जनजातीय क्षेत्र के सपनों के साथ किया गया सबसे बड़ा विश्वासघात
रिपोर्ट — शैलेश सिंह
18 करोड़ की लागत… पर शिक्षा को मिली सिर्फ उपेक्षा
जनजातीय बहुल मनोहरपुर प्रखंड में कोल्हान यूनिवर्सिटी के अंतर्गत स्थापित डिग्री कॉलेज कभी इलाके की शैक्षणिक उम्मीदों का सबसे बड़ा केंद्र माना गया था। लगभग 18 करोड़ की लागत से बना यह विशालकाय कैंपस आज केवल सरकारी लापरवाही और राजनीतिक उदासीनता का जीता-जागता उदाहरण बन चुका है।

जहाँ इस कॉलेज से जनजातीय युवाओं के भविष्य को नई दिशा देने की उम्मीद थी, वहीं आज यह इमारत केवल शोभा की वस्तु बनकर रह गई है। पढ़ाई कम, पुलिस जवानों का अस्थायी ठिकाना ज्यादा। इतने बड़े निवेश के बाद भी शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ टूटी हुई है—और प्रशासन के पास न संवेदना है, न जवाबदेही।
कागज पर कॉलेज, ज़मीन पर सन्नाटा
करोड़ों का भवन, पर कमरों में जाले और सूना पड़ा कैंपस
हर कमरे का ताला, हर पोर्टिको में सन्नाटा और कैंपस में जड़े झाड़–झंखाड़ यह बताते हैं कि सरकार ने मनोहरपुर के बच्चों के भविष्य को किस कदर ठुकरा दिया है। जहाँ विद्यार्थियों की भीड़ होनी चाहिए थी, वहां दिनभर धूल उड़ती रहती है।
कॉलेज का मुख्य भवन किसी सरकारी ‘मॉडल प्रोजेक्ट’ की तरह दिखता तो जरूर है, पर असलियत यह है कि यह कॉलेज अपने मूल उद्देश्य से पूरी तरह भटक चुका है।
पुलिस जवानों का ठिकाना बन चुका ‘डिग्री कॉलेज’
शिक्षा के नाम पर स्वीकृत इस भवन में आज विद्यार्थियों की जगह पुलिस जवानों का बसेरा है।
सरकार की विडंबना देखिए—
- जिसे शिक्षा केंद्र होना था,
- जिसे पुस्तकालयों और लैब से गूंजना था,
वही कॉलेज अब सिर्फ रात्रि विश्राम और सुरक्षा बलों की आवाजाही का केंद्र बनकर रह गया है।
क्या यही है सरकार का ‘उच्च शिक्षा’ मॉडल? क्या करोड़ों रुपये सिर्फ इसलिए खर्च किए गए थे कि कॉलेज में पढ़ाई की जगह बैरक बन जाए?
विद्यार्थियों की संख्या में भयावह गिरावट
285 से 63 – यह आंकड़े नहीं, जनजातीय भविष्य का पतन है
सूचना का अधिकार (RTI) से प्राप्त आंकड़े किसी भी जिम्मेदार सरकार को हिला देने के लिए पर्याप्त हैं—पर अफसोस, मनोहरपुर के जनप्रतिनिधियों पर इसका कोई असर नहीं।
- 2023 में पंजीकृत विद्यार्थी — 285
- 2024 में घटकर — 170
- 2025 में मात्र — 63 विद्यार्थी!
यह सिर्फ कॉलेज की गिरती हालत नहीं, पूरे क्षेत्र की शैक्षणिक आत्महत्या है।
सरकार का दावा है कि वह जनजातीय बच्चों को तकनीकी और उच्च शिक्षा से जोड़ रही है, पर मनोहरपुर कॉलेज के आंकड़े साबित करते हैं कि सरकार की मंशा कागज़ों पर है—जमीनी हकीकत में नहीं।

16 स्वीकृत पद, पर शिक्षक सिर्फ 1!
इतिहास का एक शिक्षक… और यही पूरी ‘फैकल्टी’ है!
मनोहरपुर डिग्री कॉलेज का शैक्षणिक ढांचा इतना भयावह है कि इसे ‘कॉलेज’ कहना भी शिक्षा के साथ धोखा है।
स्वीकृत पद – 16
स्थापित किए गए शिक्षक – 1 (इतिहास)
निद-बेस्ड अस्थायी शिक्षक – 3 (इतिहास, हिंदी, भूगोल)
बाकी 12 पद—
- लोक प्रशासन
- रसायन शास्त्र
- भौतिकी
- वनस्पति विज्ञान
- प्राणी विज्ञान
… सभी पूरी तरह खाली!
जब कॉलेज में शिक्षक ही नहीं होंगे, तो विद्यार्थी आएँगे किस उम्मीद से? क्या मनोहरपुर के बच्चों का भविष्य सिर्फ एक ‘इतिहास के प्रवक्ता’ पर छोड़ दिया गया है?
विधायक और सांसद की बेरुखी: दौरा तक नहीं, चिंता की बात तो दूर
यह दुखद है कि मनोहरपुर के स्थानीय विधायक और सांसद दोनों ही इस कॉलेज की स्थिति पर कभी गंभीर नहीं रहे।
जनता से वोट मांगने आते हैं,
पर कॉलेज की इस दयनीय हालत को देखने एक बार भी दौरा नहीं करते।
ऐसा लगता है कि नेताओं का ध्यान उन क्षेत्रों पर ही रहता है जहाँ कैमरे हों, भीड़ हो, मंच हो, और तालियाँ हों।
जहाँ शिक्षा की बात होती है, वहाँ नेताओं की व्यस्तता अचानक बढ़ जाती है।
कोल्हान यूनिवर्सिटी की भूमिका संदिग्ध
यूनिवर्सिटी प्रशासन लगातार इस कॉलेज की उपेक्षा कर रहा है।
ना नियमित निरीक्षण,
ना शिक्षक नियुक्ति की पहल,
ना लैब–लाइब्रेरी की व्यवस्था,
ना अकादमिक कैलेंडर का पालन।
यूनिवर्सिटी के लिए मनोहरपुर कॉलेज सिर्फ एक फाइल का नंबर है—न कोई प्राथमिकता, न कोई संवेदना।
18 करोड़ का दुरुपयोग या सुनियोजित लूट?
कॉलेज बना, पर पढ़ाई नहीं—यह भ्रष्टाचार का मजबूत संकेत
एक सच्चाई यह भी है कि इस क्षेत्र में बुनियादी ढांचे के नाम पर करोड़ों के ‘प्रोजेक्ट’ इसलिए बनते हैं क्योंकि उनमें खर्च का हिसाब आसानी से छिपाया जा सकता है।
लेकिन मनोहरपुर कॉलेज का मामला इससे भी ज्यादा गंभीर है—
यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं,
यह एक पूरी पीढ़ी के भविष्य की हत्या है।
एक साल में 285 से 63 पर आ जाना बताता है कि स्कूल से निकलने वाले बच्चे भी अब उच्च शिक्षा से दूरी बना रहे हैं।
क्या यही था कॉलेज खोलने का उद्देश्य?

