पिता की मौत, मां का साथ छूटा — संकट में घिरे बच्चों को समाजसेवी ने दिया सहारा
गुवा संवाददाता
दर्द से भरी कहानी: एक साल में उजड़ गया पूरा परिवार
पश्चिमी सिंहभूम के गुवा थाना क्षेत्र अंतर्गत नुईया गांव में रहने वाले स्वर्गीय दूनी चाम्पिया के निधन के बाद उनके तीन मासूम बच्चों की जिंदगी पूरी तरह संकट में घिर गई।
10 वर्षीय गीता चाम्पिया, 8 वर्षीय जानों चाम्पिया और 6 वर्षीय वीरसिंह चाम्पिया — ये तीनों बच्चे पहले अपने माता-पिता के साथ किसी तरह जीवन गुजार रहे थे। लेकिन करीब एक वर्ष पूर्व पिता की बीमारी से मौत ने इस परिवार की कमर तोड़ दी।
पिता के निधन के बाद परिवार आर्थिक रूप से पूरी तरह टूट गया। हालात इतने खराब हो गए कि रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो गया।

मां ने भी छोड़ा साथ, नानी के सहारे तीन मासूम
पति की मौत के कुछ महीनों बाद बच्चों की मां नंदी चाम्पिया ने दूसरी शादी कर ली और तीनों बच्चों को उनकी नानी के पास छोड़कर चली गई।
यह घटना बच्चों के लिए दूसरा बड़ा झटका साबित हुई। एक तरफ पिता का साया उठ चुका था, दूसरी तरफ मां का साथ भी छूट गया।
नानी की आर्थिक स्थिति पहले से ही कमजोर थी, ऐसे में तीन-तीन बच्चों की जिम्मेदारी उठाना उनके लिए बेहद कठिन हो गया।
बच्चों के सामने भूख, पढ़ाई और भविष्य — तीनों संकट खड़े हो गए।
जब इंसानियत जागी: सलीम कुरैशी बने सहारा
इसी बीच गुवा बाजार निवासी समाजसेवी सलीम कुरैशी को जब इन बच्चों की हालत की जानकारी मिली, तो उन्होंने बिना देर किए मदद का हाथ बढ़ाया।
उन्होंने:
* बच्चों के लिए राशन की व्यवस्था की
* कपड़े और जरूरी सामग्री उपलब्ध कराई
* रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने की जिम्मेदारी ली
सिर्फ इतना ही नहीं, सलीम कुरैशी ने मानवता का परिचय देते हुए इन तीनों बच्चों की पूरी जिम्मेदारी उठाने का निर्णय लिया।
“अब इन बच्चों की जिम्मेदारी मेरी” — सलीम कुरैशी
सलीम कुरैशी ने स्पष्ट कहा कि वे तीनों बच्चों के खाने-पीने और जरूरी खर्च का पूरा भार उठाएंगे।
उनका यह फैसला सिर्फ आर्थिक मदद नहीं, बल्कि इन मासूमों के भविष्य को संवारने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
समाज के लिए मिसाल: इंसानियत अभी जिंदा है
आज के दौर में जहां लोग अपने स्वार्थ में व्यस्त रहते हैं, वहां सलीम कुरैशी जैसे लोग यह साबित करते हैं कि इंसानियत अभी भी जिंदा है।
उनका यह कदम:
* समाज में संवेदनशीलता का संदेश देता है
* जरूरतमंदों की मदद के लिए प्रेरित करता है
* मानवता की असली पहचान को सामने लाता है
जरूरत है और हाथ बढ़ाने की
हालांकि सलीम कुरैशी ने इन बच्चों की जिम्मेदारी उठाई है, लेकिन समाज के अन्य लोगों को भी आगे आकर ऐसे जरूरतमंद बच्चों की मदद करनी चाहिए।
अगर हर सक्षम व्यक्ति एक जरूरतमंद का सहारा बन जाए, तो कोई भी बच्चा भूखा या असहाय नहीं रहेगा।
उम्मीद की नई किरण
गीता, जानों और वीरसिंह के जीवन में जो अंधेरा छा गया था, उसमें अब उम्मीद की एक नई किरण जगी है।
सलीम कुरैशी का यह प्रयास न सिर्फ तीन बच्चों की जिंदगी बदल सकता है, बल्कि पूरे समाज को एक सकारात्मक दिशा भी दे सकता है।
यह कहानी सिर्फ तीन बच्चों की नहीं, बल्कि इंसानियत की जीत की कहानी है।














