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बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली पर बढ़ा विवाद, CGIT कोर्ट में सुनवाई के बाद प्रबंधन की भूमिका पर उठे सवाल

On: March 15, 2026 7:42 AM
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सुनवाई में न अधिकारी पहुंचे, न अधिवक्ता; यूनियन बोली— स्टैंडिंग ऑर्डर को दरकिनार कर लागू की जा रही नई व्यवस्था

शैलेश सिंह/संदीप गुप्ता
गुवा क्षेत्र के झारखंड खान समूह की खदानों में बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली लागू किए जाने को लेकर चल रहे विवाद ने अब नया मोड़ ले लिया है। मामले की सुनवाई के दौरान CGIT (सेंट्रल गवर्नमेंट इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल) कोर्ट में कई महत्वपूर्ण सवाल सामने आए हैं। 13 मार्च को हुई सुनवाई के दौरान सेल प्रबंधन की ओर से न तो कोई अधिकारी उपस्थित हुआ और न ही उनका अधिवक्ता कोर्ट में मौजूद रहा, जिससे श्रमिक संगठनों ने प्रबंधन की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
वहीं दूसरी ओर झारखंड मज़दूर संघर्ष संघ, किरीबुरू के प्रतिनिधि पूरी तैयारी के साथ कोर्ट में उपस्थित हुए और बायोमेट्रिक प्रणाली को लेकर प्रबंधन के दावों पर विस्तृत आपत्ति दर्ज कराई।

सुनवाई में प्रबंधन की अनुपस्थिति पर उठे सवाल

CGIT कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान सेल प्रबंधन की अनुपस्थिति ने पूरे मामले को और भी संवेदनशील बना दिया है। यूनियन नेताओं का कहना है कि जब मामला हजारों कामगारों से जुड़ा हुआ है, तब प्रबंधन का अदालत में उपस्थित न होना उनकी गंभीरता पर सवाल खड़ा करता है।
यूनियन प्रतिनिधियों के अनुसार प्रबंधन ने कोर्ट में पहले से अपना लिखित प्रतिउत्तर (Rejoinder) दाखिल किया है, जिसमें कहा गया है कि बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली को NJCS समझौते के तहत लागू किया जा रहा है। लेकिन यूनियन ने इस दावे को पूरी तरह से खारिज करते हुए इसे श्रम कानूनों के खिलाफ बताया है।

स्टैंडिंग ऑर्डर को ओवरराइड नहीं कर सकता कोई समझौता

झारखंड मज़दूर संघर्ष संघ के प्रतिनिधियों ने कोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा कि कोई भी समझौता स्टैंडिंग ऑर्डर को ओवरराइड नहीं कर सकता। स्टैंडिंग ऑर्डर एक वैधानिक व्यवस्था है, जो औद्योगिक रोजगार स्थायी आदेश अधिनियम के तहत उन सभी उद्योगों में लागू होती है जहां 100 से अधिक कर्मचारी कार्यरत होते हैं।
यूनियन का कहना है कि किसी भी औद्योगिक इकाई में नई प्रणाली लागू करने से पहले उसे प्रमाणन अधिकारी (Certifying Officer) से प्रमाणित कराना अनिवार्य होता है। बिना प्रमाणन के किसी भी नई व्यवस्था को लागू करना नियमों के खिलाफ है।
यूनियन ने कोर्ट में यह भी दलील दी कि स्थायी आदेश में नियम बनाने का अधिकार केवल उपयुक्त सरकार के पास होता है, न कि किसी कंपनी या समझौते के पास। ऐसे में NJCS के माध्यम से स्टैंडिंग ऑर्डर में बदलाव करना वैधानिक रूप से संभव नहीं है।

अन्य संयंत्रों में लागू होने के दावे पर भी उठे सवाल

सेल प्रबंधन ने अपने जवाब में यह भी दावा किया है कि कंपनी के सभी संयंत्रों और ओडिशा की खदानों में पहले से ही बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली लागू कर दी गई है।
हालांकि यूनियन ने इस दावे को भी चुनौती देते हुए कहा कि प्रबंधन यह स्पष्ट नहीं कर पाया है कि यह प्रणाली किस नियम या प्रावधान के तहत लागू की गई है।
यूनियन का कहना है कि यदि अन्य संयंत्रों और खदानों में बायोमेट्रिक प्रणाली लागू की गई है, तो उसके लिए प्रमाणन अधिकारी से प्राप्त अनुमति का प्रमाण पत्र कोर्ट में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
यूनियन नेताओं के अनुसार अदालत केवल लिखित बयान के आधार पर निर्णय नहीं लेती, बल्कि इसके लिए दस्तावेजी साक्ष्य भी आवश्यक होते हैं।

“श्रम कानूनों को कमजोर करने की कोशिश”

झारखंड मज़दूर संघर्ष संघ के केंद्रीय अध्यक्ष रामा पांडे और अन्य यूनियन प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया है कि बायोमेट्रिक प्रणाली के जरिए प्रबंधन श्रम कानूनों को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है।
यूनियन नेताओं का कहना है कि यदि यह प्रणाली बिना स्पष्ट नियम और संशोधन के लागू की जाती है, तो इसका सीधा असर कामगारों की मजदूरी और उपस्थिति रिकॉर्ड पर पड़ सकता है। इससे कामगारों को आर्थिक नुकसान होने की आशंका भी जताई जा रही है।
उनका कहना है कि मशीन आधारित प्रणाली कई बार तकनीकी त्रुटियों के कारण भी गलत उपस्थिति दर्ज कर सकती है, जिसका खामियाजा मजदूरों को भुगतना पड़ सकता है।

मैनुअल व्यवस्था की जगह मशीन आधारित प्रणाली

यूनियन के अधिवक्ता ने कोर्ट में यह भी तर्क दिया कि बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली पूरी तरह से मशीन आधारित व्यवस्था है, जो मौजूदा मैनुअल प्रणाली को बदल देती है।
ऐसे में इसे लागू करने से पहले औद्योगिक नियमों और स्थायी आदेशों में आवश्यक संशोधन करना अनिवार्य है। बिना कानूनी प्रक्रिया पूरी किए इसे लागू करना नियमों का उल्लंघन माना जा सकता है।

12 साल बाद लागू करने पर भी उठे सवाल

यूनियन ने एक और महत्वपूर्ण सवाल उठाया है। उनका कहना है कि यदि बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली वास्तव में NJCS समझौते का हिस्सा थी, तो इसे लागू करने में लगभग 12 साल का समय क्यों लग गया।
यूनियन के अनुसार NJCS समझौते की अवधि आमतौर पर पांच वर्ष की होती है। ऐसे में समझौते की अवधि समाप्त होने के कई वर्षों बाद इस प्रणाली को लागू करने का औचित्य स्पष्ट नहीं है।

यूनियन ने कहा— अब प्रबंधन को देना होगा जवाब

झारखंड मज़दूर संघर्ष संघ के प्रतिनिधियों का कहना है कि उन्होंने कोर्ट में अपनी पूरी तैयारी के साथ जवाब दाखिल कर दिया है। अब यह जिम्मेदारी प्रबंधन की है कि वह अदालत में स्पष्ट करे कि बिना आवश्यक कानूनी संशोधन और प्रमाणन के बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली को किस आधार पर लागू किया गया।
यूनियन नेताओं का कहना है कि यह मामला केवल तकनीकी व्यवस्था का नहीं बल्कि हजारों कामगारों के अधिकारों से जुड़ा हुआ है। इसलिए वे इस मुद्दे को कानूनी और लोकतांत्रिक तरीके से आगे भी उठाते रहेंगे।

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सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

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