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सारंडा का आखिरी रण! 31 मार्च की डेडलाइन पर घिरा ‘लाल किला’, क्या खत्म होगा नक्सलवाद का आखिरी अध्याय?

On: March 31, 2026 5:13 PM
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मिसिर बेसरा बना ‘अंतिम चेहरा’, सुरक्षाबलों का शिकंजा कसता जा रहा—सरेंडर या सफाया, अब बस दो ही रास्ते

रिपोर्ट: शैलेश सिंह

डेडलाइन का आखिरी दिन: क्या सच में खत्म होगा नक्सलवाद?

31 मार्च 2026—यह सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि भारत सरकार द्वारा तय किया गया वह अंतिम दिन है, जिसके भीतर पूरे देश को वामपंथी उग्रवाद से मुक्त करने का लक्ष्य रखा गया था। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की इस सख्त समयसीमा के अंतिम दिन, झारखंड का सारंडा जंगल देश की सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती के रूप में खड़ा है।
जहां कभी नक्सलियों का “अभेद्य किला” माना जाता था, आज वही सारंडा अंतिम लड़ाई का मैदान बन चुका है।

तिरिलपोसी में नक्सली कमांडर आजाद की फाइल तस्वीर

 

मिसिर बेसरा: बचा हुआ आखिरी ‘लाल कमांडर’

झारखंड के गिरिडीह का रहने वाला और एक करोड़ का इनामी मिसिर बेसरा अब भाकपा माओवादी संगठन का सबसे बड़ा चेहरा बन चुका है।
* पोलित ब्यूरो का सदस्य
* 50–70 हार्डकोर नक्सलियों का नेतृत्व
* संगठन का संभावित अगला महासचिव
उसके साथ असीम मंडल उर्फ आकाश उर्फ तिमिर और तेलंगाना का उग्रवादी टेक विश्वनाथ भी सारंडा के घने जंगलों में सक्रिय बताए जा रहे हैं।
सूत्रों की मानें तो अब हालात ऐसे हैं कि मिसिर बेसरा ही संगठन का अंतिम स्तंभ बचा है—और यही वजह है कि उसे महासचिव बनाने की चर्चा तेज है।

नेतृत्वविहीन माओवादी: टूटता जा रहा ‘रेड स्ट्रक्चर’

कभी 12 सदस्यों वाला पोलित ब्यूरो और 50 सदस्यीय केंद्रीय कमेटी… आज सिमटकर मुट्ठीभर रह गई है।
* महासचिव नंबला केशव राव उर्फ बसवराजू की मौत
* तिप्परी तिरूपति उर्फ देबूजी और मल्ला राजिरेड्डी का सरेंडर
* गढ़चिरौली में एम वेणुगोपाल राव उर्फ सोनू का आत्मसमर्पण
* झारखंड में अनल दा/पतिराम मांझी, सहदेव सोरेन, निर्भय दा, अनमोल दा का एनकाउंटर
इन घटनाओं ने माओवादी ढांचे की रीढ़ तोड़ दी है।
पहली बार ऐसा हुआ है कि पोलित ब्यूरो में एक भी तेलुगू नेता नहीं बचा।
यह संगठन के लिए वैचारिक और रणनीतिक दोनों स्तर पर बड़ा झटका है।

 

चेरवालोर गांव में नक्सलियों की फाइल काली तस्वीर

 

ऑपरेशन मेघाहातू से मेगाबुरु तक: सुरक्षाबलों का प्रहार

झारखंड में सुरक्षा बलों ने पिछले डेढ़ साल में जो अभियान चलाए हैं, उन्होंने नक्सलियों की कमर तोड़ दी है:
*ऑपरेशन मेगाबुरू (22 जनवरी): केंद्रीय कमेटी सदस्य पतिराम मांझी, अनमोल दा का सफाया
* ऑपरेशन मेगाबुरु और डबल बुल: सारंडा के अभेद्य किले को ध्वस्त
* 58 नक्सली ढेर
* 45 ने आत्मसमर्पण किया
आज स्थिति यह है कि पूरे झारखंड में सिर्फ 38 नक्सली सक्रिय बचे हैं, जिनमें दो एक-एक करोड़ के इनामी हैं।

सारंडा: आखिरी पनाहगाह या आखिरी जाल?

