रद्धालुओं का कहना था कि बाबा बड़भाग सिंह के होला मोहल्ला में भाग लेने से मन को शांति और आत्मिक संतोष मिलता है। यह आयोजन समाज को जोड़ने और आपसी मतभेद मिटाने का कार्य करता है।

सर्वधर्म समभाव का प्रतीक बना लंगर
कार्यक्रम के अंत में भव्य लंगर का आयोजन किया गया, जिसमें सभी वर्गों और समुदायों के लोगों ने पंक्ति में बैठकर प्रसाद ग्रहण किया। सिख परंपरा के अनुसार लंगर समानता और सेवा का प्रतीक है, जहां अमीर-गरीब, जाति-धर्म का कोई भेद नहीं होता।
लंगर में महिलाओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली। उन्होंने स्वयं सेवा करते हुए श्रद्धालुओं को भोजन परोसा। यह दृश्य सिख धर्म के मूल सिद्धांत “सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है” को साकार करता नजर आया।

आस्था और संस्कृति का उत्सव
किरीबुरू में आयोजित यह होला मोहल्ला कार्यक्रम केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का उत्सव बन गया। बाबा बड़भाग सिंह की ऐतिहासिक परंपरा को जीवंत रखते हुए श्रद्धालुओं ने यह संदेश दिया कि धर्म का मूल उद्देश्य मानवता की सेवा और आपसी भाईचारा है।
इस आयोजन ने एक बार फिर साबित किया कि बाबा बड़भाग सिंह की शिक्षाएं आज भी लोगों के जीवन में आस्था, शांति और सद्भाव का प्रकाश फैलाने का कार्य कर रही हैं।














