“अब आर-पार की लड़ाई”
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
टाटा स्टील की विजय–टू की बंद खदान में मजदूरों का आंदोलन अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है।
पहले ग्रेच्युटी और फाइनल भुगतान की मांग को लेकर सड़क पर उतरे मजदूरों ने अब खदान को पूरी तरह लॉकडाउन करने का ऐलान कर दिया है।
कंपनी प्रबंधन और आंदोलनरत मजदूरों के बीच हुई वार्ता पूरी तरह विफल हो गई।
इसके बाद मजदूरों ने साफ शब्दों में फैसला सुना दिया—
“जब तक वेंडर या कंपनी प्रबंधन हमारे बकाया ग्रेच्युटी और अन्य भुगतान नहीं करता, तब तक विजय–टू खदान के अंदर से कोई बाहर नहीं आएगा और बाहर से कोई अंदर नहीं जाएगा।”
यह सिर्फ आंदोलन नहीं, बल्कि अब यह औद्योगिक घेराबंदी (Industrial Siege) बन चुका है।

सिर्फ सुरक्षा कर्मियों को राहत, बाकी सब पर रोक
मजदूरों ने मानवीय आधार पर केवल सीमित छूट देने की घोषणा की है।
उनके अनुसार—
खदान की सुरक्षा में तैनात सुरक्षा कर्मियों के लिए
भोजन
पानी
दवा
और डीजी चलाने के लिए डीजल
ले जाने की अनुमति होगी।
इसके अलावा किसी भी अधिकारी, कर्मचारी, सुरक्षा कर्मी या सामग्री की आवाजाही पूरी तरह प्रतिबंधित कर दी गई है।
मजदूरों का कहना है—
“हम आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन अमानवीय नहीं हैं।
सुरक्षा कर्मियों की जरूरतों का ध्यान रखा जाएगा, मगर कंपनी की मशीनरी नहीं चलेगी।”
15 मार्च तक का समय मांगा, मजदूरों ने ठुकराया
कंपनी प्रबंधन ने मजदूरों से अपील करते हुए कहा कि—
“15 मार्च तक बकाया भुगतान कर दिया जाएगा।”
लेकिन मजदूरों ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया।
मजदूरों का दो टूक जवाब था—
“हम 20 फरवरी तक भुगतान के वादे पर भरोसा कर चुके हैं, और वह झूठ निकला।
अब कोई तारीख नहीं, पहले पैसा, फिर बातचीत।”
इस फैसले के बाद आंदोलन और अधिक उग्र हो गया।
पहले सड़क आंदोलन, अब बंद खदान की नाकेबंदी
यह आंदोलन 23 फरवरी को तब शुरू हुआ था, जब 17 अगस्त से बंद पड़ी विजय–टू खदान में कार्यरत लगभग 150 मजदूरों को उनकी ग्रेच्युटी और फाइनल भुगतान नहीं मिला।
वेंडर कंपनी कमला इंटरप्राइजेज पर आरोप है कि उसने महीनों से मजदूरों को सिर्फ आश्वासन दिया और पैसा दबा लिया।
मामला पहले ही ALC कोर्ट, चाईबासा तक पहुंच चुका था, जहां कमला इंटरप्राइजेज के पदाधिकारियों ने कहा था कि—
“20 फरवरी तक हर हाल में सभी मजदूरों का भुगतान कर दिया जाएगा।”
लेकिन जब वादा टूटा, तो मजदूरों का गुस्सा फूट पड़ा और वे सड़क पर उतर आए।
अब वही आंदोलन खदान के भीतर पूरी तरह नाकेबंदी में बदल गया है।

झारखंड मजदूर संघर्ष संघ का समर्थन, बड़ा आंदोलन तय
इस आंदोलन को पूरा समर्थन मिला है झारखंड मजदूर संघर्ष संघ का।
संघ के केंद्रीय अध्यक्ष रामा पाण्डे आंदोलन स्थल पर मौजूद और मजदूरों के साथ डटे हुए थे।
रामा पाण्डे ने कंपनी और वेंडर पर तीखा हमला बोलते हुए कहा—
“यह मजदूरों के साथ खुला धोखा है।
ALC कोर्ट में किया गया वादा तोड़ा गया, जो अपराध की श्रेणी में आता है।
अगर मजदूरों को उनका पैसा नहीं मिला तो यह आंदोलन पूरे कोल्हान में फैलाया जाएगा।”
उन्होंने चेतावनी दी—
“अब यह सिर्फ 150 मजदूरों का मामला नहीं, यह श्रमिक अधिकारों की लड़ाई बन चुकी है।”
150 परिवारों की जिंदगी ठहर गई
विजय–टू खदान के मजदूर सिर्फ कर्मचारी नहीं हैं, बल्कि उनके पीछे 150 परिवारों का जीवन टिका हुआ है।
भुगतान नहीं मिलने से—
* बच्चों की पढ़ाई रुकने की कगार पर है
* घरों में चूल्हा जलाना मुश्किल हो गया है
* इलाज और दवा तक के पैसे नहीं हैं
एक मजदूर का दर्द छलक पड़ा—
“हमने खदान में अपनी जवानी खपाई।
अब खदान बंद हुई तो हमें भूखे मरने के लिए छोड़ दिया गया।
क्या यही कंपनी का इंसाफ है?”
टाटा स्टील की नैतिक जिम्मेदारी पर सवाल
मजदूरों का कहना है कि यह केवल वेंडर कंपनी का मामला नहीं है, बल्कि इसमें मुख्य कंपनी की भी जवाबदेही बनती है।
उन्होंने सीधे सवाल उठाए—
* क्या वेंडर के जरिए मजदूरों का शोषण करना नीति है?
* जब खदान टाटा स्टील की है, तो मजदूरों के भुगतान की जिम्मेदारी किसकी है?
* ALC कोर्ट के आदेश का पालन क्यों नहीं हुआ?
मजदूरों का कहना है कि Tata Steel को इस पूरे मामले में हस्तक्षेप कर तुरंत भुगतान कराना चाहिए।

“अब भरोसे का दौर खत्म”
मजदूरों ने एक स्वर में कहा—
“हम तारीख नहीं, पैसा चाहते हैं।
हम वादा नहीं, इंसाफ चाहते हैं।
अब भरोसे का दौर खत्म हो गया है।”
उनका स्पष्ट संदेश है—
“जब तक बकाया नहीं, तब तक खदान नहीं।”
प्रशासन और कंपनी की अग्निपरीक्षा
विजय–टू खदान का यह संकट अब प्रशासन, वेंडर कंपनी और टाटा स्टील—तीनों की अग्निपरीक्षा बन गया है।
अगर जल्द समाधान नहीं हुआ, तो यह आंदोलन पूरे कोल्हान में मजदूर आंदोलन की चिंगारी बन सकता है।
आज खदान के गेट पर लिखा है—
“न्याय चाहिए, भीख नहीं।”
और मजदूरों की आवाज गूंज रही है—
**“पैसा नहीं तो रास्ता नहीं…
इंसाफ नहीं तो शांति नहीं!”**