सारंडा का किरीबुरू, छोटानागरा, थोलकोबाद, तिरिलपोसी और चरवालोर—ये वही इलाके हैं जहां कभी नक्सलियों का पूर्ण वर्चस्व था।
आज वहीं

* छोटे-छोटे समूहों में बंटे नक्सली
* IED से घेरा गया कैंप
* ग्रामीण वेशभूषा में छिपे कैडर
* बंकरों और जंगलों में छिपे हथियार

सूत्र बताते हैं कि मिसिर बेसरा का दस्ता चारों ओर से घिर चुका है।

 

 

थोलकोबाद स्कूल के पास रश्मि, रेखा आदि कुख्यात महिला नक्सली की फाइल तस्वीर

 

सरेंडर या मौत: दो ही विकल्प बचे

सुरक्षा एजेंसियों का दावा है कि:
* सप्लाई चेन 90% तक खत्म
* राशन और विस्फोटक की भारी कमी
* लगातार ड्रोन और मानव इंटेलिजेंस से निगरानी
ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि अगले 2-3 दिनों में सरेंडर हो सकता है।
लेकिन सवाल है—क्या मिसिर बेसरा आत्मसमर्पण करेगा या आखिरी गोली तक लड़ेगा?

अफवाहों का बाजार: नेपाल भागा या जंगल में छिपा?

सारंडा और आसपास के गांवों में तरह-तरह की चर्चाएं हैं:
* “मिसिर बेसरा नेपाल भाग गया”
* “मोछू उर्फ मेहनत बीमार है”
* “नक्सली ग्रामीण बनकर गांवों में छिपे हैं”
हालांकि सुरक्षा एजेंसियां इन अफवाहों को खारिज करते हुए कह रही हैं—
👉 “हर मूवमेंट पर नजर है, बचना नामुमकिन है।”

टेबो थाना के शंकरा जंगल में संदीप दा (जेल में) से बातचीत की फाइल तस्वीर

 

राजनाथ सिंह की याद: जब बाइक से पहुंचे थे सारंडा

23-24 सितंबर 2014—जब तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह खुद बाइक चलाकर सारंडा के थलकोबाद कैंप पहुंचे थे।

थोलकोबाद स्थित सीआरपीएफ कैंप के अंदर की फाइल तस्वीर

इसने जवानों का मनोबल बढ़ाया और यह संदेश दिया कि सरकार इस लड़ाई में पीछे नहीं हटेगी।
आज, 12 साल बाद, वही सारंडा निर्णायक मोड़ पर है।

31 मार्च का सर्च ऑपरेशन: निर्णायक घेराबंदी
31 मार्च की सुबह:

छोटानागरा थाना कैंप से भारी संख्या में जवान रवाना
CRPF, कोबरा, झारखंड पुलिस की संयुक्त टीम
सघन सर्च ऑपरेशन जारी
हर पगडंडी, हर पहाड़ी और हर जंगल अब सुरक्षाबलों की नजर में है।

 

छोटानागरा कैंप से आज ऑपरेशन में जाते जवान

 

‘लाल आतंक’ का आखिरी अध्याय?

सारंडा आज सिर्फ एक जंगल नहीं, बल्कि एक इतिहास का अंतिम पन्ना बन चुका है।
* संगठन बिखर चुका है
* नेतृत्व खत्म हो चुका है
* सप्लाई लाइन टूट चुकी है
अब सिर्फ एक सवाल बचा है—
👉 क्या मिसिर बेसरा का अंत ही भारत में नक्सलवाद का अंत होगा?

संदेश साफ है: बंदूक छोड़ो या खत्म हो जाओ

यह लड़ाई अब सिर्फ सुरक्षाबलों की नहीं, बल्कि विकास, शांति और लोकतंत्र की है।
👉 सरकार का संदेश स्पष्ट है:
“जो मुख्यधारा में लौटेगा, उसका स्वागत होगा…
और जो बंदूक उठाएगा, उसका अंत तय है।”

जवानों को सलाम: असली हीरो जंगल में हैं

सारंडा की घने जंगलों में दिन-रात ऑपरेशन चला रहे CRPF, कोबरा और झारखंड पुलिस के जवान—
👉 वही इस लड़ाई के असली नायक हैं।
उनकी हिम्मत, रणनीति और बलिदान ने उस “रेड जोन” को
👉 आज ‘नो-गो एरिया’ से ‘नो-नक्सल एरिया’ बनाने की दिशा में ला खड़ा किया है।

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सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

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