जनजातीय छात्रों से सबसे बड़ा धोखा
दूर–दराज गांवों के बच्चे कॉलेज तक आते हैं… और लौट जाते हैं मायूस
मनोहरपुर क्षेत्र पहाड़ी, जंगलों और आदिवासी बस्तियों से घिरा है।
यहां के बच्चे कठिन परिस्थितियों में पढ़ाई की कोशिश करते हैं।
लेकिन जब वे कॉलेज पहुंचते हैं, तो पाते हैं—
- ना कक्षाएं
- ना शिक्षक
- ना प्रयोगशाला
- ना पुस्तकालय
- ना छात्रावास
- ना भविष्य
जनजातीय बच्चों के सपने जिस सिस्टम पर भरोसा करके कॉलेज आते हैं, वही सिस्टम उनके सपनों को तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा।
स्थानीय संगठनों की नाराज़गी – अब धैर्य जवाब दे रहा है
भारत आदिवासी पार्टी के पश्चिम सिंहभूम जिलाध्यक्ष सुशील बारला ने वर्तमान स्थिति पर कड़ा आक्रोश व्यक्त किया है।
उन्होंने महामहिम राज्यपाल और कोल्हान यूनिवर्सिटी प्रशासन से मांग की है कि—
- तुरंत स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति हो
- खाली 12 पदों को भरा जाए
- कॉलेज परिसर को पुलिस ठिकाना बनने से रोका जाए
- नियमित कक्षाओं की गारंटी दी जाए
- जनजातीय क्षेत्र के लिए विशेष शैक्षणिक पैकेज लागू किया जाए
बारला का कहना है कि सरकार की निष्क्रियता अब जनजातीय युवाओं के हितों पर सीधा हमला है, और इसे अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
सवाल बहुत हैं—पर जवाब देने वाला कोई नहीं
- 18 करोड़ का कॉलेज बनाया किसके लिए गया?
- शिक्षकों के पद वर्षों से क्यों खाली पड़े हैं?
- विधायक–सांसद कॉलेज का दौरा क्यों नहीं करते?
- पुलिस जवानों को कैंपस में रहने की अनुमति किसने दी?
- यूनिवर्सिटी प्रशासन मनोहरपुर को क्यों भुला चुका है?
इन सवालों का जवाब न सरकार देती है, न यूनिवर्सिटी, न जनप्रतिनिधि।
पर सबसे बड़ी चोट उन बच्चों को लगती है जिनके पास विकल्प ही नहीं।
यह सिर्फ कॉलेज नहीं, भविष्य उजाड़ने की सरकारी मशीनरी है
मनोहरपुर डिग्री कॉलेज की वर्तमान स्थिति सरकार के उस असली चेहरे को उजागर करती है, जहाँ जनजातीय क्षेत्र सिर्फ योजनाओं में दिखाए जाते हैं, पर जमीनी काम कहीं नहीं।
यह कॉलेज सरकारी उदासीनता के कारण ‘शिक्षा केंद्र’ नहीं बल्कि उपेक्षा स्मारक बन चुका है।
सरकार, यूनिवर्सिटी और जनप्रतिनिधियों की अगर थोड़ी भी जवाबदेही होती, तो कॉलेज इस स्थिति में नहीं पहुँचता।
अंतिम मांग
मनोहरपुर डिग्री कॉलेज को बचाना केवल एक शैक्षणिक मुद्दा नहीं—
यह आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बचाने की लड़ाई है।
सरकार तत्काल कार्रवाई करे—
- शिक्षक नियुक्ति
- मूलभूत सुविधाएँ
- नियमित कक्षाएँ
- प्रशासनिक निगरानी
- जनजातीय क्षेत्र के लिए विशेष फंड
अन्यथा यह 18 करोड़ का भवन आने वाले वर्षों में सिर्फ एक खंडहर बनकर रह जाएगा—
और मनोहरपुर की युवा पीढ़ी हमेशा पूछती रह जाएगी—
“हमारा भविष्य किसने छीना?”












