रिपोर्ट: शैलेश सिंह
कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (CSR) का दम भरने वाली टाटा स्टील की हकीकत अब खुलकर सामने आ गई है। 1 अप्रैल से स्कूल बस सेवा बंद करते ही बराईबुरु, टाटीबा सहित आसपास के गांवों के दर्जनों बच्चों की शिक्षा पूरी तरह से ठप हो गई है। सवाल उठने लगा है—क्या CSR सिर्फ मुनाफे तक सीमित है?

खदान बंद, तो बच्चों की पढ़ाई भी बंद!
ग्रामीणों के अनुसार, जब टाटा स्टील की विजय-2 खदान चालू थी, तब कंपनी प्रबंधन द्वारा CSR योजना के तहत गांव के बच्चों को बड़ाजामदा स्थित स्कूल आने-जाने के लिए बस सुविधा दी जाती थी।
लेकिन जैसे ही खदान बंद हुई, कंपनी ने अपनी “जिम्मेदारी” से भी हाथ खींच लिया। अप्रैल महीने से बस सेवा पूरी तरह बंद कर दी गई, जिसका सीधा असर बच्चों की शिक्षा पर पड़ा है।
5-7 किलोमीटर की दूरी बना बच्चों के सपनों की दुश्मन
ग्रामीणों ने बताया कि बराईबुरु और टाटीबा गांव से बड़ाजामदा की दूरी करीब 5 से 7 किलोमीटर है।
* छोटे-छोटे बच्चे इतनी लंबी दूरी पैदल तय नहीं कर सकते
* यात्री बसें या तो समय पर नहीं मिलतीं
* अगर मिलती भी हैं, तो पहले से यात्रियों से भरी रहती हैं
ऐसे में बच्चों का स्कूल पहुंचना लगभग असंभव हो गया है।
“मुनाफा है तो सुविधा, नहीं तो खत्म”—ग्रामीणों का फूटा गुस्सा
ग्रामीणों ने साफ तौर पर आरोप लगाया कि टाटा स्टील का असली चेहरा अब सामने आ गया है।
उनका कहना है:
“जब तक कंपनी की खदान चलती है और मुनाफा होता है, तब तक दबाव में CSR की सुविधा दी जाती है। जैसे ही काम बंद हुआ, बच्चों की पढ़ाई की कोई चिंता नहीं रही।”
यह बयान सीधे तौर पर कंपनी की नीयत पर सवाल खड़ा करता है।

शिक्षा के अधिकार पर सीधा हमला
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह सिर्फ बस सेवा बंद करने का मामला नहीं है, बल्कि गरीब और आदिवासी बच्चों के शिक्षा के अधिकार पर सीधा हमला है।
जहां सरकार “सबको शिक्षा” का नारा दे रही है, वहीं एक बड़ी कंपनी के इस फैसले ने जमीनी सच्चाई को उजागर कर दिया है।
प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग, आंदोलन की चेतावनी
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की है।
उनकी मांग है कि:
* स्कूल बस सेवा को तुरंत बहाल किया जाए
* कंपनी को CSR के तहत अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए बाध्य किया जाए
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द समाधान नहीं हुआ, तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे।
कॉर्पोरेट जिम्मेदारी या दिखावा?
यह पूरा मामला एक बड़ा सवाल खड़ा करता है—क्या बड़ी कंपनियों की CSR योजनाएं सिर्फ दिखावा हैं?
अगर हां, तो इसका खामियाजा आखिर गरीब और मासूम बच्चों को ही क्यों भुगतना पड़ता है?
बराईबुरु और टाटीबा के बच्चों की रुकी पढ़ाई सिर्फ एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि यह देश में CSR की वास्तविकता पर बड़ा सवाल है। अब देखना होगा कि प्रशासन और कंपनी इस गंभीर मुद्दे पर क्या कदम उठाते हैं—या फिर बच्चों के सपने यूं ही दम तोड़ते











