अब आर-पार की लड़ाई, 24 फरवरी से रांजाबुरु के साथ गुवा खदान का हॉपर भी होगा जाम
रिपोर्ट शैलेश सिंह।
मानकी लगुड़ा देवगम और गंगदा पंचायत के मुखिया राजू शांडिल ने संयुक्त रूप से कड़ा और आक्रामक बयान जारी करते हुए कहा कि आंदोलनकारियों के साथ प्रशासन और कंपनी प्रबंधन का रवैया पूरी तरह अमानवीय और असंवेदनशील है।
दोनों नेताओं ने कहा—
“आज पूरे दिन इंतजार करने के बावजूद न तो सेल गुवा प्रबंधन का कोई अधिकारी आंदोलन स्थल पर वार्ता करने पहुंचा और न ही रांजाबुरु खदान में खनन कार्य कर रही ठेका कंपनी का कोई प्रतिनिधि आया। यह सीधा-सीधा आदिवासियों की आवाज को दबाने की कोशिश है।”

उन्होंने आरोप लगाया कि आंदोलन स्थल पर महिलाएं, बुजुर्ग और युवा खुले जंगल में बैठे रहे, लेकिन उन्हें पीने के पानी तक की व्यवस्था नहीं की गई।
मानकी लगुड़ा देवगम ने तीखे शब्दों में कहा—
“हमने गुवा खदान के उप महाप्रबंधक (सीएसआर) अनिल कुमार से फोन पर सिर्फ इतना आग्रह किया था कि आंदोलन स्थल पर एक पानी टैंकर भेज दिया जाए, क्योंकि महिलाएं और आंदोलनकारी प्यास से व्याकुल थे। लेकिन उन्होंने पानी टैंकर तक भेजने की जरूरत नहीं समझी। यह प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि मानवता के खिलाफ अपराध है।”

मुखिया राजू शांडिल ने कहा—
“जब जंगल में बैठी महिलाओं और बुजुर्गों को पानी तक न मिले, तो यह साबित करता है कि कंपनी और प्रशासन को आदिवासियों के जीवन से कोई मतलब नहीं है। यह विकास नहीं, बल्कि क्रूरता है।”
दोनों नेताओं ने ऐलान किया कि अब आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा।
उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा—
“कल यानी 24 फरवरी की सुबह से रांजाबुरु खदान के साथ-साथ सेल, गुवा खदान का हॉपर भी पूरी तरह बंद किया जाएगा। दोनों जगह एक साथ आंदोलन चलेगा। जब तक हमारी मांगें नहीं मानी जातीं, तब तक खनन और परिवहन दोनों ठप रहेंगे।”
संयुक्त बयान में यह भी कहा गया—
“हम आदिवासी जंगल में जीना जानते हैं। बिना भोजन और पानी के भी वनोत्पाद के सहारे संघर्ष करना जानते हैं। अगर कोई यह समझता है कि हमें भूखा-प्यासा रखकर तोड़ देगा, तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल है।”
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा—
“यह अब रोजगार की मांग नहीं, बल्कि आदिवासी सम्मान और अधिकार की लड़ाई है। अगर कंपनी और प्रशासन आज भी नहीं जागे, तो यह आंदोलन पूरे सारंडा और गुवा क्षेत्र में आग की तरह फैल जाएगा।”
अंत में दोनों नेताओं ने स्पष्ट संदेश दिया—
“रोजगार नहीं तो खनन नहीं। वार्ता नहीं तो उत्पादन नहीं। यह संघर्ष अब पीछे नहीं हटेगा।”

“हमारी जमीन, हमारा जंगल… फिर नौकरी बाहर वालों को क्यों?”
10 गांवों ने ठोका ताला – अब एलान: “रोजगार नहीं तो खनन नहीं”
सारंडा के घने जंगल एक बार फिर गुस्से और संघर्ष की आग से धधक उठे हैं। जिस धरती से देश का लोहा निकाला जाता है, उसी धरती के बेटे आज रोजगार के लिए तरस रहे हैं। 23 फरवरी की सुबह 7:30 बजे सारंडा क्षेत्र के 10 गांवों के सैकड़ों ग्रामीणों ने सेल की रांजाबुरु खदान में प्रवेश कर उसे अनिश्चितकालीन रूप से बंद कर दिया।
यह सिर्फ खदान बंद करने की कार्रवाई नहीं थी, बल्कि यह आदिवासी अस्मिता, अधिकार और अस्तित्व की खुली लड़ाई का ऐलान था।
ग्रामीणों का आरोप है कि खदान को बिना ग्राम सभा की अनुमति, बिना मानकी–मुंडाओं की सहमति और स्थानीय बेरोजगार युवाओं को रोजगार दिए बिना शुरू कर दिया गया।
आंदोलन सारंडा विकास समिति, जामकुंडिया–दुईया के बैनर तले चल रहा है, जिसमें पुरुषों के साथ महिलाएं, बुजुर्ग और युवा पूरी ताकत से डटे हुए हैं।












