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राजाबुरू खदान पर जनआक्रोश विस्फोट

On: February 13, 2026 3:41 PM
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⚔️ 11 गांवों की विशाल रैली, 500 रोजगार की मांग — “खदान हमारी जमीन पर, नौकरी बाहर वालों को क्यों?”

रिपोर्ट: शैलेश सिंह/संदीप गुप्ता।

गुवा क्षेत्र स्थित सेल के प्रस्तावित राजाबुरू खदान को लेकर शुक्रवार को जनाक्रोश सड़कों पर उतर आया। कासिया पेचा, जोजोगुटू, राजाबेड़ा, घाटकुड़ी, गंगदा, बाईहातु, तिंतलिघाट, लेम्बेरे, सोनापी, बाड़ुईया एवं छोटानागरा—इन 11 गांवों के लगभग 300 मुंडा, मानकी, डाकुआ और ग्रामीणों ने एकजुट होकर विशाल रैली निकाली और सेल प्रबंधन के खिलाफ हुंकार भरी।
कासिया पेचा गांव के समाजसेवी मंगता सुरीन की अध्यक्षता में ग्रामीण पारंपरिक हथियारों के साथ कैलाश नगर से निकले। नारे गूंजते रहे—
“हमारी जमीन, हमारा अधिकार!”
“500 रोजगार दो, नहीं तो खदान बंद करो!”
“स्थानीय बहाली लागू करो!”
रैली गुवा बाजार होते हुए सीधे सेल के जनरल ऑफिस पहुंची, जहां ग्रामीणों ने जोरदार प्रदर्शन कर प्रबंधन को ज्ञापन सौंपा।

🔥 106 साल का शोषण, अब बर्दाश्त नहीं

ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि गुवा सेल खदान वर्ष 1919-20 से संचालित है। यानी 106-107 साल हो चुके हैं, लेकिन खदान से प्रभावित गांव आज भी बेरोजगारी, अशिक्षा, कुपोषण और बदहाल स्वास्थ्य सुविधाओं से जूझ रहे हैं।
ग्रामीणों का सीधा सवाल है—
“अगर हमारी जमीन पर लौह अयस्क निकल रहा है, तो हमारे बच्चों को मजदूरी और बेरोजगारी क्यों मिल रही है?”
उन्होंने कहा कि इतने वर्षों में रोजगार, शिक्षा, सड़क, पेयजल और स्वास्थ्य के नाम पर सिर्फ घोषणाएं हुईं, जमीन पर विकास नहीं।

📢 500 स्थानीय बेरोजगारों को नौकरी देने की मांग

ज्ञापन में मुख्य मांग रखी गई कि राजाबुरू खदान से प्रभावित गांवों के कम से कम 500 स्थानीय युवक-युवतियों को रोजगार दिया जाए।
ग्रामीणों ने राज्य सरकार के नियमों का हवाला देते हुए कहा—
75% बहाली स्थानीय आवासीय प्रमाण पत्र (Local Residential Certificate) के आधार पर हो।
40% महिलाओं को रोजगार में भागीदारी दी जाए।
सभी बहाली प्रक्रिया ग्रामसभा की निगरानी में पारदर्शी तरीके से हो।
ग्रामीणों का आरोप है कि वर्तमान में बहाली प्रक्रिया को बंद कर मनमानी और कथित रूप से लेन-देन के आधार पर नियुक्तियां की जा रही हैं।

⚖️ पेसा कानून और संविधान का हवाला

आंदोलनकारियों ने पेसा कानून और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा कि—
“सम्मानपूर्वक जीवन जीना हमारा संवैधानिक अधिकार है।
बिना रोजगार के आदिवासी समाज को गुलामी की ओर धकेला जा रहा है।”
ग्रामीणों ने कहा कि खदान खोलने से पहले स्थानीय बहाली को लेकर स्पष्ट और लिखित समझौता होना चाहिए, नहीं तो संघर्ष और तेज होगा।

🏗️ पेरिफेरल डेवलपमेंट सिर्फ कागजों में?

