दक्षिण भारत की मंदिर शैली में सजेगा पंडाल, सारडा परिवार की परंपरा और समाज को जोड़ने की अनूठी पहल
रिपोर्ट – शैलेश सिंह
झारखंड का लौहांचल क्षेत्र हमेशा से अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर के लिए प्रसिद्ध रहा है। खासकर बड़ाजामदा की दुर्गा पूजा की भव्यता की चर्चा केवल कोल्हान ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश में होती है। इस वर्ष भी श्री श्री सार्वजनिक दुर्गा पूजा कमिटी, फुटबॉल मैदान बड़ाजामदा में एक अद्वितीय और भव्य पंडाल का निर्माण किया जा रहा है, जो दक्षिण भारत की प्राचीन मंदिर शैली पर आधारित होगा।

परंपरा और आधुनिकता का संगम
यह दुर्गा पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं है, बल्कि समाज को एक सूत्र में पिरोने का उत्सव है। पूजा की तैयारियों में पूरी कमिटी के सदस्य तन-मन से जुटे हुए हैं। संरक्षक संजय कुमार सारडा के मार्गदर्शन और अध्यक्ष राजेश सिंह सहित पदाधिकारियों – उपाध्यक्ष संतोष प्रसाद (डेबरा), रमेश पांडेया, अशोक सिन्हा, महेश सिंह, विवेक पाहुजा, पुलक भट्टाचार्या, अमित शर्मा, सौरव बोस, कौशल सिन्हा, रोहन दत्ता, मोनू साव, बबलू चौधरी, प्रेम शंकर यादव, अभिषेक सिन्हा, राज गुप्ता, हिमांशु गुलेरिया (बंबी सिंह), अंकित पोद्दार – की सक्रियता से तैयारी युद्धस्तर पर चल रही है।
पूजा स्थल को झूलों और विभिन्न आकर्षक दुकानों से सुसज्जित किया जा रहा है, ताकि यह न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र बने बल्कि सांस्कृतिक मेल-मिलाप और पारिवारिक आनंद का भी मंच तैयार हो सके।

सारडा परिवार का योगदान
बड़ाजामदा की दुर्गा पूजा को लेकर सारडा परिवार का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इस परिवार ने दशकों से न केवल पूजा आयोजन में सक्रिय भूमिका निभाई है बल्कि समाज को एकजुट करने और सांस्कृतिक परंपराओं को संरक्षित करने का कार्य भी किया है। संजय सारडा और उनका परिवार हर वर्ष पूजा पंडाल में उपस्थित रहकर कमिटी के साथ पूरे आयोजन को सफल बनाते हैं। समाज के विभिन्न वर्गों को एक मंच पर लाना और उन्हें सहभागिता का अवसर देना सारडा परिवार की इस पूजा की सबसे बड़ी विशेषता है।
धार्मिक अनुष्ठानों की श्रृंखला
पूजा कार्यक्रमों की शुरुआत पंचमी (27 सितम्बर) को मां एर बोधन से होगी। यह अनुष्ठान देवी के आह्वान का प्रतीक है, जो वातावरण में पवित्रता और श्रद्धा का संचार करता है।
षष्ठी (28 सितम्बर) को शाम 6 बजे से षष्ठी पूजा आरंभ होगी। इसके अगले दिन सप्तमी (29 सितम्बर) की सुबह 5 बजे बोकना कारो नदी से 108 कन्याओं द्वारा कलश शोभा यात्रा निकाली जाएगी। यह दृश्य न केवल धार्मिक महत्व का होगा बल्कि सामाजिक एकजुटता का भी संदेश देगा। पुलक भट्टाचार्य और अमित शर्मा इस शोभायात्रा का संचालन करेंगे।
सप्तमी के दिन सुबह 8 बजे पूजा, 10:30 बजे पुष्पांजलि और शाम 7:30 बजे संध्या आरती होगी।
अष्टमी (30 सितम्बर) को महा संधि पूजा विशेष आकर्षण का केंद्र होगी, जो दोपहर 1:20 बजे से 2:08 बजे तक चलेगी। इस दौरान दीप और बलिदान की परंपरा भी निभाई जाएगी।
नवमी (1 अक्टूबर) को सुबह 6 बजे पूजा, 10:30 बजे से 12:30 बजे तक हवन और संध्या आरती आयोजित होगी। इसके बाद 2 अक्टूबर को दशमी के दिन दर्पण विसर्जन, अपराजिता पूजा और कलश विसर्जन के साथ शाम को रावण दहन का भव्य आयोजन किया जाएगा।
इसके बाद 3 अक्टूबर को माता रानी का जागरण (टी सीरीज के कलाकारों द्वारा) और 4 अक्टूबर को सिन्दूर खेला के साथ प्रतिमा विसर्जन का कार्यक्रम होगा।
सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व
दुर्गा पूजा केवल देवी की आराधना का पर्व नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना का प्रतीक है। बड़ाजामदा का यह आयोजन लोगों को एकजुट करता है, आपसी भाईचारे और सौहार्द को बढ़ाता है। हर वर्ग और हर समुदाय के लोग इसमें शामिल होते हैं। यह विविधता में एकता का जीवंत उदाहरण है।
पूजा पंडाल को देखने के लिए न केवल स्थानीय लोग बल्कि आसपास के इलाकों से भी हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। बच्चों के लिए झूले, महिलाओं के लिए पारंपरिक खरीदारी और युवाओं के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रम इस आयोजन को बहुआयामी बना देते हैं।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण
भारतीय समाज में दुर्गा पूजा का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। देवी दुर्गा को शक्ति और असुरों पर विजय की प्रतीक माना जाता है। बंगाल और झारखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों में दुर्गा पूजा का आयोजन सामाजिक चेतना का हिस्सा रहा है। बड़ाजामदा का यह आयोजन उस परंपरा को आगे बढ़ाने के साथ-साथ आधुनिक स्वरूप भी प्रदान करता है।
विशेष रूप से दक्षिण भारतीय मंदिर शैली का पंडाल इस वर्ष आकर्षण का केंद्र होगा। यह न केवल वास्तुकला का उदाहरण बनेगा बल्कि सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करने का संदेश भी देगा।
भविष्य की दिशा
ऐसे आयोजनों से न केवल धार्मिक आस्था प्रगाढ़ होती है बल्कि समाज में सहयोग और सामूहिकता की भावना भी विकसित होती है। सारडा परिवार और कमिटी के अथक प्रयास से बड़ाजामदा की दुर्गा पूजा एक पहचान बना चुकी है। आने वाले वर्षों में यह आयोजन और अधिक भव्य और ऐतिहासिक रूप लेगा, ऐसा विश्वास स्थानीय लोगों ने जताया है।














