विकास कार्यों पर बंदूक की नली, ठेकेदारों से लेवी वसूली, कारोबारियों में दहशत
सवाल: जब बड़े माओवादी ढेर हो चुके हैं तो पीएलएफआई/जेएलटी गिरोह पर कार्रवाई क्यों नहीं?
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिला अंतर्गत सारंडा, कोल्हान और पोड़ाहाट के घने जंगलों से माओवादी नक्सलियों का खात्मा अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है। 22 जनवरी को करोड़ों और लाखों के इनामी कुख्यात नक्सली अनल दा, अनमोल दा समेत 17 शीर्ष माओवादियों के मारे जाने के बाद संगठन की रीढ़ टूट चुकी है।
अब केवल कुछ नाम बचे हैं — करोड़ों के इनामी मिसिर बेसरा, मेहनत उर्फ मोछू और सागेन अंगारिया। सुरक्षा एजेंसियों का दावा है कि इनका अंत भी जल्द तय है।
लेकिन इसी बीच एक नई और गंभीर समस्या फिर से सिर उठा रही है — पीपुल्स लिब्रेशन फ्रंट ऑफ इंडिया (PLFI)/झारखंड लिब्रेशन टाइगर (JLT) नामक नक्सली-अपराधी गिरोह, जो गोइलकेरा थाना क्षेत्र के महादेवशाल और कुमडी इलाके के जंगलों में आज भी खुलेआम आतंक फैला रहा है।

माओवादी कमजोर, लेकिन पीएलएफआई/जेएलटी बना नया सिरदर्द
जहां एक ओर पुलिस और सुरक्षा बलों ने माओवादियों की कमर तोड़ दी है, वहीं दूसरी ओर पीएलएफआई/जेएलटी गिरोह धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र के लिए नई मुसीबत बनता जा रहा है।
यह गिरोह न तो माओवादी संगठन से जुड़ा है और न ही सामान्य अपराधी समूह है, बल्कि यह एक ऐसा नेटवर्क बन चुका है जो आतंक, वसूली और अवैध कारोबार के सहारे खुद को मजबूत कर रहा है।
विकास कार्यों पर बंदूक की पहरेदारी
महादेवशाल और कुमडी क्षेत्र में चल रही सरकारी विकास योजनाएं पीएलएफआई/जेएलटी के लिए सबसे बड़ा निशाना बनी हुई हैं।
सूत्र बताते हैं कि गिरोह के सदस्य हथियार लेकर सीधे कार्यस्थलों पर पहुंचते हैं और:
ठेकेदारों से लेवी की मांग करते हैं
मजदूरों को डराते-धमकाते हैं
काम बंद कराने की धमकी देकर लौट जाते हैं
परिणामस्वरूप सड़क, पुल, भवन और अन्य योजनाएं अधर में लटक जाती हैं। यह केवल ठेकेदारों की समस्या नहीं, बल्कि पूरे इलाके के विकास पर हमला है।
बालू तस्करी से बन रहा है हथियारों का जखीरा
पीएलएफआई/जेएलटी गिरोह का सबसे बड़ा आर्थिक स्रोत है — वैध और अवैध बालू परिवहन से वसूली।
जानकारी के अनुसार:
हर दिन बालू ढोने वाले ट्रकों से मोटी रकम वसूली जाती है
इसी पैसे से हथियार खरीदे जा रहे हैं
नए युवाओं को गिरोह में शामिल कर नेटवर्क फैलाया जा रहा है
यानी बालू की कमाई अब सीधे बंदूक में तब्दील हो रही है।
कारोबारियों में दहशत, जनता असहाय
इस गिरोह की गतिविधियों से पूरे क्षेत्र के कारोबारियों में भारी भय व्याप्त है।
कई व्यापारी खुलकर शिकायत करने से भी डर रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि:
रात होते ही जंगल का इलाका नो-गो एरिया बन जाता है
बाहरी लोग आने से कतराते हैं
विकास योजनाएं कागजों में ही सिमट जाती हैं
जनता पूछ रही है —
क्या माओवादी खत्म होने के बाद अब पीएलएफआई/जेएलटी को पनपने दिया जाएगा?

पुलिस के लिए खुली चुनौती
यह स्थिति पुलिस और प्रशासन के लिए सीधी चुनौती है।
जब करोड़ों के इनामी माओवादी मारे जा सकते हैं, तो पीएलएफआई/जेएलटी जैसे गिरोह पर कार्रवाई क्यों नहीं?
क्षेत्र में चर्चा है कि यदि समय रहते इस गिरोह का सफाया नहीं किया गया तो:
यह नया नक्सली नेटवर्क बन सकता है
माओवादी खालीपन को भर सकता है
भविष्य में और बड़ा खतरा पैदा करेगा
जनता और व्यापार पर सीधा हमला
पीएलएफआई/जेएलटी गिरोह की गतिविधियां केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि:
आम जनता की सुरक्षा पर हमला है
व्यापार और रोजगार पर चोट है
सरकार की विकास योजनाओं की हत्या है
यह वही इलाका है जहां सरकार करोड़ों की योजनाएं चला रही है और दूसरी ओर बंदूक की ताकत से उन्हें रोका जा रहा है।
अब सवाल नहीं, कार्रवाई चाहिए
अब सवाल उठाने का समय खत्म हो चुका है।
यह वक्त है ठोस कार्रवाई का।
जनता और व्यवसायियों की मांग है कि:
जेएलटी/पीएलएफआई गिरोह के खिलाफ विशेष अभियान चलाया जाए
जंगल क्षेत्रों में सघन सर्च ऑपरेशन हो
लेवी वसूली और बालू तस्करी पर पूरी तरह रोक लगे
गिरोह के आर्थिक स्रोत को खत्म किया जाए

माओवादी युग का अंत, पीएलएफआई/जेएलटी युग की शुरुआत नहीं होने दें
सारंडा से माओवादी युग लगभग खत्म हो चुका है।
लेकिन अगर पीएलएफआई/जेएलटी जैसे गिरोह को अभी नहीं रोका गया, तो यह एक नए आतंक के युग की शुरुआत होगी।
पुलिस और प्रशासन के लिए यह निर्णायक क्षण है —
या तो अभी इस गिरोह का खात्मा कर क्षेत्र को स्थायी शांति दी जाए,
या फिर जनता को एक और नक्सली अध्याय झेलने के लिए छोड़ दिया जाए।
अब जरूरत है कठोर कार्रवाई की, ताकि महादेवशाल और कुमडी के जंगल फिर से भय नहीं, विकास की पहचान बनें।














