कोल्हान और सारंडा में माओवादी संगठन को करारी चोट, 10 उग्रवादी हथियार डाल मुख्यधारा में लौटे
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
पुलिस का सबसे बड़ा ऑपरेशनल सफलता
झारखंड के कोल्हान और सारंडा जंगल में लंबे समय से सक्रिय भाकपा (माओवादी) संगठन को झारखंड पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों ने एक बार फिर तगड़ा झटका दिया है। आज 25 सितंबर 2025 का दिन राज्य पुलिस के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया, जब प्रतिबंधित संगठन के 10 सक्रिय सदस्य आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में शामिल हो गए।
यह घटना न सिर्फ माओवादियों की घटती ताकत को दर्शाती है बल्कि पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों की उस व्यापक रणनीति की जीत है, जिसने पिछले तीन सालों में नक्सली संगठन की कमर तोड़ दी है।

अभियान का नेतृत्व: “आतंक पर शिकंजा”
राज्य के महानिदेशक एवं पुलिस महानिरीक्षक के सीधे निर्देशन में झारखंड पुलिस, कोबरा, झारखंड जगुआर (एसटीएफ), सीआरपीएफ और अन्य केंद्रीय अर्द्धसैनिक बलों ने एक संयुक्त अभियान छेड़ा है।
- सिर्फ पश्चिमी सिंहभूम जिले में वर्ष 2022 से अब तक कुल 9631 अभियान चलाए गए।
- इन अभियानों में 175 नक्सली गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजे गए।
- 10 कुख्यात उग्रवादी मुठभेड़ में ढेर किए गए।
- भारी मात्रा में हथियार, विस्फोटक, कारतूस और आधुनिक उपकरण बरामद हुए।
सुरक्षा बलों के लगातार दबाव का नतीजा है कि अब नक्सली सरेंडर करने पर मजबूर हैं। जंगल में उनकी पकड़ कमजोर हो चुकी है, कैडर भर्ती ठप है और आम जनता का भरोसा पुलिस पर बढ़ रहा है।

माओवादी संगठन की रीढ़ टूटी
कोल्हान और सारंडा क्षेत्र पिछले डेढ़ दशक से माओवादियों का गढ़ रहा है। यहीं से संगठन का ERB (Eastern Regional Bureau) संचालित होता रहा है।
इसका नेतृत्व कभी मिसिर बेसरा, पतिराम मांझी उर्फ अनल, असीम मंडल, सुशांत उर्फ अनमोल, मेहनत उर्फ मोछू, अजय महतो उर्फ बुधराम, पिंटु लोहरा, अश्विन, अमित मुंडा, सालुका कायम और सागेन अंगरिया जैसे कुख्यात कमांडर करते रहे।
इनके नाम सुनते ही ग्रामीण सहम जाते थे। हत्या, लूट, धमकी और फिरौती जैसे अपराधों से गांव का गांव दहशत में रहता था। मगर आज तस्वीर बदल चुकी है। पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों की संयुक्त रणनीति ने उनकी रीढ़ तोड़ दी है।
आत्मसमर्पण की गूंज: “मुख्यधारा की ओर वापसी”
झारखंड सरकार ने नक्सली समस्या से निपटने के लिए सिर्फ हथियार नहीं, बल्कि पुनर्वास नीति का रास्ता भी अपनाया।
राज्य की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति इतनी आकर्षक बनाई गई है कि पिछले तीन वर्षों में 26 नक्सली पहले ही मुख्यधारा में लौट चुके हैं।
आज जब 10 और सदस्य हथियार डालकर समाज में लौटे तो यह संख्या और मजबूत हो गई। पुलिस अधिकारियों के सामने इन युवाओं का आत्मसमर्पण इस बात का सबूत है कि जंगल की बंदूक छोड़कर शांति और विकास की राह अपनाना ही एकमात्र विकल्प है।

आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों की सूची
आज आत्मसमर्पण करने वाले माओवादी सदस्यों के नाम इस प्रकार है—
- रांदो बोइपाई उर्फ क्रांति बोईपाई – गोइलकेरा थाना क्षेत्र का सक्रिय माओवादी।
- गार्दी कोड़ा (20 वर्ष) – टोंटो थाना क्षेत्र का कैडर, संगठन का फील्ड सपोर्टर।
- जॉन उर्फ जोहन पुरती (20 वर्ष) – कई बार ग्रामीणों से लेवी वसूली में शामिल।
- निरसो सीदू उर्फ आशा उर्फ निराशा (20 वर्ष) – छोटानगरा थाना क्षेत्र में सक्रिय।
- घोनोर देवगम (18 वर्ष) – सबसे कम उम्र का उग्रवादी, टोंटो क्षेत्र से जुड़ा।
- गोमेया कोड़ा उर्फ टारजन (20 वर्ष) – गोइलकेरा थाना क्षेत्र का सक्रिय कैडर।
- कैरा कोड़ा (20 वर्ष) – टोंटो थाना क्षेत्र, संगठन में सक्रिय महिला समर्थक।
- कैरी कायम उर्फ गुलांची (22 वर्ष) – चाईबासा मुफ्फसिल थाना क्षेत्र से संबंध।
- सावित्री गोप उर्फ मुतुरी उर्फ फुटबॉल (18 वर्ष) – महिला कैडर, गोइलकेरा क्षेत्र में सक्रिय।
- प्रदीप सिंह मुंडा – रांची के तमाड़ थाना क्षेत्र का कुख्यात माओवादी।
इनमें से कई पर ग्रामीणों को डराने, लेवी वसूली करने और सुरक्षाबलों की गतिविधियों पर नजर रखने जैसे गंभीर आरोप रहे हैं।
सुरक्षा कैम्पों से बढ़ी जनता की हिम्मत
पुलिस ने पिछले तीन सालों में न सिर्फ अभियान चलाया बल्कि नक्सली प्रभावित इलाकों में नए सुरक्षा कैम्पों की स्थापना भी की।
इन कैम्पों से—
- ग्रामीणों को सुरक्षा का एहसास हुआ।
- बच्चों को शिक्षा और युवाओं को रोजगार की राह मिली।
- नक्सलियों की गतिविधियां सिमटकर सीमित इलाकों तक रह गईं।
यही कारण है कि अब ग्रामीण खुले तौर पर माओवादियों के खिलाफ आवाज उठाने लगे हैं।

संगठन पर करारा प्रहार
आज के आत्मसमर्पण से यह साफ है कि भाकपा (माओवादी) संगठन का प्रभाव तेजी से कमजोर हो रहा है।
- 10 सदस्यों का आत्मसमर्पण संगठन के लिए मानसिक और रणनीतिक दोनों स्तर पर करारा झटका है।
- यह कदम बाकी छिपे हुए उग्रवादियों के लिए भी एक चेतावनी है कि देर-सबेर उन्हें भी हथियार डालने ही पड़ेंगे।
सरकार की सख्त चेतावनी और अपील
राज्य पुलिस ने साफ संदेश दिया है—
- जो बंदूक छोड़ेगा, उसे समाज में सम्मान और पुनर्वास मिलेगा।
- जो बंदूक उठाएगा, उसका अंत जेल या मौत में होगा।
पुलिस ने सभी सक्रिय नक्सलियों से अपील की है कि वे सरकार की आत्मसमर्पण नीति का लाभ उठाएँ और मुख्यधारा से जुड़ें।
भविष्य की राह
सरकार और पुलिस दोनों का मानना है कि अब माओवाद का अंत करीब है।
सुरक्षा बलों की लगातार मौजूदगी, पुनर्वास योजनाओं का असर और जनता का सहयोग मिलकर नक्सली संगठन को पूरी तरह समाप्त करने की ओर बढ़ रहे हैं।
नतीजा: “लौह–प्रहार जारी रहेगा”
पिछले तीन वर्षों की उपलब्धियों और आज की ऐतिहासिक घटना ने यह साबित कर दिया है कि झारखंड पुलिस और अर्द्धसैनिक बल नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक जंग लड़ रहे हैं।
9631 अभियान, 175 गिरफ्तारी, 10 उग्रवादी ढेर और अब 10 का आत्मसमर्पण…
यह आँकड़े गवाही देते हैं कि नक्सली संगठन अब अंतिम सांसें गिन रहा है।
झारखंड की धरती पर शांति और विकास का सूरज उग रहा है, और माओवाद का अंधेरा मिटने को है।















