फूटा आक्रोश, खदान बंद करने की चेतावनी
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
सारंडा के जंगलों में लोहा तो खूब निकल रहा है, लेकिन यहां इंसानी जिंदगी की कीमत दिन-ब-दिन घटती जा रही है। सेल की झारखंड खान समूह के अंतर्गत संचालित किरीबुरू, मेघाहातुबुरु, गुवा और चिड़िया खदान क्षेत्रों में स्थित तीन बड़े अस्पताल—जेनरल अस्पताल किरीबुरू-मेघाहातुबुरु, सेल गुवा अस्पताल और चिड़िया अस्पताल—आज भी बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि इन अस्पतालों में एक भी स्त्री रोग विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध नहीं है, जिससे गर्भवती महिलाओं समेत अन्य महिला मरीजों की जान हर पल खतरे में बनी हुई है।

गर्भवती महिला की जिंदगी से खिलवाड़, 4 घंटे दूर रेफर
ताजा मामला गंगदा पंचायत के मुखिया राजू शांडिल की बेटी, सारंडा के कुमडीह गांव निवासी रीता शांडिल का है, जो गर्भवती हैं। 13 अप्रैल को उनकी तबीयत बिगड़ने पर उन्हें गंभीर अवस्था में सेल के गुवा अस्पताल में भर्ती कराया गया।
लेकिन विडंबना देखिए—अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ ही नहीं!
नतीजा—नाजुक हालत में ही उन्हें आनन-फानन में एंबुलेंस से IGH राउरकेला भेज दिया गया।
गुवा से राउरकेला की दूरी कोई मामूली नहीं—लगभग 4 घंटे का सफर। ऊपर से मनोहरपुर से राउरकेला तक की जर्जर सड़कें, जहां हर झटका मरीज की जान पर भारी पड़ सकता है।

“अगर रास्ते में कुछ होता तो जिम्मेदार कौन?”—मुखिया का तीखा सवाल
इस घटना के बाद मुखिया राजू शांडिल का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने सीधे-सीधे सेल प्रबंधन को कठघरे में खड़ा कर दिया।
उन्होंने कहा—
“अगर रास्ते में मेरी बेटी के साथ कोई अनहोनी हो जाती, तो उसका जिम्मेदार कौन होता? सिर्फ और सिर्फ सेल प्रबंधन!”
उनका आरोप साफ है—
सेल सिर्फ मुनाफा कमाने में लगी है, लेकिन जिन जमीनों से यह मुनाफा निकलता है, वहां के लोगों की जिंदगी की कोई कीमत नहीं।
खदानों से करोड़ों की कमाई, अस्पतालों में ‘डॉक्टर शून्य’
सारंडा क्षेत्र की खदानें देश की सबसे समृद्ध लौह अयस्क खदानों में गिनी जाती हैं। यहां से हर दिन करोड़ों रुपये का खनिज बाहर जाता है।
लेकिन उसी क्षेत्र के अस्पतालों में बुनियादी विशेषज्ञ डॉक्टर तक नहीं हैं।
सबसे गंभीर स्थिति स्त्री रोग विभाग की है—
जहां एक भी विशेषज्ञ चिकित्सक की तैनाती नहीं की गई है।
यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि सीधे-सीधे लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ है।
“डॉक्टर नहीं आते”—यह बहाना अब नहीं चलेगा
अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि यहां डॉक्टर आना नहीं चाहते।
लेकिन मुखिया राजू शांडिल ने इस बहाने को सिरे से खारिज कर दिया।
उन्होंने कहा—
“अगर सेल अच्छा पैकेज और सुविधाएं दे, तो डॉक्टर क्यों नहीं आएंगे? अधिकारी और कर्मचारी बाहर से लाए जा सकते हैं, तो डॉक्टर क्यों नहीं?”
यह सवाल अब सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, पूरे सारंडा क्षेत्र का है।
सरकारी अस्पतालों का भी वही हाल—दोनों तरफ से निराशा
स्थिति और भी चिंताजनक इसलिए है क्योंकि सरकारी अस्पतालों की हालत भी कुछ अलग नहीं है।
चाहे सेल का अस्पताल हो या सरकारी—दोनों जगह मरीजों को सही इलाज के लिए भटकना पड़ता है।
नतीजा—
गंभीर मरीजों को सैकड़ों किलोमीटर दूर राउरकेला या बड़े शहरों में रेफर किया जाता है, जहां पहुंचते-पहुंचते कई बार बहुत देर हो चुकी होती है।
अब आर-पार की लड़ाई—खदान बंद करने की चेतावनी
इस पूरे मामले को लेकर अब माहौल गरम हो चुका है।
मुखिया राजू शांडिल ने साफ चेतावनी दी है—
“जल्द ही इस मुद्दे को लेकर सेल गुवा खदान को अनिश्चितकालीन बंद किया जाएगा। जब तक अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक एक भी लौह अयस्क बाहर नहीं जाने दिया जाएगा।”
यह चेतावनी सीधे-सीधे सेल प्रबंधन के लिए खुली चुनौती है।
सवाल बड़ा है—मुनाफा या मानव जीवन?
आज सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या सेल के लिए मुनाफा ज्यादा महत्वपूर्ण है या मानव जीवन?
सारंडा के लोग, खदानों में काम करने वाले मजदूर, उनके परिवार—सभी इस व्यवस्था के भरोसे जी रहे हैं।
लेकिन जब अस्पताल ही बीमार हों, तो इलाज कहां से मिलेगा?
अंतिम बात—अब नहीं तो कभी नहीं
रीता शांडिल का मामला कोई पहला नहीं है, लेकिन अगर अब भी व्यवस्था नहीं बदली, तो यह आखिरी भी नहीं होगा।
सारंडा के लोगों का गुस्सा अब उबाल पर है।
अगर समय रहते सेल और सरकार ने इस गंभीर समस्या का समाधान नहीं किया, तो आने वाले दिनों में यह आक्रोश एक बड़े आंदोलन में बदल सकता है।
और तब सवाल सिर्फ अस्पतालों का नहीं, पूरे सिस्टम की जवाबदेही का होगा।