ग्रामीणों ने पेरिफेरल डेवलपमेंट योजना पर भी गंभीर सवाल उठाए।
उनका कहना है कि खदान से सटे गांवों में स्कूल, अस्पताल, सड़क, पेयजल और रोजगार की व्यवस्था होनी चाहिए थी, लेकिन आज भी गांव अंधेरे और बदहाली में जी रहे हैं।
एक बुजुर्ग ग्रामीण ने आक्रोश में कहा—
“सेल ने पहाड़ खोद डाले, लेकिन हमारे बच्चों का भविष्य नहीं बनाया।”

🚨 चेतावनी: एक सप्ताह में जवाब नहीं तो चक्का जाम

ग्रामीणों ने साफ शब्दों में चेतावनी दी कि—
“यदि एक सप्ताह के भीतर हमारी मांगों पर सकारात्मक पहल नहीं हुई, तो गुवा सेल की मुख्य सड़क और खदान क्षेत्र में चक्का जाम किया जाएगा।”
उन्होंने कहा कि इसके बाद होने वाली किसी भी स्थिति की पूरी जिम्मेदारी सेल प्रबंधन की होगी।

🧱 आरोप: बहाली में दलाली और भ्रष्टाचार

ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि बहाली प्रक्रिया में दलाल सक्रिय हैं।
बाहरी लोगों को नौकरी देकर स्थानीय युवाओं को दरकिनार किया जा रहा है।
ग्रामीणों ने मांग की कि—
सभी बहाली सूची सार्वजनिक की जाए।
ग्रामसभा से अनुमोदन अनिवार्य हो।
फर्जी नियुक्तियों की जांच कर दोषियों पर कार्रवाई हो।

🏭 सेल प्रबंधन पर सीधा सवाल

यह आंदोलन सीधे तौर पर सेल (SAIL) प्रबंधन की नीतियों पर सवाल खड़ा करता है।
ग्रामीणों का कहना है कि कंपनी मुनाफा कमा रही है, लेकिन जमीन देने वाले लोग आज भी मजदूरी के लिए भटक रहे हैं।
“क्या सेल सिर्फ लोहा निकालेगा या इंसान भी बनाएगा?”

🪧 जन आंदोलन का सामाजिक संदेश

यह रैली सिर्फ रोजगार की मांग नहीं थी, बल्कि यह आदिवासी समाज के सम्मान, अधिकार और अस्तित्व की लड़ाई बन चुकी है।
मुंडा, मानकी और डाकुआ एक स्वर में बोले—
“अब हम चुप नहीं रहेंगे।
अब हमारी जमीन पर हमारी हिस्सेदारी होगी।”

📜 ज्ञापन में प्रमुख मांगें

ग्रामीणों द्वारा सौंपे गए ज्ञापन में प्रमुख मांगें इस प्रकार रहीं—
राजाबुरू खदान से प्रभावित 11 गांवों के 500 स्थानीय युवक-युवतियों की बहाली।
75% स्थानीय आरक्षण और 40% महिला भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
बहाली प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी हो।
पेरिफेरल डेवलपमेंट योजना के तहत गांवों में स्कूल, अस्पताल, सड़क और पेयजल सुविधा।
पेसा कानून का पूर्ण पालन।
ग्रामसभा की सहमति के बिना खदान संचालन नहीं।

🏁 खदान बनाम इंसान की लड़ाई?

राजाबुरू खदान अब सिर्फ एक औद्योगिक परियोजना नहीं रही, बल्कि यह आदिवासी अधिकार बनाम कॉरपोरेट सत्ता की लड़ाई का प्रतीक बन गई है।
ग्रामीणों का स्पष्ट संदेश है—
“खदान चाहिए, लेकिन गुलामी नहीं।
विकास चाहिए, लेकिन विस्थापन नहीं।
रोजगार चाहिए, लेकिन भीख नहीं।”
अगर समय रहते सेल प्रबंधन ने स्थानीय बहाली पर ठोस कदम नहीं उठाए, तो यह आंदोलन आने वाले दिनों में और उग्र रूप ले सकता है।

अंतिम चेतावनी

“हमारी जमीन पर खदान,
तो हमारे बच्चों के हाथ में नौकरी।
नहीं तो सड़क जाम, खदान जाम, काम जाम!”
राजाबुरू खदान अब केवल लोहे की कहानी नहीं, बल्कि आदिवासी आत्मसम्मान की लड़ाई बन चुकी है।

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सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

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