रांजाबुरु खदान आंदोलन की रातें बनीं प्रतिरोध का प्रतीक, जंगल में सामूहिक रसोई से उठा आदिवासी स्वाभिमान का धुआं
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
सेल, गुवा की रांजाबुरु खदान में अनिश्चितकालीन बंदी के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन अब केवल दिन का विरोध प्रदर्शन नहीं रहा, बल्कि रात के अंधेरे में जलती चूल्हों की आग के साथ एक जीवंत जनसंघर्ष में बदल चुका है।
23 फरवरी की सुबह से सारंडा विकास समिति के बैनर तले जारी यह आंदोलन अब जंगल की गोद में रात-दिन चल रहा है। इस आंदोलन का नेतृत्व सारंडा पीढ़ के मानकी लगुड़ा देवगम और गंगदा पंचायत के मुखिया राजू शांडिल कर रहे हैं। मांग साफ है—
नई रांजाबुरु खदान में 75 प्रतिशत रोजगार प्रभावित गांवों के बेरोजगार युवाओं को दिया जाए और क्षेत्र के विकास की ठोस योजना लागू की जाए।
लेकिन अब आंदोलन की सबसे बड़ी तस्वीर रात में सामने आ रही है—
जब जंगल के बीच जलती लकड़ियों पर आंदोलनकारियों की सामूहिक रसोई पक रही है।

🌙 जंगल में रात, चूल्हे पर संघर्ष
देर शाम होते ही आंदोलनकारियों ने अपने-अपने गांवों से बर्तन, पानी, चावल, दाल, सब्जी और नमक लाना शुरू कर दिया। कोई सिर पर पानी ढोकर लाया, कोई जंगल से लकड़ी बटोरकर लाया।
जंगल के भीतर अस्थायी चूल्हे जले।
धुएं के साथ उठी सिर्फ चावल की खुशबू नहीं, बल्कि संघर्ष की महक।
नेतृत्वकर्ता सब्जी काटते दिखे, युवा लकड़ी तोड़ते नजर आए और बुजुर्ग आग के पास बैठकर आंदोलन की रणनीति पर चर्चा करते रहे।
यह कोई पिकनिक नहीं थी—
यह भूख और अधिकार के बीच खड़ा आदिवासी समाज का ऐतिहासिक प्रतिरोध था।
एक आंदोलनकारी ने कहा—
“अगर कंपनी हमें पानी नहीं देगी, तो हम जंगल से पानी लाएंगे। अगर खाना नहीं मिलेगा, तो जंगल में ही बनाएंगे। लेकिन आंदोलन नहीं टूटेगा।”
✊ सामूहिक रसोई बना संघर्ष का हथियार
यह सामूहिक भोजन अब आंदोलन की रीढ़ बन गया है।
लोग अपने घर से जो भी बन पड़ा—
चावल, आलू, साग, सब्जी, नमक—
सब कुछ एक जगह जमा हुआ और फिर एक साथ पकाया गया।
कोई अमीर नहीं, कोई गरीब नहीं—
सब एक ही पंक्ति में बैठे,
एक जैसा ही पत्ते में खाना खाया,
और एक ही आवाज में नारा लगाया—
“रोजगार नहीं तो खनन नहीं!”
यह दृश्य साफ कह रहा था कि यह आंदोलन अब किसी एक गांव का नहीं, बल्कि पूरे सारंडा की लड़ाई बन चुका है।
🤝 गांवों और संगठनों का बढ़ता समर्थन
इस आंदोलन को अब आसपास के गांवों और कुछ सामाजिक संगठनों का भी खुला समर्थन मिलने लगा है।
कहीं से चावल आया,
कहीं से सब्जी,
कहीं से पानी,
तो कहीं से लकड़ी।
ग्रामीणों का कहना है—
“अगर भाई-बहन जंगल में बैठे हैं, तो हम उन्हें भूखा नहीं रहने देंगे।”
यही कारण है कि यह आंदोलन अब लंबे समय तक चलने की पूरी तैयारी में दिख रहा है।
🔥 मानकी लगुड़ा देवगम का संदेश
मानकी लगुड़ा देवगम ने जंगल में जलती आग की ओर इशारा करते हुए कहा—
“यह आग सिर्फ लकड़ी की नहीं है, यह हमारे अधिकार की आग है।
हम आदिवासी जंगल में रहना जानते हैं, बिना सुविधा के जीना जानते हैं।
अगर कंपनी समझती है कि हमें भूखा रखकर आंदोलन तोड़ देगी, तो वह गलतफहमी में है।”
उन्होंने कहा—
“हमारी लड़ाई रोजगार और सम्मान की है। जब तक 75 प्रतिशत स्थानीय बेरोजगारों को काम नहीं मिलेगा, यह आग नहीं बुझेगी।”
⚔️ मुखिया राजू शांडिल की चेतावनी
मुखिया राजू शांडिल ने कहा—
“आज जंगल में जो सामूहिक रसोई जल रही है, वह कंपनी और प्रशासन के लिए चेतावनी है।
हम तैयार हैं लंबे संघर्ष के लिए।
अगर बात नहीं सुनी गई, तो आंदोलन और तेज होगा।”
उन्होंने आगे कहा—
“यह सिर्फ खदान का मामला नहीं, यह आदिवासियों के भविष्य का सवाल है।”
🌲 जंगल बना आंदोलन का किला
आज रांजाबुरु खदान के पास का जंगल किसी संघर्ष शिविर से कम नहीं दिख रहा।
जहां दिन में नारे गूंजते हैं,
वहीं रात में चूल्हों की आग जलती है।
यह दृश्य साबित करता है कि यह आंदोलन अब सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि सारंडा की आत्मा का संघर्ष बन चुका है।

चूल्हे की आग से उठी चेतावनी
रांजाबुरु खदान आंदोलन अब नए मोड़ पर है।
दिन में नारे,
रात में सामूहिक रसोई—
यह दिखा रहा है कि ग्रामीण पीछे हटने वाले नहीं हैं।
जंगल में बना यह अस्थायी रसोईघर अब आंदोलन का स्थायी प्रतीक बन चुका है—
जहां भूख भी है,
संघर्ष भी है,
और उम्मीद भी।
अब सवाल सिर्फ यही है—
क्या Steel Authority of India Limited और प्रशासन इस आग को संवाद से बुझाएंगे,
या यह जंगल से निकलकर पूरे क्षेत्र में फैल जाएगी?
सारंडा की रातें अब चुप नहीं हैं—
वे जलती चूल्हों के साथ चीख रही हैं—
“रोजगार दो, वरना खदान बंद रहेगी!”












