टाटा स्टील की विजय–टू खदान के 150 मजदूर सड़क पर उतरे, वेंडर कमला इंटरप्राइजेज पर गंभीर आरोप
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
टाटा स्टील की विजय–टू खदान से जुड़े मजदूरों का गुस्सा अब विस्फोट में बदल चुका है।
17 अगस्त से बंद पड़ी विजय–टू खदान में कार्यरत लगभग 150 मजदूरों को आज तक न तो उनकी ग्रेच्युटी मिली और न ही फाइनल भुगतान। महीनों से टालमटोल झेल रहे मजदूरों ने आखिरकार 23 फरवरी को बंद खदान की सड़क पर बैठकर आंदोलन शुरू कर दिया।
यह आंदोलन सिर्फ पैसों की मांग नहीं है, बल्कि यह सवाल है—
“क्या मजदूरों का खून-पसीना सिर्फ कंपनी के मुनाफे के लिए था?”
मजदूरों का सीधा आरोप है कि खदान बंद होने के बाद वेंडर कंपनी कमला इंटरप्राइजेज ने जानबूझकर उनके बकाया भुगतान को दबा दिया है।
अब मजदूरों ने साफ कर दिया है—
“जब तक पैसा नहीं मिलेगा, आंदोलन खत्म नहीं होगा।”

ALC कोर्ट में वादा, सड़क पर धोखा
इस पूरे मामले में प्रशासनिक भरोसे पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
मजदूरों ने बताया कि यह मामला पहले ही ALC कोर्ट, चाईबासा तक पहुंच चुका था। वहां कमला इंटरप्राइजेज के पदाधिकारियों ने स्पष्ट कहा था—
“20 फरवरी तक हर हाल में सभी मजदूरों का बकाया भुगतान कर दिया जाएगा।”
लेकिन 20 फरवरी बीत गया…
21, 22 फरवरी बीत गया…
और मजदूरों के हाथ आज भी खाली हैं।
इसी धोखे से नाराज होकर मजदूरों ने 23 फरवरी से सड़क पर उतरकर आंदोलन शुरू कर दिया।
झारखंड मजदूर संघर्ष संघ मैदान में उतरा
मजदूरों के समर्थन में झारखंड मजदूर संघर्ष संघ के केंद्रीय अध्यक्ष रामा पाण्डे स्वयं आंदोलन स्थल पर पहुंचे।
उन्होंने वेंडर कंपनी और प्रबंधन पर तीखा हमला बोला।
रामा पाण्डे ने कहा—
“यह मजदूरों के साथ खुला धोखा है।
ALC कोर्ट में जो वादा किया गया था, वह झूठ साबित हुआ।
कमला इंटरप्राइजेज ने जानबूझकर मजदूरों को गुमराह किया है।”
उन्होंने आगे कहा—
“अगर मजदूरों को उनका पैसा नहीं मिला, तो यह आंदोलन सिर्फ सड़क तक सीमित नहीं रहेगा।
हम इसे जिला स्तर से लेकर राज्य स्तर तक ले जाएंगे।”
150 परिवारों की रोजी-रोटी पर हमला
विजय–टू खदान बंद होने के बाद लगभग 150 मजदूर परिवार बेरोजगारी और आर्थिक संकट में फंस चुके हैं।
इन मजदूरों की हालत यह है कि—
* बच्चों की स्कूल फीस नहीं भर पा रहे
* घर का राशन उधार में चल रहा है
* इलाज तक कराना मुश्किल हो गया है
एक मजदूर ने गुस्से में कहा—
“हमने सालों तक खदान में काम किया।
अब खदान बंद हुई तो हमें सड़क पर बैठने को मजबूर कर दिया गया।
क्या यही मजदूरों की कीमत है?”

टाटा स्टील और वेंडर पर सवालों की बौछार
मजदूरों ने सीधे सवाल उठाए—
* जब खदान बंद हुई तो मजदूरों का फाइनल भुगतान क्यों नहीं किया गया?
* ALC कोर्ट में किया गया वादा क्यों तोड़ा गया?
* मजदूरों की ग्रेच्युटी किसने रोकी?
* क्या मजदूर सिर्फ ठेका कंपनी की जिम्मेदारी हैं या मुख्य कंपनी भी जवाबदेह है?
मजदूरों का कहना है कि यह सिर्फ कमला इंटरप्राइजेज का मामला नहीं है, बल्कि इसमें Tata Steel की भी नैतिक जिम्मेदारी बनती है।
आंदोलन स्थल पर कंपनी पदाधिकारियों के पहुंचने की चर्चा
आंदोलन के बीच यह चर्चा है कि कमला इंटरप्राइजेज के पदाधिकारी आंदोलन स्थल पर पहुंच सकते हैं और मजदूरों से वार्ता चल रही है।
लेकिन मजदूरों का रुख बिल्कुल साफ है—
“पहले पैसा, फिर बात।”
मजदूरों ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द भुगतान नहीं हुआ तो—
* खदान क्षेत्र में बड़ा प्रदर्शन होगा
* जिला प्रशासन का घेराव किया जाएगा
* सड़क जाम और चक्का जाम तक आंदोलन जाएगा

“हम भीख नहीं, मेहनत की कमाई मांग रहे हैं”
मजदूरों ने एक स्वर में कहा—
“हम भीख नहीं मांग रहे।
हम अपनी मेहनत की कमाई मांग रहे हैं।
जब तक हमें हमारा हक नहीं मिलेगा, तब तक हम पीछे नहीं हटेंगे।”
यह आंदोलन अब केवल मजदूरों का संघर्ष नहीं रहा, बल्कि यह बन चुका है—
श्रमिक अधिकार बनाम ठेका व्यवस्था की लड़ाई।
अब प्रशासन और कंपनी की अग्निपरीक्षा
विजय–टू खदान का यह मामला अब प्रशासन, वेंडर कंपनी और टाटा स्टील—तीनों की परीक्षा बन चुका है।
एक तरफ सड़क पर बैठे भूखे मजदूर हैं, दूसरी तरफ कंपनियों के वादे और फाइलें।
अब बड़ा सवाल यही है—
क्या मजदूरों को उनका हक मिलेगा?
या फिर यह आंदोलन और भड़क कर बड़ा विस्फोट बनेगा?













